सोया स्टेट में सोयाबीन के बीज की भयंकर किल्लत, पीले सोने से किसानों को भटकाने की सरकारी कोशिश

मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने सोयाबीन को बताया घाटे का सौदा, विशेषज्ञों का आरोप- जीएम बीज लॉबी को न्योता देने की रची जा रही साजिश

Updated: Jun 20, 2021, 10:12 PM IST

सोया स्टेट में सोयाबीन के बीज की भयंकर किल्लत, पीले सोने से किसानों को भटकाने की सरकारी कोशिश
Photo Courtesy: krishi jagran

भोपाल। सोया स्टेट नाम से विख्यात भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य मध्यप्रदेश के किसान सोयाबीन के बीजों की भयंकर किल्लत से जूझ रहे हैं। राज्य में गुणवत्तापूर्ण बीज नहीं मिल रहे हैं, वहीं बीज मिल भी रहे हैं तो माफिया 8 से 12 हजार रुपए प्रति क्विंटल मांग रहे हैं। जबकि राज्य के कृषि मंत्री कमल पटेल सोयाबीन को घाटे का सौदा बताकर किसानों को हतोत्साहित करने में जुटे हैं। लेकिन किसान मंत्री के इस बयान पर आसंकित इसलिए हैं क्योंकि एक तो बीज के दाम तेज़ी से बढ़ रहे हैं, दूसरे उसकी किल्लत जानबूझकर बढ़ायी जा रही है। किसानों को शक है कि कहीं ये जीएम क्रॉप को बैकडोर से एंट्री देने के षड़यंत्र के तहत तो नहीं हो रहा है।

किसान नेता केदार सिरोही कहते हैं कि, 'मध्यप्रदेश में अबतक पारंपरिक बीजों का उपयोग होता रहा है। इससे जीएम लॉबी यानी जेनेटिकली मोडिफाइड बीज बेचने वाली कंपनियों को कोई फायदा नहीं होता था। अब उन कंपनियों ने राज्य के नेताओं व अधिकारियों से सेटिंग कर ली है, नतीजतन खराब गुणवत्ता वाले बीज किसानों को दिए जा रहे हैं। मकसद है कि किसानों का पारंपरिक बीज से मोहभंग हो ताकि भारत के बाजारों पर जीएम लॉबी राज कर सके।'  उनके मुताबिक बीज की किल्लत उत्पन्न की गई है, ताकि जीएम लॉबी को फायदा पहुंचाया जा सके। नतीजतन खरीफ सत्र के दौरान अमूमन जो 60 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की बुआई होनी थी वह इस साल 30 से 40 लाख हेक्टेयर तक सिमटने की आशंका है।

 हालांकि, अमूमन देखने को मिला है कि किसानों को जिस फसल का अनुभव होता है उसमें नुकसान की आशंका कम रहती है और यहां के किसानों को लगभग 30 वर्षों का अनुभव भी है। इसके बावजूद राज्य में गुणवत्तापूर्ण बीज न होने के कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादन 20 क्विंटल की बजाए 7 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है।

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हालांकि, लगभग एक दशक से किसानों का सोयाबीन से मोहभंग हो रहा है। कारण यह है कि सोयाबीन की खेती में लगातार नुकसान हो रहा है। उत्पादन कम होने की वजह से किसानों को लागत से भी कम पैसे मिल रहे हैं। कुछ दशक पहले तक पीला सोना कहा जानेवाला सोयाबीन आज घाटे का सौदा क्यों बन गया इस बारे में विशेषज्ञों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि व्यापारी, अधिकारी और राजनेता मिलकर  किसानों के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं। जिस वजह से किसान लागातार कर्ज तले दबते जा रहे हैं। बीते कुछ सालों में किसानों के आत्महत्या की घटनाएं बढ़ीं हैं। किसानों को इस स्थिति से उबारने के लिए अब कृषि मंत्री कमल पटेल मैदान में आए हैं। पटेल ने गुणवत्तापूर्ण बीज तो मुहैया कराने की बात नहीं की है बल्कि उन्होंने सोयाबीन को घाटे का सौदा करार देते हुए अल्टरनेट ऑप्शन पर विचार करने यानी दूसरी फसल लगाने का सुझाव दिया है।

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दरअसल, मध्यप्रदेश में 90 की दशक में किसानों ने सोयाबीन की जमकर खेती की। यह वह दौर था जब सोयाबीन को राज्य का पीला सोना कहा जाता था। किसानों की मेहनत ने प्रदेश को भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य बना दिया और दुनियाभर में मध्यप्रदेश के सोयाबीन सप्लाई होने लगे। सोयाबीन की फसल को ही तब मध्यप्रदेश की समृद्धि का कारण माना जाता था।