परिवर्तन की नई आवाज बनती भारतीय लड़कियां
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे हालिया प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं की भागीदारी और उनके प्रति पुलिसिया रवैये ने व्यवस्था के एक अलग पहलू को सामने लाया है।
परंपरागत रूप से, महिलाएं घरेलू क्षेत्र तक अपने को सीमित रखती हैं, जिसमें पत्नी, मां और गृहिणी के रूप में उनकी भूमिकाओं पर बल दिया जाता है। परन्तु भारत में महिलाओं की भूमिका में व्यापक परिवर्तन देखा जा रहा है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए दो बड़े विरोध प्रदर्शनों, जुलाई 2026 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ और अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भारतीय छात्र राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में लड़कियों और महिलाओं की भूमिका का एक नया खाका तैयार किया है।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और छात्र संगठनों के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए चले लगभग एक महीने के लंबे आंदोलन में लड़कियों ने वैचारिक और जमीनी दोनों स्तरों पर कमान संभाली थी। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस आंदोलन को रेखांकित करते हुए लिखा है कि छात्राओं ने 'कमजोर' समझे जाने वाले मुहावरों को तोड़कर खुद को आंदोलन के मोर्चे पर स्थापित किया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे हालिया प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं की भागीदारी और उनके प्रति पुलिसिया रवैये ने 'व्यवस्था' के एक अलग पहलू को सामने लाया है। आंदोलनकारी छात्राओं ने अपने साक्षात्कारों में यह स्पष्ट किया है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती मात्र से राज्य का रवैया संवेदनशील नहीं हो जाता है। उनके अनुसार, राज्य व्यवस्था का चरित्र पुरुष प्रधान ही रहता है, चाहे वर्दी पुरुष ने पहनी हो या महिला ने।
जंतर-मंतर के ये हालिया घटनाक्रम दर्शाते हैं कि आधुनिक भारत में लड़कियां सिर्फ शैक्षणिक या आर्थिक सुधारों तक सीमित नहीं हैं। चाहे वह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता का मुद्दा हो या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की शुचिता या चुनाव आयोग की जवाबदेही का, देश की युवतियां राजनीतिक और संवैधानिक तंत्र को चुनौती देकर 'व्यवस्था परिवर्तन' की सबसे मुखर आवाज बन चुकी हैं।
दूसरी ओर जनरेशन अल्फा की छात्राओं और छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था की जर्जर और अपर्याप्त स्थिति के खिलाफ एक अभूतपूर्व और बड़े स्तर पर विरोध संघर्ष छेङा हुआ है। 'जेन जी' के पेपर लीक आंदोलनों से प्रेरणा लेकर स्कूली बच्चे सीधे सड़कों पर उतरकर व्यवस्था से जवाबदेही मांग रहे हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को बुनियादी अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है, जिससे लेकर देशव्यापी आंदोलन खड़ा हुआ है। यह असंतोष केवल भारत तक सीमित नहीं है।
फ्रांस में भी मैक्रों सरकार की शिक्षा नीतियों के खिलाफ जेन अल्फा के स्कूली छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे हैं। वहां छात्राओं की मांग है कि कक्षाओं में भीड़ कम की जाए, जर्जर इमारतों की मरम्मत हो और लंबे स्कूल समय (स्कूल ऑवर) की समीक्षा की जाए क्योंकि पढ़ाई का दबाव उनकी मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है। इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात का गवाह है कि सड़कों पर व्यवस्था परिवर्तन की अलख जगाने वाली युवा लड़कियां आगे चलकर देश और दुनिया की नीतियां तय करने वाली शीर्ष राजनीतिक नेता बनी हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके कुछ सबसे सशक्त उदाहरण हैं। न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत युवावस्था में एक सामाजिक कार्यकर्ता और लेबर पार्टी के युवा विंग के सदस्य के रूप में की थी। उन्होंने मानवाधिकारों, बाल गरीबी और पर्यावरण के मुद्दों पर आंदोलनों में भाग लिया। युवावस्था में जमीनी मुद्दों पर सक्रियता के कारण ही वह मात्र 37 वर्ष की उम्र में दुनिया की सबसे युवा महिला राष्ट्राध्यक्षों में से एक बनीं।
चिली में 2011 और 2019 के बड़े छात्र आंदोलनों का नेतृत्व युवा छात्राओं और लड़कियों ने किया था। इनमें से कैमिला वैलेजो एक प्रमुख छात्र आंदोलनकारी थी, जो बाद में चिली की संसद में पहुंचीं और वर्तमान में सरकार में मंत्री हैं। इसी तरह, इरीना कारामानोस ने एक नारीवादी कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की और चिली की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिनलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री साना मारिन एक बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आती थीं और उन्होंने युवावस्था में ही सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता शुरू कर दी थी। वह सोशल डेमोक्रेटिक यूथ की उपाध्यक्ष बनीं और नागरिक अधिकारों के आंदोलनों से जुड़कर आगे बढ़ीं। वह 34 वर्ष की आयु में फिनलैंड की प्रधानमंत्री बनीं और उनके नेतृत्व वाले गठबंधन दल की सभी पांचों नेता महिलाएं थीं, जिनमें से चार की उम्र 35 वर्ष से कम थी।
