जी भाई साहब जी: ऐसे कम होगा ज्योतिरादित्य सिंधिया का जलाल

पंचायत व निकाय चुनावों के परिणाम आ गए हैं। अपनी जीत के दावों के साथ में बीजेपी और कांग्रेस में खुशियां पसरी है मगर एक कैम्‍प है जहां सन्‍नाटा पसरा है। इस सन्‍नाटे की वजह है शक्ति का कम हो जाने का अंदेशा। 

Updated: Jul 19, 2022, 01:42 PM IST

जी भाई साहब जी: ऐसे कम होगा ज्योतिरादित्य सिंधिया का जलाल
केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरा‍दित्‍य सिंधिया

नगरीय निकाय परिणाम आने के बाद जीत से ज्‍यादा यदि किसी बात की चर्चा है तो ग्‍वालियर में महापौर पद की बीजेपी प्रत्‍याशी की हार की। माना जा रहा है कि यहां केवल प्रत्‍याशी नहीं हारा बल्कि क्षेत्र की राजनीति में महल का प्रभाव हारा है। बीजेपी के वरिष्‍ठ क्षेत्रीय नेता तो नाराज थे ही अब मतदाताओं ने भी विपरीत रूख दिखाया है। यही कारण है कि बीजेपी के नेता चटखारे लेकर कह रहे हैं, 'गढ़ आला, पन सिंह गेला' यानी पार्टी ने किला तो जीत लिया लेकिन अपना शेर खो दिया है। इसका यह अर्थ लगाया जा रहा है ज्योतिरादित्य सिंधिया का जलाल अब कम होने वाला है।

माना जा रहा है कि ग्वालियर क्षेत्र में हार का असर ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे पर पड़ना तय है। यदि वे अपने क्षेत्र में पार्टी को मजबूती से विजयी बनवा देते तो विधानसभा चुनाव में अधिक सर्मथकों के लिए टिकट की दावेदारी कर सकते थे। यह हार उनकी दावेदारी को कमजोर कर सकती है। 

ग्‍वालियर क्षेत्र में पार्टी की अंदरूनी खींचतान से बीजेपी संगठन भी वाकिफ है। यही कारण है कि संगठन की समीक्षा बैठकों में बार-बार कहा जाता रहा है कि मनमुटाव का असर मैदान में नहीं दिखना चाहिए। यह हिदायत नाकाम हुई। न केवल नेताओं के मनमुटाव दिखे बल्कि परिणाम भी बीजेपी के विपरीत ही आया।

बीजेपी में आने के बाद केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने महाराज की छवि तोड़ने की भरपूर कोशिश की। वे नेता जो कल तक सिंधिया परिवार के खिलाफ विष उगला करते थे, उनके साथ भी गलबहियां की। माहौल की नजाकत को देखते हुए सिंधिया समर्थक नेताओं ने भी बीजेपी में अपने पैर जमाने के जतन किए हैं मगर परिणाम में ये कोशिशें बेअसर होती दिखाई दी है। 

हमने देखा है कि नगरीय निकाय चुनाव के लिए टिकट वितरण के समय अपने समर्थकों के लिए केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने जोरदार पैरवी की थी। अपने प्रभाव के दम पर उन्‍होंने राज्‍य संगठन को फैसलों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर भी किया। अब जब ग्‍वालियर यानि सिंधिया के घर में बीजेपी की हार हो चुकी है तब पार्टी नेताओं ने राहत की सांस ली है। राहत की सांस इसलिए कि अब टिकट वितरण में जब सिंधिया खेमे का दबाव आएगा तो दिखाने के लिए आईना होगा। 

ग्‍वालियर में जीत से कांग्रेस के खेमे में भी खुशी है। नेता यह साबित कर पाए हैं कि महल के प्रभाव से मुक्‍त होने के बाद कांग्रेस अधिक लोकप्रिय हुई है। यदि महल खासकर ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया से नाराजगी नहीं होती तो प्रदेश के दूसरे हिस्‍सों की तरह बीजेपी के समर्पित मतदाता पार्टी की उम्‍मीदवार को विजयी बना देते। मगर कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधारा है। यह सुधार भी अंतत: केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के लिए माइनस मार्किंग ही है। जो समर्थक सोच रहे थे कि महाराष्‍ट्र की तरह सिंधिया को भी सरकार गिराने के तोहफे में मुख्‍यमंत्री पद मिलना था वे अब भविष्‍य में आका के पॉवर कम होने की आशंका में जी रहे हैं। 

मंत्रियों का क्‍या होगा... कुर्सी जाएगी या ताकत?  

