Maoism in Chhattisgarh: गोली नहीं बातचीत से खत्म होगी नक्सल समस्या, 100 फीसदी गोंड आदिवासियों की राय

Gond tribals: तीन भाषाओं में हुए सर्वे में शत प्रतिशत गोंड भाषी आदिवासियों ने कहा कि शांतिपूर्व तरीके से होना चाहिए प्रदेश में माओवाद की समस्या का निराकरण

Updated: Oct-21, 2020, 10:25 PM IST

Maoism in Chhattisgarh: गोली नहीं बातचीत से खत्म होगी नक्सल समस्या, 100 फीसदी गोंड आदिवासियों की राय

रायपुर। सभी गोंड आदिवासी चाहते हैं कि माओवाद की समस्या का हल बातचीत के माध्यम से निकलना चाहिए। इस बात का खुलासा स्थानीय गैर-सरकारी संस्था सीजी नेट के सर्वे में हुआ है। इस सर्वे में बस्तर और देश के कुल 3760 लोगों ने अपने मत दिया है। यह सर्वे तीन भाषाओं में हुआ है, इनमें 76% लोगों ने हिंदी भाषा में, 18% लोगों ने गोंडी और 6% लोगों ने हल्बी भाषा में मत देकर अपने विचार व्यक्त किए। माओवाद का गढ़ बन चुके बस्तर इलाके के 90 प्रतिशत से अधिक लोगों का मानना है कि यह एक राजनैतिक समस्या है, इसका समाधान राजनैतिक गलियारे से ही निकाला जा सकता है। लोगों ने सर्वे में कहा कि नक्सली समस्या को खत्म करने के लिए पुलिस, नक्सली और जनता सभी को एक साथ होकर काम करना पड़ेगा।

दरअसल ‘नई शांति प्रक्रिया’ के बैनर तले यह ई सर्वे किया गया। एनजीओ सीजी नेट के प्रणेता शुभ्रांशु चौधरी का कहना है कि 600 से ज्यादा गोंड आदिवासियों ने इस सर्वे में अपना संदेश गोंडी में रिकॉर्ड किया है। लगभग सौ प्रतिशत गोंड आदिवासियों ने कहा कि माओवाद की समस्या का अंत बातचीत से ही होगा, गोली से नहीं। इस सर्वे में कुल 18 प्रतिशत लोगों ने गोंडी भाषा में अपना मत दिया। गोंडी में मत देने वाले सौ फीसदी लोगों का मानना है कि माओवादी समस्या गोली से हल नहीं होगी। इसमें हिंदी के अलावा स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषा करवाया गया है।

इस ओपीनियन पोल में 8 फीसदी लोगों ने नक्सल समस्या को एक क़ानूनी व्यवस्था से जुडा मामला कहा है। इन लोगों का कहा कि माओवाद का समाधान पुलिस और सेना की मदद से निकाला जाना चाहिए।

संवादहीनता के कारण बढ़ी है समस्या

शुभ्रांशु  चौधरी ने बताया कि गोंडी भाषा में हमारे यहां कोई काम नहीं हुआ है। माओवादी जंगल का अधिकार मांगते हैं। 99 प्रतिशत गोंड आदिवासी अन्य भाषा नहीं जानते जबकि 99 प्रतिशत माओवादी गोंडी भाषी हैं।  गोंड भाषा के जानकार माओवादी जो उनसे कह देते हैं, वे उसे मान लेते हैं। संवादहीनता के चलते यह समस्या है। सरकारों को समझना पडेगा कि इनकी क्या मांगें हैं। पुलिस और सेना अगर कहीं 5 माओवादियों का अंत करती है तो वहीं 15-20 नए माओवादी तैयारी हो जाते हैं। माओवादी रोटी, कपड़ा, मकान, की मांग नहीं करते। ये जंगल और जमीन से जुड़े लोग हैं।  

डर के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं लोग

शुभ्रांशु चौधरी कहा कि लोग डर के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं। कब तक ऐसा चलता रहेगा? शांति प्रक्रिया के एक मॉडल की खोज की आवश्यकता है। इसी कारणवश जनता से सीधी बात के माध्यम से ई-सर्वेक्षण किया गया है। ऑनलाइन कार्यक्रम बस्तर डायलॉग 6 का आयोजन इसी कड़ी में किया गया। जिसमें छत्तीसगढ़ के बारे में चर्चा हुई। इसमें कोलंबिया, फिलीपींस, नेपाल और आंध्र प्रदेश के लोगों ने अपने-अपने इलाकों में होने वाली शांति प्रक्रिया के बारे में भी बताया है। साथ ही यह भी चर्चा हुई कि छत्तीसगढ़ किस तरह इससे सीख लेकर अपने यहां माओवाद की समस्या का हल निकाल सकता है।

इसी कड़ी में गैर-सरकारी संस्था सीजी नेट ने एक सर्वे करवाया। तीन भाषाओं में हुए इस सर्वे में गोंडी भाषी लोगों ने कहा कि शांतिपूर्व तरीके से माओवाद की समस्या का हल होना चाहिए। इसे बंदूक से नहीं हल किया जा सकता। तीन भाषाओं में ओपीनियन पोल हुआ 600 लोगों ने गोड़ी भाषा में संदेश रिकॉर्ड किया गया। 

एक मंच पर आएं पुलिस, जनता और नक्सली

इस सर्वे में नारायणपुर जिले के सेतै दुग्गा का मानना है कि सभी पक्षों को एक प्लेटफार्म पर आना चाहिए। गोंडी बोली में दुग्गा ने बताया है कि ‘पुलिस, जनता और नक्सली तीनों एक मंच में आएं, अब बस्तर को शांति की आवश्यकता है। जबतक सभी पक्ष एक मंच पर अपनी-अपनी बात नहीं रखेंगे इस समस्या का हल निकलना मुश्किल है।

कुछ लोगों ने हिन्दी में भी अपना मत रिकॉर्ड किया है। बस्तर के ग्राम-बड़ेकिलेपाल के रहने वाले मोसूराम पोयाम ने हिंदी में कहा है कि ‘समाज और ग्रामवासी बैठकर इस समस्या को सुलझा सकते हैं, सिर्फ पुलिस बल से यह समस्या हल नहीं होगी, बैठकर बात करने से ही हिंसा हटेगी नहीं तो नहीं हटेगी।’

डेढ़ महीने में पूरा हुआ है ई सर्वे

बस्तर इलाके में लंबे वक्त शांति प्रक्रिया के लिए मॉडल तलाशने की कवायद की जा रही थी। जिसके तहत यह सर्वे किया गया। शांति प्रक्रिया का मॉडल तलाशने में पिछले तीन साल से इलाके के कुछ स्थानीय लोग और समाजसेवी लगे हुए हैं। जो बस्तर जैसे घुर माओवादी इलाके में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया के लिए एक मॉडल खोज रह हैं। यह ई सर्वेक्षण स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त से गांधी जयंती 2 अक्टूबर के बीच किया गया।

बस्तर और देश के कुल 3760 लोग सर्वे में हुए शामिल

एनजीओ सीजी नेट की ओर से हुए इस सर्वे में बस्तर और देश के कुल 3760 लोगों ने अपना मत दिया है। बस्तर के दरभा ब्लॉक से गंगाराम बारसे ने अपना संदेश गोंडी भाषा में दर्ज करवाया है उन्होंने कहा है कि ‘पक्ष विपक्ष की बातों से ऊपर ऊठकर, बस्तर में शांति के लिए सभी बात करें। सभी पक्षों को एक साथ मिलकर इसका हल जल्द ढूंढ़ना चाहिए’।