जी भाई साहब जी: सत्‍ता के आगे निर्बल जनमत, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को लेने के देने पड़े

इस बार पंचायत व निकाय चुनाव में जीत के लिए संख्‍या बल को पूरा करने के लिए धन बल, सत्‍ता बल, बाहु बल आदि का खुल कर प्रयोग किया गया। ऐसा प्रयोग कि जनमत का अपमान भी हुआ तो किसने परवाह नहीं की। दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया एक फोटो शेयर कर घिर गए तो उमा भारती की राजनीति पर ही उठ गए सवाल।

Updated: Aug 02, 2022, 03:26 PM IST

जी भाई साहब जी: सत्‍ता के आगे निर्बल जनमत, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को लेने के देने पड़े
भोपाल जिला पंचायत अध्‍यक्ष चुनाव का दृश्‍य

लोकतंत्र में मतदान के बाद जीत हार के लिए संख्‍या काफी मायने रखती है। मगर इस बार जीत के लिए संख्‍या बल को पूरा करने के लिए धन बल, सत्‍ता बल, बाहु बल आदि का खुल कर प्रयोग किया गया। ऐसा प्रयोग कि जनमत का अपमान भी हुआ तो किसने परवाह नहीं की। गांव और नगर सरकार चुनते समय कैसे, क्‍या हुआ यह जानने के लिए कुछ घटनाओं को जान लेना ही काफी है। जैसे : 

  • रीवा में पनासी से बृजराज कुमार चुनाव जीतकर सरपंच बनी हैं। चुनावी रंजिश में सरपंच बृजराज कुमारी के पति को जिंदा जला दिया गया। इससे पहले आरोपियों ने उसे कुर्सी से बांधा फिर करंट के झटके दिए। इसके बाद साक्ष्य मिटाने के लिए केरोसिन डालकर जला दिया। 
  • सागर में एक आदिवासी महिला का इसलिए अपहरण किया गया ताकि वह जनपद अध्यक्ष नहीं बन सके। संजना आदिवासी राहतगढ़ जनपद के वार्ड क्रमांक-12 से जनपद सदस्य का चुनाव जीत चुकी थी। जनपद अध्यक्ष का पद एसटी के लिए रिजर्व होने के कारण वह इस पद की प्रबल दावेदार थीं। लेकिन उन्हें और उनके पति का अपहरण कर 4 दिन उन्हें गांव से ले जाकर सागर, उज्जैन, ओंकारेश्वर, इंदौर, देवास, विदिशा और फिर सागर में रखा गया। यहा राजू आदिवासी को निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया गया। 
  • जबलपुर की पाटन तहसील के आरछा गांव में उप सरपंच का चुनाव हारने वाले प्रत्याशी ने अपने परिजनों के साथ मिलकर जीते हुए दलित सरपंच और उप सरपंच के साथ मारपीट की। हैरानी की बात यह है कि दलित पंचायत प्रतिनिधियों की शिकायत भी अजाक थाने में दर्ज नहीं की गई। 
  • पिपरिया ग्राम पंचायत चुनाव में वोट नहीं देने पर रामपुर गांव के नरेश पिता दयाराम रघुवंशी को रास्‍ते में रोक कर डंडे से पिटाई कर दी गई। 
  • पन्ना में पवई थाना अंतर्गत ग्राम पडरिया में वोट न देने के शक में दबंगों ने एक परिवार पर हमला कर दिया। दबंगों ने महिलाओं सहित सात लोगों की लाठी-डंडों से बेदम पिटाई की। परिवार से सदस्यों ने रातों-रात गांव से भागकर जान बचाई। सभी घायलों का इलाज पन्ना जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है। 
  • मुरैना जिले की बिचपई पंचायत में आरोप लगा कि सरपंच बनने के लिए मतदाताओं को डकैतों से धमकी दिलाने की शिकायत सामने आई तो पुलिस अधिकारी सकते में आ गए। 
  • अटेर में ग्राम पंचायत जमसारा से सरपंच पद के उम्मीदवार के पति ने चुनाव में खर्च करने के लिए रकम जुटाने डकैती की साजिश रच डाली। डकैती के लिए बकायदा चार साथियों को हथियारों के साथ बुलाया। आरोपित डकैती की वारदात को अंजाम देते उससे पहले ही पुलिस ने घेराबंदी कर मुख्य आरोपित और उसके भाई को दो साथियों के साथ दबोच लिया। 