प्रदेश के नगरीय निकाय के चुनाव में जीत और बड़े शहरों की नगर निगम में तीन सीट हारने के बाद बीजेपी में मंथन होना तय है। ग्वालियर की महापौर प्रत्‍याशी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की पसंद थी और उन्‍हें जितवाना दूसरे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की जिम्‍मेदारी थी। इस क्षेत्र से शिवराज सरकार में 9 मंत्री तथा 14 मंत्री दर्जा वाले नेता है। ग्वालियर के प्रभारी मंत्री तुलसी सिलावट है। मगर परिणाम उल्‍टे हुए। 

जबलपुर में भी यही हुआ। 23 साल से जबलपुर में बीजेपी नेता ही महापौर हुआ करते थे। अब बीजेपी उम्‍मीदवार हार गए। यह पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष और सांसद राकेश सिंह, पूर्व मंत्री व विधाय अजय विश्नोई और शरद जैन का प्रभाव क्षेत्र है। जबलपुर के प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव है। 

छिंदवाड़ा बीजेपी मुक्‍त हो गया। वहां के प्रभारी कमल पटेल है। गोविंद सिंह राजपूत के प्रभार वाले भिंड और दमोह में भाजपा हार गई। बृजेंद्र प्रताप सिंह के प्रभारी की सिंगरौली में जनता ने आम आदमी पार्टी की उम्‍मीदवार को महापौर चुन लिया। ओमप्रकाश सकलेचा के प्रभार क्षेत्र सिवनी, हरदीप सिंह ढंग के प्रभार वाले जिले  बालाघाट में बीजेपी उम्‍मीदों जितना प्रदर्शन नहीं कर पाई। गोविंद सिंह राजपूत के भतीजे अरविंद सिंह तो उनके ही गढ़ में हार गए। पूरी शक्ति लगाने के बाद भी मंत्री के भतीजे को बीजेपी के एक पूर्व कार्यकर्ता ने हराया। संस्‍कृति मंत्री उषा ठाकुर के क्षेत्र में भी बीजेपी निराशा ही हुई है।   

जैसा कि संगठन ने कहा था कि हार के बाद जिम्‍मेदारी के प्रदर्शन का आकलन होगा तो कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्‍द ही शिवराज मंत्रिमंडल का विस्‍तर होगा। हार-जीत की समीक्षा के बाद कुछ मंत्रियों का कद कम होगा या कुर्सी चली जाएगी तथा अच्‍छा प्रदर्शन करने वाले नेताओं को मंत्री बनाया जा सकता है। मंत्रिमंडल विस्‍तार हुआ तो जीत का तोहफा देने से ज्‍यादा जरूरी होगा मिशन 2023 के समीकरण साधना। लिहाजा, मंत्री बनने का सपना देख रहे नेताओं ने आकाओं की परिक्रमा शुरू कर दी है।  

प्रदेश अध्यक्ष विष्णु शर्मा को मिलेगा नया कार्यकाल? 

पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के परिणाम घोषित हुए तो जीत का जश्‍न मना। जश्‍न के शोर के बीच एक कयास की लहर यह भी दौड़ी कि अब बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा को दूसरा कार्यकाल भी मिलेगा। 

बीजेपी की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर तमाम नेताओं ने बधाई के ट्वीट किए और सत्‍ता व संगठन के मुखियाओं मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा प्रदेश अध्‍यक्ष विष्‍णु दत्‍त शर्मा व कार्यकर्ताओं को जीत का श्रेय दिया। 

बीजेपी का चुनाव प्रचार मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दौरों पर ही केंद्रित रहा है। मंत्री और प्रदेश प्रभारी अपने ही क्षेत्रों में बंध कर रह गए थे। संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा ने भी बीजेपी की कमजोर स्थिति का आकलन कर रतलाम सहित अन्‍य सीटों पर अधिक ध्‍यान केंद्रित किया मगर प्रदेश अध्‍यक्ष  वीडी शर्मा लगातार प्रदेश के भ्रमण पर रहे। उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री के समानांतर प्रचार अभियान चलाया और बराबरी से मैदानी दौरे, सभाएं व बैठकें की। 

इस तरह जीत का श्रेय केवल और केवल मुख्‍यमंत्री‍ शिवराज सिंह चौहान के खाते में नहीं गया बल्कि प्रदेश अध्‍यक्ष के सिर पर भी जीत का सेहरा बंधा। चुनाव में प्रदर्शन के बाद जहां संगठन में समीक्षाओं का दौर आरंभ होगा वहीं उम्‍मीद जताई जा रही है कि प्रदेश अध्‍यक्ष के रूप में वीडी शर्मा को एक कार्यकाल और मिलेगा। 

