झांसी वालों, झाँसों से बचो

रानी की झाँसी की मानसिकता से बाहर निकल कर यदि झाँसी की रानी वाले विचार को अपनाएंगे तो समझ में आएगा कि वह झाँसी की जनता ही थी जो रानी लक्ष्मीबाई के पीछे चट्टान जैसी खड़ी रही। उसने कत्लेआम को सहा। परंतु आत्मसमर्पण नहीं किया।

Updated: Jan 02, 2022, 01:07 PM IST

झांसी वालों, झाँसों से बचो
Photo Courtesy: DNA

नया साल बेहद मनोरंजक ढंग से शुरु हुआ। आप लोग पहले नए बरस की मुबारक बाद कबूल करें। अब आगे बात करते हैं। ऐसा सुना है कि झाँसी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर वीरांगना लक्ष्मीबाई रेलवे स्टेशन होगा। तो यह आवश्यकता क्यों आ पड़ी ? यह कहा जायेगा कि शहर का नाम थोड़े ही बदला है केवल रेलवे स्टेशन का नाम ही बदला है। अब अगर एक ऐसे व्यक्ति को जो संभवतः विदेश से आ रहा हो और उसे बुंदेलखंड जाना हो तो वह कैसे समझ पाएगा कि वीरांगना लक्ष्मीबाई नगर रेलवे स्टेशन और झांसी पर्यायवाची हैं। इधर मध्यप्रदेश में भी इन्दौर में एक उपनगरीय रेलवे स्टेशन का नाम लक्ष्मीबाई नगर रेलवे स्टेशन है। दिल्ली में भी लक्ष्मी नगर है। सुभद्रा कुमारी चैहान अपनी प्रसिद्ध कविता झांसी की रानी (जी हाँ झांसी की रानी ही है शीर्षक/रानी की झीसी नहीं) में लिखती हैं,

"चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।"

तो यह शहर झाँसी की रानी का है या रानी की झाँसी का ?

हम सब झाँसी को जानते हैं। वहीं जाते भी है। यह भी जानते है कि लक्ष्मीबाई झाँसी की रानी थीं। तो नाम बदल देने से क्या सिद्ध होगा ? सवाल यह भी है नाम क्यों बदलना चाहते हैं ? लक्ष्मीबाई का जन्म तो बनारस में हुआ था। किसी पहचान को स्थायित्व देने की बजाए उसे मिटा देने को कैसे उचित ठहराया जा सकता है ? पहले भी हबीबगंज, मुगलसराय, इलाहाबाद व अन्य तमाम नाम बदले गए हैं। हमारे मिटाने से इतिहास मिट थोड़ी जाएगा। झाँसी शहर के मुख्य रेलवे स्टेशन से झाँसी नाम का हट जाना क्या अपरिपक्वता की निशानी नहीं है ? जब कुछ समझ न आए तो कुछ ऐसा कर दो कि चर्चा में आ जाओ ! क्या यह किसी स्वस्थ परंपरा की निशानी है ? रेलवे स्टेशनों आदि के नाम सामान्यतया उन्हीं शहरों के नाम पर रखे जो है, जहां पर वह स्थित होते हैं। इनका नाम वहां के प्रमुख व्यक्तित्वों पर रखना, वह भी ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर दर्शाता है कि अफसरशाही के पास वह दृष्टि नहीं है, जो एक लोकतांत्रिक समाज में होना चाहिए। यह तय है कि अब नाम में कुछ सुधार होंगे और तमाम तर्क (कुतर्क) भी सामने आएंगे।

सुभद्रा कुमार चैहान इसी कविता में लिखती हैं,

"महलों ने दी आग झोपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी

यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आई थी

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं

मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।"

तो इन तमाम शहरों, दिल्ली, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, पटना में भी ऐसे बेहद महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में जान गवाई है। उदाहरण के लिए क्या दिल्ली स्टेशन का नाम मुगल शहंशाह, बहादुर शाह जफर के नाम पर नहीं हो जाना चाहिए ? लखनऊ स्टेशन का नाम नवाब वाजिद अली शाह या बेगम हजरत महल के नाम से क्यों न हो ? इसी तरह मेरठ, कानपुर, पटना आदि के रेलवे स्टेशनों के नाम भी बदल दिए जाने चाहिए। रानी की झाँसी की मानसिकता से बाहर निकल कर यदि झाँसी की रानी वाले विचार को अपनाएंगे तो समझ में आएगा कि वह झाँसी की जनता ही थी जो रानी लक्ष्मीबाई के पीछे चट्टान जैसी खड़ी रही। उसने कत्लेआम को सहा। परंतु आत्मसमर्पण नहीं किया। जननायक तभी जननायक बन पाते है जब उनके साथ जनता होती है। झाँसी और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई में न कोई छोटा है न बड़ा । दोनों अभिन्न है और दो पहियों की तरह हमेशा समानांतर ही रहे हैं।