यह तो कुछ बानगी है, ऐसे मामले आपको हर तरफ मिल जाएंगे। त्रिस्‍तरीय पंचायती राज का उद्देश्‍य ही गांव के हाथ में गांव सत्‍ता देना था मगर लाठी और बल के सहारे जनमत को पीछे धकेलने के सारे प्रयास हुए। ऐसा लगता है कि जनता ने जिन्‍हें चुना था वे तो पीछे रह गए और जिन्‍हें नकार दिया था वे जोड़-तोड़ कर सत्‍ता पा गए। 

यूं भी लोकसभा, विधानसभा और गांव सरकार के मुद्दे और चुनाव लड़ने के तरीके अलग-अलग होते हैं। इन चुनावों को लड़ने के तरीके भी जुदां ही होते हैं। अपने गांव की सूरत बदलने के लिए चुनाव मैदान में उतरे ग्रामीणों के अरमानों पर ‘बल’ ने पानी फेर दिया है। गांव सरकार के गठन के समय राजनीति का सबसे बुरा चेहरा दिखाई दिया है। जिला व जनपद पंचायत चुनावों में रसूखदारों द्वारा लोकतांत्रिक प्रणाली को धत्‍ता बताने की कहानियां शर्मनाक हैं। 

विडंबना यह है कि प्रशासन और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठे और इन सवालों की संख्‍या हर बार से कहीं ज्‍यादा है। जनमत पाए जन प्रतिनिधियों की राह में रोड़ों को दूर करने का काम इन्‍हीं का था। हर हाल में जीत के फार्मूले पर चल रहे राजनीतिक दलों को भी जनमत का सम्‍मान करना सीखना होगा। जिसकी लाठी उसकी भेंस की तर्ज पर चुनाव बल तंत्र स्‍थापित करेगा, लोकतंत्र नहीं।

दिग्विजय सिंह की ऊर्जा में संजीवनी

चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने निष्‍पक्ष चुनाव की मांग की थी। फिर जब पंच और पार्षद चुनाव के बाद सरपंच, जनपद, नगर व जिला पंचायत अध्‍यक्ष के साथ महापौर चुनने की बारी आई तो संख्‍या बल साधने के जतन हुए। कलेक्‍टर ने कहीं टेडर वोट देने की अनुमति दी कहीं नहीं दी और इस ‘कुश्‍ती’ में कहीं कांग्रेस पिछड़ी कहीं बीजेपी। 

भोपाल जिला पंचायत में दिलचस्‍प मुकाबला था। कांग्रेस की तरफ पलड़ा झुकते देख मंत्री विश्‍वास सारंग, भूपेंद्र सिंह और विधायक रामेश्‍वर शर्मा ने मोर्चा संभाला। जोड़ तोड़ को रोकने के लिए कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता राज्‍यसभा सांसद दिग्विजय सिंह सड़क पर आ डटे। उनके साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, विधायक रामेश्‍वर शर्मा, आरिफ मसूद सहित कई कार्यकर्ता थे। 

भाजपा ने कांग्रेस के पदाधिकारियों को तोड़ कर अपने पक्ष में वोट करवा लिया। इस जोर आजमाइश में बाधा बने दिग्विजय सिंह और समर्थकों को रोकने के लिए पुलिस बल लगाना पड़ा। पुलिस अधिकारियों द्वारा रोके जाने का विरोध करते हुए एक फोटो भी वायरल हुआ। दिग्विजय सिंह को घेरने के लिए बीजेपी का समूचा मीडिया प्रभाग सामने आ गया। यहां तक कि मुख्‍यमंत्री‍ शिवराज सिंह चौहान ने भी बयान दिया। 

