विषयों का चिन्तन छूटते ही एकाग्र होगा मन

हमारा मन उन्हीं विषयों का चिंतन करता है जहां उसका राग द्वेष होता है, मन कभी नहीं करता उपेक्षित विषयों का चिंतन

Publish: Aug-05, 2020, 02:22 PM IST

विषयों का चिन्तन छूटते ही एकाग्र होगा मन

आध्यात्मिक साधना में मन को वश में रखना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।मन की चंचलता साधकों की बहुत बड़ी समस्या है। योग दर्शन में भी कहा गया है - अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध: अर्थात अभ्यास एवं वैराग्य से उसका निरोध किया जा सकता है।

भक्ति योग में अपने इष्ट देव के प्रति निष्काम प्रीति धारा को प्रवाहित करके उसमें विरह की भावना से उसमें तीव्रता और निरंतरता लाई जा सकती है। कोई भी इच्छा बलवती होने पर अन्य इच्छाओं को अभिभूत कर देती है। यदि यही इच्छा अपने इष्ट देव संबंधी हो जाए तो अन्य सब इच्छाएं दब जाती हैं - 

मन ते सकल वासना भागी। केवल राम चरण लौ लागी।।

मानस में काग भुसुंडि जी की यह स्थिति उनको सब से विरक्त करके राम की प्राप्ति की उत्कट उत्कंठा द्वारा ऋषि मुनियों के आश्रमों में भटकाती हुई लोमश मुनि के पास पहुंचा देती है। हमारा मन उन्हीं विषयों का चिंतन करता है जहां उसका राग द्वेष होता है। कभी भी मन उपेक्षित विषयों का चिंतन नहीं करता।

किसी शिष्य ने अपने गुरु से सोना बनाने की युक्ति बताने का आग्रह किया। गुरु ने उस की अनेक क्रियाएं बताते हुए कहा कि सब के अंत में एक और क्रिया करने पर सोना बन जाएगा। वह भी हम तुमको बतलाए देते हैं पर शर्त यह है कि क्रिया को करते समय बंदर की याद नहीं आनी चाहिए। सोना बनाने की विधि सीख कर फिर वह एकांत में उसका प्रयोग करने बैठ गया पर जब अंतिम क्रिया का अवसर आया तो उसको स्मरण आया कि गुरु जी के कहा था कि इस क्रिया के समय बंदर की याद नहीं आनी चाहिए। और उसके मन में बंदर की याद ने ऐसा डेरा डाला वह सिर पटक कर और दौड़ लगाकर भी बंदर को भूल नहीं सका।

इससे यह निष्कर्ष निकला कि जिस व्यक्ति या मनुष्य को हम अपने मन से निकालना चाहते हैं उसके दोषों को जानकर उसकी उपेक्षा करें तभी मन से उनको हटाया जा सकता है विषयों के दोष दर्शन से उनकी उपेक्षा करते हुए ही मन को हटाते हुए अपने स्वरूप में स्थिर करने का प्रयास करें। जैसे निर्वात घर में दीपक की लौ स्थिर हो जाती है, वैसे ही मन में परस्पर विरोधी विषयों का चिंतन ना होकर एक ही लक्ष्य में हो जाए इसी को योग कहते हैं।

अनुभवी महात्माओं का कथन है कि हमारा मन एक ऐसे बालक के समान है जिसने विषय रूपी खिलौनों को कस कर पकड़ लिया है छोड़ता नहीं है। यदि ऐसी स्थिति में उसे पालने में लिटा कर झूले में झूला कर सुला दिया जाए तो हाथ में शिथिलता आने पर खिलौना अपने आप छूट कर गिर जाएगा। यह झूला हमारी श्वास का झूला है  श्वास जब बाहर निकलती है तो हम् की ध्वनि होती है और जो भीतर जाती है तो स: ध्वनि बनती है।इस प्रकार जीव निरंतर 'हंस: सोहम्' का अजप जप कर रहा है, केवल मन को उसमें लगाना है। इससे मन स्वत: शिथिल होकर विषय-चिंतन छोड़ देगा और विषयों का चिन्तन छूटते ही मन एकाग्र हो जायेगा।