पं. सुंदरलाल अपने लेख, ‘‘लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे’’ में लिखते हैं, ‘‘झाँसी की स्थिति अब और अधिक निराशाजनक हो गई, फिर भी रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत न हारी। 3 अप्रेल को अंग्रेजी सेना ने झांसी पर अंतिम बार हमला किया। चारों ओर से एकसाथ आक्रमण होने लगा। रानी घोड़े पर सवार सिपाहियों और अफसरों के हौसले बढाती हुई, उनमें जेवर और खिलवत बांटती हुई, बिजली की तरह इधर से उधर फिर रहीं थीं।’’ गौर करिए कोई यह नहीं पढ़ाता कि रानी लक्ष्मीबाई ने क्रांतिकारियों को साथ लेकर जयाजीराव सिंधिया की सेना को हराकर ग्वालियर पर भी कब्जा कर लिया था। जयाजीराव और उनके मंत्री, दिनकर राव को मैदान छोड़कर आगरा की तरफ भागना पड़ा था। इतिहास या गाथा पढ़ने-पढ़ाने में सरकार की कोई रुचि नहीं है। वे समझते हैं जैसे नाम बदल देने भर से सारी दुनिया रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र में निहित वीरता को आत्मसात कर लेगी।

और पढ़ें: क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी

गौर करिए बहुत ही महत्वपूर्ण विवरण है, उस दिन का जब नाना पेशवा ने ग्वालियर का साम्राज्य संभाला। खजाना अपने कब्जे में लिया। यह भी समझना होगा कि इसके बाद रानी की हार क्यों हुई। उनका शौर्य व बलिदान अब विषय नहीं रह गया है। याद रखिए महज एक जड़ स्थान का नाम अपने समय की सर्वाधिक चेतन प्राणी के नाम से कर देना कोई समझदारी की बात नहीं है। सोचिए रानी कब तक लड़ी ? पंडित सुंदरलाल लिखते हैं, ‘‘रानी बिल्कुल अकेली रह गई। उसने अकेले ही सबका अपनी तलवार से मुकाबला किया। एक सवार ने पीछे से आकर रानी के सिर पर वार किया। सिर का दाहिना भाग अलग हो गया, दाहिनी आँख भी निकलकर बाहर आ गई, फिर भी लक्ष्मीबाई घोड़े पर डटी हुई अपनी तलवार चलाती रही। इतने में एक वार रानी की छाती पर हुआ। सिर और छाती दोनों से खून का फव्वारा छूटने लगा। बेहोश होते-होते रानी ने अपनी तलवार से उस गोरे सवार को जिसने सामने से वार किया था काट कर गिरा दिया। इसके बाद लक्ष्मीबाई की भुजा में और अधिक शक्ति नहीं रह गई थी।’’

और पढ़ें: काशी, वाणारसी, बनारस या विमुक्त

तो झाँसी वालों इस कहानी को विस्तार से जानिये और झांसी और लक्ष्मीबाई दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बने रहने दीजिए। अन्यथा बहुत अधिक समय नहीं है, जब रानी लक्ष्मीबाई भी महज एक जड़ प्रतीक बन कर रह जाएंगी। वैसे भी सुभद्रा कुमारी चौहान लिख भी चुकी हैं,

"तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी

बुंदेले हर बोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।"

अब उत्तरप्रदेश में हुए एक और नामकरण पर बात करते हैं। उन्नीसवीं - बीसवीं सदी के बेहतरीन शायर हुए हैं ‘‘अकबर इलाहाबादी’’। उनकी शायरी में जैसा तीखा व्यंग्य था वैसा उर्दू शायरी के अन्यत्र नहीं दिखता। साथ ही जनता से उन जैसे जुड़ाव वाला शायर भी शायद ही दूजा हुआ होगा। वे कहते हैं,

रहता है इबादत में हमें मौत का खतरा।

हम याद-ए-खुदा करते हैं, कट ले न खुदा याद।

उत्तरप्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग की वेब साइट से एक दिन पता लगा कि अकबर इलाहाबादी अब अकबर प्रयागराजी हो गए हैं। वैसे वे मूलतः सैयद अकबर हुसैन रिजवी थे। तो साहब यह एक नई रीत उत्तरप्रदेश से चल गई| अब व्यक्ति के उपनाम भी स्वमेव बदल जाएगे। यदि यह नियम है तो महाराष्ट्र में तो कहर ही बरप जाएगा। वहां तो तमाम उपनाम (सरनेम) विशिष्ट अंचलो के नाम रखना आम है। मान लीजिए भविष्य में कभी पुणे का नाम बदल दिया गया। तो पुणेकर, पूनावाले जैसे तमाम उपनाम वाले क्या हो जाएंगे ?