हालांकि, बाद में घटना का पूरा वीडियो जारी कर कांग्रेस ने इस मुद्दे की हवा निकाली दी कि दिग्विजय सिंह ने किसी पुलिस अधिकारी का अपमान किया है। बल्कि बाद में केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया और मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वे वायरल वीडियो भी सामने आ गए जिनमें वे सुरक्षा अधिकारी को पीटते दिखाई दे रहे हैं। 

बहरहाल, तीन पदाधिकारियों के पाला बदलने से भोपाल जिला पंचायत अध्यक्ष का पद भले ही कांग्रेस के हाथ नहीं लगा लेकिन दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने सड़क पर जिस तरह से ताकत दिखाई है उसने नजीर कहा जा रहा है। बीजेपी के बल के आगे कांग्रेस पार्टी को फिर से खड़ा करना है तो ऐसी ही किलर इंस्टिंक्ट की जरूरत होगी। पार्टी को उर्जा की ऐसी ही संजीवनी निरंतर चाहिए। 

हवाई मंत्री की सड़क पर फजीहत 

सिर मुंडाते ही ओले पड़ने की कहावत इस हफ्ते यदि किसी पर लागू हुई तो वे नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैदराबाद के दौरे पर गए थे। वहां की सड़कों की दशा देख उनसे रहा नहीं गया और खस्ताहाल सड़क की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए राज्य सरकार पर निशाना साधा दिया। उनका ये दांव उन पर ही उलटा पड़ गया जब लोगों ने प्रतिक्रिया में जी महाराज न कहते हुए मध्यप्रदेश व गुजरात की सड़कों को देखने की भी नसीहत दे डाली। 

कुछ कमेंट्स पर गौर कीजिए। एक ने लिखा कि आप के ग्वालियर की लक्कड़ खाने की रोड देखी है। 10 मिनिट की जगह 30 मिनिट में पहुंचेंगे। एक ने कमेंट किया मध्यप्रदेश की सड़कों पर तो महाराज ने मारबल बिछवा दी हो जैसे। एक ने सलाह दी कि एक बार सीधी सिंगरौली का दौरा अवश्य करें यहां की भी दूरी तय करने में आपको आनंद की प्राप्ति होगी। वजह आपकी सरकार राज्य और केंद्र दोनों में है।

सही कहा किसी ने कि महाराज के दिन खराब चल रहे हैं। नगरीय निकाय चुनाव में गढ़ में तो धूल उड़ी ही सोशल मीडिया पर भी लेने के देने पड़ गए।

क्या जीत कर भी हार गई उमा भारती 

टीकमगढ जिला पंचायत चुनाव में  भतीजा बहू उमिता को जितवाने में उमा भारती को पसीने आ गए। कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह की पत्‍नी ने कड़ी टक्‍कर दी। संख्‍या बल जुटाने के लिए ऐनवक्त पर उमा भारती ने केन्द्रीय मंत्री सिंधिया से मदद मांगी। सिंधिया ने अपने समर्थक को पीछे हटाया तब बमुश्किल एक वोट से उमिता जीत पाई। घर में मुश्किल से मिली जीत के बाद उमा भारती के लिए कई राजनीतिक सवाल खड़े हो गए हैं।

उमा भारती पिछले कुछ माह से सक्रिय राजनीति में उतरने की कोशिश कर रही हैं। उनके बयानों में उनकी यह छटपटाहट दिखाई देती है। अब जब अपने ही क्षेत्र में अपने ही परिवार की सदस्‍य को जितवाने के लिए उन्‍हें ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा है तो उनकी लोकप्रियता और मैदानी पकड़ पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह कि अब वे बीजेपी की ताकत बनेगी या उन्‍हें अपने समर्थकों को जितवाने के लिए शक्ति उधार मांगनी पड़ेगी?