महत्वपूर्ण यह नहीं है कि झंडे का रंग कैसा है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि झंडा किसने उठा रखा है

दिग्विजय सिंह के नर्मदा यात्रा के चार वर्ष पूरा होने पर इस धार्मिक यात्रा के सहयात्री रहे ओपी शर्मा ने साझा किए अनुभव

Updated: Apr 09, 2022, 05:39 PM IST

महत्वपूर्ण यह नहीं है कि झंडे का रंग कैसा है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि झंडा किसने उठा रखा है

दिग्विजय सिंह और उनकी धर्मपत्नी अमृता राय ने आज से ठीक 4 वर्ष पहले लगभग 300 परिक्रमा वासियों के साथ पैदल नर्मदा परिक्रमा सम्पन्न की थी। उस महान धार्मिक यात्रा में मुझे भी उनके साथ चलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और 30 सितंबर 2021 को उस महान धार्मिक यात्रा का यात्रा वृत्तांत "नर्मदा के पथिक" के रूप में आपके सामने आया।

इस पुस्तक को देश भर में जो अनूठा भरपूर प्यार मिला है, वह सचमुच भाव विभोर कर देता है। इक्कीसवीं सदी की इस सबसे बड़ी नर्मदा परिक्रमा में न सिर्फ हजारों लोगों ने दिग्विजय सिंह का स्वागत किया बल्कि बिना किसी जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय के भेद के लाखों लोग उनसे जुड़े। उनका अभिनंदन किया। 

परिक्रमा के दौरान गुजरात में वहां के प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक और शिक्षाविद उत्तम परमार से मेरी भेंट हुई थी। उनके साथ उनके कुछ मुस्लिम मित्र भी दिग्विजय सिंह जी से मिलने आए थे। मैने जब उत्तम परमार जी से सवाल किया कि आप इन जंगलों में इतनी तकलीफ उठाकर क्यों आए हैं? उनके जवाब में हमे धर्म के काफी सूत्र मिले। वे कहते हैं- "मैं यहाँ विशुद्ध धर्म की प्रत्यक्ष अनुभूति करने आया हूँ। धर्म तकलीफों को मिटाता है। खुद से खुद का फासला काफी लंबा है और धर्म का साथ उस फासले को कम करता है। दिग्विजय सिंह का धर्म किसी को डराता नहीं बल्कि हर किसी को गले लगाता है। वे भगवा ध्वज लेकर चल रहे हैं किंतु वे साम्प्रदायिक नहीं हैं, धार्मिक हैं, इसलिए दूसरे सम्प्रदाय के लोग उनसे डरते नहीं हैं। इसीलिए तो मुसलमान और ईसाई भी उनका स्वागत, अभिनंदन कर रहे हैं।"

बातचीत के अंत मे उत्तम परमार दिल को छू लेने वाली बात कहते है- "दिग्विजय सिंह ने वह भरोसा कायम किया है कि वे कभी धर्म का दुरुपयोग नही करेंगे। फिर उनके द्वारा उठाये गए झंडे का रंग भगवा है, इससे मुसलमानों और ईसाइयों या किसी अन्य सम्प्रदाय के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे तो स्वागत करेंगे ही। महत्वपूर्ण यह नही है कि यात्रा में झंडे का रंग कैसा है। बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि झंडा किसने उठा रखा है।"

संत मलूकदास जी के पद धर्म को बहुत स्पष्ट कर देते है। वे कहते हैं-

दुःखदायी सबते बुरा, जानत है सब कोई।

कह मलूक कंटक मुआ, धरती हल्की होय।।

मक्का मदीना द्वारिका, बद्री और केदार।

बिना दया सब झूंठ है, कहे मलूक विचार।।

सब कोई साहिब वन्दते, हिन्दू मुसलमान।

साहिब तिनको बंदता जिनका ठौर ईमान।।

नर्मदा परिक्रमा समापन के चार वर्ष पूर्ण होने पर सभी साथी परिक्रमावासी भाई-बहनों को हार्दिक बधाई। माँ नर्मदा हम सबके हृदय में अंकुरित हुए धर्म के बीज को  पुष्पित और पल्लवित करके छायादार बनाये। इन्ही शुभकामनाओं के साथ।