नो ते धनाढ्यगुरुतावचनैश्च तुष्टि र्नो रूपवैभवगुणैरथवर्णधर्मै भक्त्यैव तुष्यति गुरुश्शरणागतस्य, ह्यानंदकंद मम देहि करावलम्बम

नर्मदा भी गुरु के स्वरूप में आकर तत्वबोध कराती हैं। इसीलिए जगद्गुरु को भी गुरु की प्राप्ति नर्मदा तट पर ही हुई।

Updated: Nov 21, 2020, 09:12 AM IST

नो ते धनाढ्यगुरुतावचनैश्च तुष्टि र्नो रूपवैभवगुणैरथवर्णधर्मै भक्त्यैव तुष्यति गुरुश्शरणागतस्य, ह्यानंदकंद मम देहि करावलम्बम


नो ते धनाढ्यगुरुतावचनैश्च तुष्टि
र्नो रूपवैभवगुणैरथवर्णधर्मै
भक्त्यैव तुष्यति गुरुश्शरणागतस्य,
ह्यानंदकंद मम देहि करावलम्बम
अर्थ-हे गुरुदेव!आप न तो अत्यधिक धन-संपत्ति,गुरुता तथा मधुर वचनों से और न रूप,वैभव, गुण अथवा वर्ण धर्मों से (सर्वाधिक) प्रसन्न होते हैं आप तो केवल सच्ची भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं। हे आनंदकंद! मुझ शरणागत को अपने कर कमलों का सहारा दीजिए।
*ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति*:
*पूजामूलं गुरो:पदम्*।
*मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं*,
*मोक्षमूलं गुरो:कृपा*।।
हमारे परम पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि नर्मदा भी गुरु के स्वरूप में आकर तत्वबोध कराती हैं। इसीलिए जगद्गुरु को भी गुरु की प्राप्ति नर्मदा तट पर ही हुई। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य जी महाराज सदगुरु की खोज में नर्मदा जी के पास आए और यहां नरसिंह पुर जिले में हिरण और नर्मदा के संगम क्षेत्र में गोविन्द नाथ वन के निकट ही उन्होंने अपने सद्गुरु देव श्री गोविन्दपादाचार्य जी महाराज से ज्ञान प्राप्त कर स्वयं भी कृतकृत्य हुए तथा औरों को भी किया। हजारों वर्षों से अनगिनत ऋषि, मुनि, महायोगी,महातपस्वी, युगपुरुष,यति जिस देश में जन्म लिए हैं,वही सर्वतीर्थसार परम पवित्र परम श्रेष्ठ और सर्वोत्तम देश है हमारी मातृभूमि भारत वर्ष। यहां के हर एक रज कण में साधु-संत महात्माओं के पवित्र चरणों की धूलिका सम्मिलित है।जिसको हम मस्तक से लगाकर के धन्य तथा पापों से मुक्त हुआ अनुभव करते हैं।भारत भूमि से ही सर्व प्रथम उच्चारित हुआ था वह महावाक्य
   *सर्वं खल्विदं ब्रह्म*
अर्थात् यह सबकुछ ब्रह्म ही है। जिसने ऐसा अनुभव किया वह धन्य है।इस विश्व भर में प्रत्येक प्राणियों के अंदर निरंतर भगवद् शक्ति का प्रवाह चल रहा है।इस शक्ति का उद्भव एवं स्थिति कहां से कैसे हुई ये कोई नहीं जानता। युग युग से शत सहस्र महात्माओं और महायोगियों ने पारमार्थिक ज्ञान प्राप्त संसार का त्याग करके वैराग्य का आश्रय लिया था और हजारों वर्षों की ये परम्परा आज भी प्रवाहमान है।चाहे वह पर्वतराज हिमालय की गिरिकंदरा हो या सर्वसिद्ध नर्मदामाता का तटीय गंभीर अरण्य हो अथवा भारत माता की चरणाश्रिताकन्याकुमारिका की बालुका राशि हो।आज भी भारत वर्ष के साधक गण वह परम सत्य जानने के लिए निरन्तर ध्यान मग्न हैं और उसी क्रम में अद्वैत ब्रह्म का सम्यक रूप से ज्ञान प्राप्त करने के लिए अष्ट वर्षीय बालक साधक-श्रेष्ठ आचार्य शंकर ने नग्न पद,मुण्डित मस्तक में गृहत्याग कर दिया था।उस समय उनका एकमात्र उद्देश्य था नर्मदा तट निवासी महर्षि पतंजलि के अवतार श्री गोविन्दपादाचार्य
का अनुसंधान तथा चरणाश्रय लेना।इस महान उद्देश्य को साकार रूप देने के लिए वे सुदूर दक्षिण भारत से अकेले ही पैदल चलकर मध्य भारत में आए और यहां माता नर्मदा की अहैतुकी कृपा से उन्हें सद्गुरु की प्राप्ति हुई। इसलिए नर्मदा जी को *सर्वतीर्थनायक* और *भुक्तिमुक्तिदायिनी*
कहा गया है।आज हम गुरु स्वरूपिणी नर्मदा के करावलम्बन की अभिलाषा करते हैं।
           *नर्मदे हर*