शिक्षा सेवा आयोग का कहना है कि उसकी वेबसाईट हेक हो गई थी। मान लिया कि ऐसा हो गया होगा। तो कर्मचारी क्या वेबसाइट बनाने के बाद क्या दोबारा उसे देखते ही नहीं ? अकबर (इलाहबादी) उर्फ़ प्रयागराजी ने लिखा है,

गांधी तो हमारा भोला है और शेख ने बदला चोला है,

देखो तो खुदा क्या करता है, साहब ने भी दफ्तर खोला।।

तो साहब क्या दफ्तर खुला। दफ्तर भी तालीम देने वालों की भर्ती करने का। परंतु उस दफ्तर ने खुदा जाने क्या से क्या कर दिया। मरने के 100 साल बाद, नाम तक बदल दिया। याद करिए ये वे शायर हैं जो एक साँस में लिखते हैं।

और पढ़ें: लोकतंत्र पर कसता राज्य का शिकंजा और संवैधानिक मूल्यों का पतन

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम।

वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।

एक विभाग क्या कर रहा है, वह या तो जानता नहीं है कि वह क्या कर रहा है या वह अच्छे से जानता है कि क्या किया जा रहा है और क्यों किया जा रहा है। अकबर इलाहाबादी, खुद पर तंज करते हुए लिखते हैं

कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ।

रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।।

क्या आज की स्थिति में इससे कुछ अलग होता है ? जनता के नाम पर जो हो रहा है, वह सच में अब डरावने से ज्यादा हास्यास्पद लगने लगा है। एक के बाद एक जगहों के नाम बिना सोचे समझे बदलना और जनता का विरोध सामने न आना यह बता समझा रहा है कि हम अपनी स्थानीयता के महत्व को समझते ही नहीं हैं। वरना क्या वजह है कि इस तरह के बेसिरपैर के फैसलों का स्थानीय स्तर पर विरोध तक नहीं होता। एक शताब्दी पहले जो उन्होंने लिखा है उसे आज चिकित्सकों से माफी के साथ लिखने की इजाजत चाहता हूँ,

‘‘जान शायद फरिश्ते छोड़ भी दें

डाक्टर फीस न छोड़ंगे।।’’

इसलिए हमें समझना होगा कि यदि व्यक्ति की पहचान किसी जगह से होती है तो कई बार जगह की पहचान भी व्यक्ति से होती है। यह दोनों स्थितियां अकबर इलाहबादी और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे नामों की विवेचना से अच्छे से समझी जा सकती है। अकबर इलाहबादी एक और बेहद मजेदार व सारगर्भित शेर लिखते हैं,

सुन लो भेद, मुल्की तो गांधी के साथ हैं

तुम क्याह हो ? सिर्फ पेट, वह क्या है ?

(वह) हाथ है।

आज जो गांधी को गालियां बक रहे हैं, उन जैसे लोग 100 साल पहले भी थे और अकबर इलाहाबादी उन्हें तब भी सीधे उनकी आँखों में झांककर ललकार रहे थे और उन्हें उनकी हैसियत बता रहे थे। उत्तरप्रदेश सरकार ने नाम परिवर्तन की जो मुहीम चला रखी है वह अपने आप में एक बेहद अजीबोगरीब परिस्थिति पैदा करता जा रहा है। वे लिखते हैं

थी शबे तारीख (अंधियारी रात) चोर आए जो कुछ था ले गए / कर ही क्या सकता था बंदा खाँस लेने के सिवा।।

हमारे सामने हमारी विरासत को हमसे छीना जा रहा है। उसके गैरजरुरी मायने समझाये जा रहे हैं। और हम सिर झुकाए वह सब मानते भी जा रहे हैं। परंतु अपने समय में न झांसी की रानी ने अपनी समझ से समझौता किया और न अकबर इलाहाबादी ने। अकबर इलाहाबादी अपने व्यंग्य में जो तीखापन लाते हैं उसे देखकर लगता है कि हरिशंकर परसाई उन्हीं की विरासत को आगे ले गए हैं। अकबर इलाहाबादी की इन पंक्तियों पर गौर करिए और उनके साथ रानी लक्ष्मीबाई को भी याद करिए;

""बेपर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीवियां

अकबर जमीं में हैरते कौमी से गड़ गया

पूछा जो उनसे आपका परदा वो क्या हुआ

कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों की पड़ गया।।"

अब इसके बाद और कहने को रह गया है ? हुक्मरान भी पढ़ें तो तो अच्छा है।

 (गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्रा के यह स्वतंत्र विचार हैं)