निकट अतीत की बात करें तो मुख्‍यमंत्री से अच्‍छा तालमेल होने के कारण वरिष्‍ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर व नंदकुमार सिंह चौहान को दोबारा प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया गया था। जबकि राकेश सिंह को यह लाभ नहीं मिला। नंदकुमार सिंह चौहान को दोबारा अध्‍यक्ष बनाने के पीछे तर्क दिया गया था कि नंदकुमार सिंह चौहान को पहले कार्यकाल में कम समय मिला था। बेहतर कार्य के लिए उन्‍हें दोबारा अवसर मिलना चाहिए। 

विधानसभा चुनाव 2013 की गंभीरता को देखते हुए मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्तमान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश अध्‍यक्ष बनवाया था। दोनों की जुगलबंदी ने बीजेपी ने जीत का परचम लहराया था। इसके पहले 2008 में भी दोनों की जोड़ी ने ही पार्टी को जीत दिलवाई थी। 2018 का चुनाव राकेश सिंह की अध्‍यक्षता में लड़ा गया। लेकिन पूरा चुनाव प्रचार अभियान मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इर्दगिर्द ही बुना गया था। 

अब जब कि 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में वीडी शर्मा समर्थक उम्‍मीद कर रहे हैं कि पार्टी किसी दूसरे नेता को अध्‍यक्ष बनाने की जगह वीडी शर्मा का कार्यकाल बढ़ाएगी ताकि संगठन में सुधार की कवायद रूके नहीं। संगठन प्रमुख के तौर पर वीडी शर्मा और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा बेहतर तालमेल दिखा रहे है। सत्‍ता व संगठन की शीर्ष त्रयी का तीसरा कोण मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं। देखना होगा कि वे प्रदेश अध्‍यक्ष के रूप में वीडी शर्मा के नाम पर सहमति देते हैं या कोई अन्‍य चेहरा उनकी पसंद बनेगा। 

कांग्रेस में उत्साह, मुद्दा यह कि जोश कैसे बना रहे...

नगर व ग्राम सरकार के चुनावों के परिणाम कांग्रेस के लिए सुखद कहे जा सकते हैं। दिसंबर 2014 में हुए चुनाव में सभी 16 नगर निगमों में बीजेपी के ही महापौर चुने गए थे। नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के ज्यादातर अध्यक्ष भी बीजेपी नेता ही रहे हैं। तब शून्‍य रही कांगेस के पास आज 3 महापौर हैं यह पार्टी की उपलब्धि ही कही जानी चाहिए कि तमाम विपरीत बातों के भी वह किला लड़ाने में सफल हुई। 

कांग्रेस में खुशी है कि पार्टी ने न केवल ग्‍वालियर में जीत दर्ज की बल्कि दो और जगह अपने महापौर बनवा लिए। उसके लिए ग्‍वालियर की जीत प्रतिष्‍ठा से जुड़ी है। कांग्रेस नेता जानते हैं कि नगरीय निकाय चुनाव में भले ही बीजेपी को बढ़त दिखाई दे रही है लेकिन पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी को नुकसान हुआ है। जबकि कांग्रेस के लिए ये परिणाम संजीवनी की तरह हैं। 

कांग्रेस के महापौर प्रत्याशियों को इंदौर, भोपाल, खंडवा और सतना में करारी हार का सामना करना पड़ा है। नगरीय निकायों में उम्‍मीद से आधे कांग्रेस नेता ही पार्षद चुनाव जीत सके हैं। लेकिन यहां कांग्रेस अपने कारणों से नहीं राजनीतिक कारणों से हारी है। बसपा, आम आदमी पार्टी तथा औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम ने कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ दिए।

सिंगरौली नगर निगम में आप की मेयर प्रत्याशी रानी अग्रवाल जीत गई जबकि बुरहानपुर नगर निगम में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम वोट नहीं काटती तो कांग्रेस की प्रत्‍याशी महापौर चुनी जाती क्‍योंकि वहां बीजेपी की माधुरी पटेल मात्र 542 वोट से जीती है। बुरहानपुर में एआईएमआईएम ने दस हजार वोट पाए। 

कांग्रेस प्रदेश कमलनाथ का आरंभिक बयान इस ओर इशारा भी करता है। यदि नगरीय‍ निकाय चुनाव से सबक लेते हुए कांग्रेस प्रत्‍याशी चयन तथा मैदानी समीकरणों को साध लेती है तो 2023 में अपेक्षित परिणाम संभव है। तब तक पार्टी कार्यकर्ताओं का जोश भी बनाए रखना होगा।  इस जोश को बनाए रखना और बढ़ाना ही कांग्रेस के आगामी कार्यक्रमों की केंद्रीय विषय वस्‍तु होगी।