इस साल 25 फ़ीसदी गिर सकती है देश की GDP, देश के जानेमाने अर्थशास्त्री की चेतावनी

मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने कहा है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान देश की GDP में भारी गिरावट आने की आशंका है, देश की अर्थव्यवस्था में उतना सुधार नहीं हो रहा, जितना सरकार दावा कर रही है

Updated: Jan 17, 2021, 08:17 PM IST

इस साल 25 फ़ीसदी गिर सकती है देश की GDP, देश के जानेमाने अर्थशास्त्री की चेतावनी
Photo Courtesy : Madhyamam

नई दिल्ली। लॉकडाउन के कारण तबाह हुई देश की अर्थव्यवस्था में सुधार उस रफ़्तार से नहीं हो रहा, जिसका दावा मोदी सरकार कर रही है। ये मानना है देश के जानेमाने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का। उनका अनुमान है कि इतिहास की सबसे बड़ी मंदी से जूझ रही देश की इकॉनमी को चालू वित्त वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP में 25 फ़ीसदी की भयानक गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। देश के एक बड़े अर्थशास्त्री की यह चेतावनी ऐसे वक़्त में आई है, जब मौजूदा वित्त वर्ष ख़त्म होने में मुश्किल से ढाई महीने बाक़ी हैं। प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने यह भी कहा है कि जीडीपी में इस भारी गिरावट की वजह से सरकार के तमाम बजट अनुमान पूरी तरह पटरी से उतर चुके हैं, लिहाज़ा सरकार को उनमें भारी बदलाव करना होगा।

रिकवरी के सरकारी दावे सही नहीं : प्रोफसर अरुण कुमार

रविवार को दिए एक इंटरव्यू में प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने कहा कि सरकार भारत में आर्थिक विकास की रफ़्तार में तेज़ी से सुधार होने के दावे तो कर रही है, लेकिन इन दावों में दम नहीं है। इसकी वजह यह है कि असंगठित क्षेत्र में अब तक रिकवरी शुरू भी नहीं हुई है और सर्विस सेक्टर के एक बड़े हिस्से भी अब तक आर्थिक झटके से बाहर नहीं आ सके हैं। अरुण कुमार के मुताबिक़ उनका विश्लेषण तो यह है कि चालू कारोबारी साल में ग्रोथ रेट माइनस 25 फ़ीसदी रहेगी, क्योंकि पूरे लॉकडाउन के दौरान सिर्फ़ बेहद ज़रूरी वस्तुओं का उत्पादन ही हो रहा था और उस दौरान खेती बाड़ी में भी कोई ग्रोथ नहीं हो पा रही थी।

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार के ये अनुमान रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के अनुमानों के अनुमानों के मुक़ाबले इकॉनमी की ज्यादा डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। RBI के मुताबिक़ चालू कारोबारी साल में देश की जीडीपी 7.5% घट जाएगी, जबकि NSO का मानना है कि इसमें 7.7% की गिरावट दर्ज की जा सकती है। NSO के आँकड़ों के मुताबिक़ अप्रैल से जून 2020 के दौरान देश की जीडीपी में 23.9% की गिरावट आई थी, लेकिन जुलाई से सितंबर 2020 के दौरान इसकी हालत तेज़ी से सुधरी। इस तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेज़ी से सुधार होने की वजह से जीडीपी में 7.5% की गिरावट देखने को मिली, जो पिछली तिमाही से काफ़ी कम थी।

पिछले अनुमानों में बदलाव की बात तो सरकारी दस्तावेजों में भी है : अरुण कुमार

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि अप्रैल से जून और जुलाई से सितंबर के जीडीपी के आँकड़े पेश करने वाले सरकारी दस्तावेज़ों में भी कहा गया है कि आने वाले दिनों में इनमें संशोधन किए जाने के आसार हैं। उनका यह भी कहना है कि इस बार केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा पिछले साल के मुक़ाबले काफ़ी अधिक होगा, जबकि राज्य सरकारों का घाटा तो और भी ज़्यादा रहने की आशंका है। दूसरी तरफ़ सरकार को विनिवेश से होने वाली आमदनी में लक्ष्य से काफ़ी कम रहेगी। टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू में भी गिरावट देखने को मिलेगी।

जल्द टीकाकरण और लोगों का काम पर लौटना रिकवरी के लिए ज़रूरी : अरुण कुमार

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार के मुताबिक़ भारत की आर्थिक रिकवरी कई बातों पर निर्भर है, जिनमें टीकाकरण की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करना और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का अपने काम पर वापस लौटना बेहद अहम है। इतना ही नहीं, उनका मानना है कि 2021 में देश का जीडीपी उतना भी नहीं होगा, जितना 2019 में था। हाँ, वैक्सीनेशन पूरा हो जाने के बाद 2022 में हम वापस उस स्तर पर पहुँचने की उम्मीद कर सकते हैं, जहां 2019 में थे।

बेस इफेक्ट के कारण आंकड़े भले ही बेहतर दिखें, सच्चाई नहीं बदलेगी: अरुण कुमार  

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने बताया कि आने वाले वर्षों में   विकास दर इसलिए बेहतर नज़र आ सकती है, क्योंकि उनकी तुलना जिन पिछले वर्षों से की जाएगी, वो बेहद ही ख़राब प्रदर्शन वाले होंगे। (अर्थशास्त्र की भाषा में इसे Low Base Effect कहते हैं) लेकिन इन बेहतर दिखने वाले आंकड़ों के बावजूद हकीकत यही होगी कि हमारा उत्पादन का स्तर 2019 से कम ही होगा। सरकारी खजाने के घाटे के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्री पिछले साल जुलाई से लगातार कहते आ रहे हैं कि सरकार को अभी घाटा बढ़ने के बावजूद अपना खर्च बढ़ाना चाहिए। खास तौर पर असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों में खर्च बढ़ाना बेहद ज़रूरी है। जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा, आर्थिक मंदी से निपटना और कंज्यूमर डिमांड में सुधार लाना आसान नहीं होगा।