समर विजय रघुनाथ के चरित जे सुनहिं सुजान। विजय विवेक विभूति नित तिनहिं देहिं भगवान।।

श्रीराम रावण का युद्ध भक्ष्य और भक्षक का युद्ध है, अच्छाई और बुराई का संघर्ष है, धर्म और अधर्म का युद्ध है

Updated: Oct 25, 2020, 10:41 AM IST

समर विजय रघुनाथ के  चरित जे सुनहिं सुजान। विजय विवेक विभूति नित  तिनहिं देहिं भगवान।।
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विजय दशमी को महापर्व के रूप हम सभी सनातन धर्मावलंबी पारम्परिक रूप से सोल्लास मनाते हैं। इस युद्ध प्रसंग की परिसमाप्ति पर श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कहा है कि भगवान श्रीराम के समर विजय की गाथा जो लोग प्रेम पूर्वक श्रवण करते हैं, उनके जीवन में रघुवंश भूषण श्री राम विजय, विवेक और विभूति ये तीनों प्रदान करते हैं। विजय के साथ विवेक को जोड़ने का अभिप्राय ये है कि हम-सब विजयी तो होना चाहते हैं, लेकिन विजय के साथ विवेक का होना अति आवश्यक है। युद्ध भी विवेकपूर्ण हो और विजय भी विवेकपूर्ण हो।

श्रीमद् राघवेन्द्र राम चन्द्र के युद्ध की यही विशेषता है कि युद्ध के अवसर पर भी विवेक का पूर्ण रूप से प्रयोग हो रहा है। अधीर विभीषण को धर्म रथ का उपदेश किया और समय-समय पर रावण को भी उपदेश करते और कराते हैं। सर्वप्रथम श्री हनुमान जी महाराज के द्वारा रावण को उपदेश फिर बालिकुमार श्री अंगद जी को दूत के रूप रावण के दरबार में भेज कर अंगद जी के द्वारा उपदेश कराते हैं। और स्वयं रघुकुल कमल दिनेश जब रणांगण में आए तो उस समय लंकेश ने प्रभु के लिए दुर्वचन का प्रयोग किया। इसपर हंसते हुए प्रभु ने रावण को उपदेश दिया।

सुनि दुर्वचन काल वश जाना

बिहंसि वचन कह कृपानिधाना

श्री राघव ने कहा कि रावण! संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक पाटल (गुलाब) के सदृश दूसरे रसाल (आम) के सदृश और तीसरे पनस (कटहल) के सदृश। गुलाब में केवल फूल लगता है फल नहीं, आम में फूल फल दोनों लगता है और कटहल में केवल फल लगता है फूल नहीं। इस प्रकार जो गुलाब के सदृश लोग हैं वे केवल बोलते हैं, करते कुछ भी नहीं, जो आम सदृश लोग हैं वो जितना कहते हैं उतना करते हैं, क्यूंकि इसमें फूल फल दोनों लगता है, किन्तु जो कटहल के समान लोग हैं वो करके दिखाते हैं कहते नहीं हैं, क्योंकि इसमें केवल फल ही फल लगता है।

इस प्रकार युद्ध के प्रसंग में भी प्रभु विवेक के साथ युद्ध कर रहे हैं। श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की, इसके मूल में भगवती की ही कृपा है। महर्षि अगस्त्य से भगवान श्रीराम ने श्री विद्या की दीक्षा ली उसका अनुष्ठान किए। क्यूंकि अगस्त्य जी श्री विद्योपासक थे। भगवान श्रीराम ने अगस्त्य ऋषि से निवेदन किया कि-

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोहीं।

जेहिं प्रकार मारउं सुर द्रोही।।

यह श्रीराम रावण का युद्ध भक्ष्य और भक्षक का युद्ध है। अच्छाई और बुराई का संघर्ष है। धर्म और अधर्म का युद्ध है। इसलिए यह विजय अधर्म पर धर्म की विजय है, भक्षक पर भक्ष्य की विजय है, बुराई पर अच्छाई की विजय है। हम भी यदि अपने जीवन में विजय, विवेक और वैभव चाहते हैं तो रघुवंश शिरोमणि श्रीराम के समर विजय की गाथा का श्रवण मनन और चिंतन करते रहें।