लड़कियों की शिक्षा के लिए तालिबान जैसे क्रूर संगठन के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत करने वाली युसुफजई मलाला आज वैश्विक स्तर पर नीति-निर्धारकों को प्रभावित करती है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ 'फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर' आंदोलन शुरू करने वाली ग्रेटा थनबर्ग ने दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों और संयुक्त राष्ट्र को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने यह साबित किया कि एक स्कूली लड़की भी वैश्विक राजनीतिक एजेंडे को बदल सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि आंदोलनकारी पृष्ठभूमि से आने वाली महिला नेता स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और बाल कल्याण जैसे संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर रखती हैं। पारंपरिक पुरुष-प्रधान राजनीति के मुकाबले, ये युवा महिला नेता 'व्यवस्था परिवर्तन' का एक नया और अधिक समावेशी खाका पेश करती हैं। जंतर-मंतर या वैश्विक मंचों पर प्रदर्शन करने वाली लड़कियों में सत्ता से सीधे सवाल पूछने का साहस होता है, जो भविष्य के एक अच्छे राजनेता का प्राथमिक गुण है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आज जो लड़कियां पेपर लीक या चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ आंदोलन का चेहरा बनी हुई हैं, वे केवल आज का प्रदर्शन नहीं कर रहीं, बल्कि वे अपनी राजनीतिक क्षमता को निखार रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण बताते हैं कि कल की यही आंदोलनकारी लड़कियां भविष्य में देश और दुनिया की मुख्यधारा की राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाली नेता बनेंगी। यह केवल महिला सशक्तीकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि देश की मानवीय क्षमता का बेहतर उपयोग करने का प्रश्न भी है।
जिस देश की आधी आबादी लंबे समय तक घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रही हो, वहां यदि लड़कियां शिक्षा, लोकतंत्र, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के सवालों पर नेतृत्व की भूमिका में आगे आ रही है, तो इसे केवल आंदोलनों तक सीमित रखना देश के लिए एक बड़ा अवसर गंवाना होगा। इन युवा महिलाओं की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनका राजनीतिक अनुभव केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है। वे विश्वविद्यालयों, सड़कों, ग्राम सभाओं, सामाजिक आंदोलनों और डिजिटल मंचों पर सवाल उठाते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को करीब से समझ रही हैं। वे प्रशासनिक निर्णयों के प्रभाव को सीधे महसूस करती हैं और सत्ता से जवाब मांगने का साहस भी रखती हैं।
आज के आंदोलनों में नेतृत्व कर रही ये लड़कियां भविष्य के राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रही हैं। आंदोलनों को केवल महिलाओं के मुद्दों तक सीमित नहीं समझना चाहिए। जब कोई छात्रा पेपर लीक, बेरोजगारी, चुनावी पारदर्शिता, पर्यावरण या संविधान की रक्षा के सवाल को लेकर सड़क पर उतरती है, तो वह केवल अपने अधिकार के लिए नहीं लड़ रही होती, बल्कि लोकतंत्र के व्यापक हित में नागरिक की भूमिका निभा रही होती है।
भारतीय लड़कियों का आंदोलनों में बढ़ता नेतृत्व इस बात का संकेत है कि देश की नई पीढ़ी केवल व्यवस्था के निर्णयों को स्वीकार करने के बजाय उनसे सवाल पूछने, जवाबदेही तय करने और बदलाव की दिशा निर्धारित करने के लिए तैयार है। जंतर-मंतर से लेकर वैश्विक मंचों तक, छात्राओं और युवा महिलाओं की सक्रियता लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह, संवेदनशील और समावेशी बनाने की संभावना प्रस्तुत करती है। इसलिए उनके संघर्षों को केवल तात्कालिक विरोध या छात्र राजनीति की गतिविधि मानकर नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा संस्थानों, राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं में उन्हें समान अवसर, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और नेतृत्व के लिए अनुकूल वातावरण मिले। आज व्यवस्था से सवाल पूछने वाली लड़कियों को यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित स्थान दिया जाता है, तो वे केवल अपने भविष्य का निर्माण नहीं करेंगी, बल्कि देश की राजनीति और समाज को भी अधिक न्यायपूर्ण, समानतापूर्ण और लोकतांत्रिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यही परिवर्तन की उस नई आवाज का वास्तविक अर्थ है, जो आज की युवा लड़कियों के संघर्षों से उभर रही है। इसलिए जंतर-मंतर पर खड़ी आज की लड़की को केवल प्रदर्शनकारी के रूप में देखना उसकी क्षमता को कम करके आंकना होगा। वह संभावित सांसद, विधायक, मंत्री, प्रशासक, न्यायविद, सामाजिक कार्यकर्ता या नीति-निर्माता भी हो सकती है। सवाल यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र उसे आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर देगा?
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)




