रमे रामे मनोरमे, सहस्त्रनाम तत्तुल्यं

व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी। सत चेतन घन आनंदराशी।।

Updated: Oct 31, 2020, 12:09 AM IST

रमे रामे मनोरमे, सहस्त्रनाम तत्तुल्यं

श्री राम का अस्तित्व
आज हमारे गुरुदेव भगवान से किसी ने पूछा कि श्री राम के अस्तित्व में क्या प्रमाण है? तो इसके उत्तर में महाराज श्री ने कहा कि सब के अस्तित्व को जो प्रमाणित करता है वह श्रीराम हैं। श्री राम सबके स्वामी हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि जो सर्वत्र व्याप्त हैं वह श्रीराम है। 
व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी।
सत चेतन घन आनंदराशी।।

वह श्री राम साक्षी के रूप में सब के अंतः करण में विद्यमान हैं। सबके हृदय में विद्यमान रहते हुए भी वह दिखाई नहीं देता। इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं-
एक दारू कर देखिए एकू 
पावक सम जुग ब्रह्म विवेकू लकड़ी में अग्नि रहती है। जब याज्ञिक लोग यज्ञ करते हैं तो अर्णि मंथन करके अग्नि प्रकट करते हैं। अगर लकड़ी में पहले से अग्नि ना होती तो कैसे प्रकट होती? इसका मतलब यह है कि लकड़ी में अग्नि थी। लेकिन अनभिव्यक्त थी। जब ब्राह्मणों ने उसका मंथन किया तो अग्नि प्रकट हो गई। इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र है, केवल प्रकट नहीं है। जिस समय राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त होकर पृथ्वी ब्रह्मा जी के पास गई तो सब लोग विचार करने लगे पृथ्वी का भार कैसे उतरे? तो सभी ऋषि मुनि और देवताओं ने कहा कि बिना भगवान के उद्धार नहीं होगा। 
बैठे सुर सब करहिं बिचारा।
कहं पाइअ प्रभु करहिं पुकारा।।

 

उस समय भगवान शंकर ने अपना विचार व्यक्त किया। कहते हैं- 
तेंहि समाज गिरिजा में रहेऊ।
अवसर पाई वचन एक कहेऊ।।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम से प्रगट होहिं मैं जाना।।

जैसे लकड़ी में अग्नि है लेकिन  अनभिव्यक्त है मंथन से प्रकट होती है वैसे ही भगवान के नाम से, भगवान के प्रति प्रेम से भगवान प्रकट हो जाते हैं। एक दारू गत देखिअ एकू।
पावक सम जुग ब्रह्म विवेकू।

निर्गुण और सगुण दोनों का प्रबोध श्री राम नाम कराता है 
उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी 
श्री राम नाम निर्गुण और सगुण दोनों का ज्ञान करा देता है। लक्षण से लक्ष्य का पता चलता है। महाराज जनक ने एक दृष्टि में श्री राम को पहचान लिया। 
इनहिं विलोकत अति अनुरागा।
बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा

एक बार भगवान शंकर भोजन के समय पार्वती जी को बुलाए और बोले कि पार्वती हमारे साथ बैठकर भोजन करो। तो पार्वती जी ने कहा कि प्रभु मैं विष्णु सहस्रनाम का पाठ किए बिना भोजन नहीं करती हूं। वह पाठ करके ही में भोजन कर पाऊंगी।आप भोजन कर लीजिए। मैं बाद में करूंगी। तब भगवान शंकर ने कहा राम रामेति रामेति
रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं,
रामनाम वरानने। 

रामे, मनोरमे यह सम्बोधन है। हे पार्वती! राम रामेति रामेति तीन बार राम नाम लेने से सहस्र नाम के पाठ का फल हो जाता है। श्री राम जयराम जय-जय राम। इसमें तीन बार राम नाम का उच्चारण है।
सहस्रनाम सम सुनि शिव बानी। 
जपि जेईं पिय संग भवानी।।

 इस पर विश्वास करके माता पार्वती ने भगवान शंकर के साथ भोजन किया और भगवान शंकर इतने प्रसन्न हो गए कि उन्हें अपना आधा अंग बना लिया इसका अर्थ यह है कि हम श्री राम नाम के द्वारा अपने हृदय में श्री राम को प्रकट कर सकते हैं। जिनके अस्तित्व से हम भी अस्तित्ववान होते हैं।