आदत नहीं, बीमारी है लेज़ीनेस, ये 7 आदतें लोगों को रखती हैं हमेशा एक्टिव
आलस्य को आज सिर्फ आदत नहीं मानसिक-शारीरिक समस्या माना जा रहा है। जापान में इसे बीमारी की तरह देखा जाता है। वहां लोगों ने अपने दिनचर्या में कुछ ऐसी आदतें डाली हैं जिनसे वह इस बीमारी से दूर रहते हैं।
सुबह अलार्म बजता है लेकिन उंगली खुद ही स्नूज़ पर चली जाती है। काम सामने होता है फिर भी मन नहीं लगता। दिन भर थकान रहती है जबकि शारीरिक मेहनत नाममात्र की होती है। ये कुछ और नहीं बल्कि आलस्य है जो कि आज के समय में सिर्फ कामचोरी नहीं बल्कि मानसिक थकावट और बिगड़ी हुई दिनचर्या का नतीजा बन चुका है। लोग अकसर मूड नहीं है, आज मन नहीं है कहकर अपने काम को टाल देते हैं लेकिन धीरे-धीरे यही टालना लोगों की आदत बन जाती है। इन दिनों लोगों में बढ़ती ये आदत एक समस्या बनती जा रही है।
दुनिया के कई देशों में आलस्य को कमजोरी माना जाता है लेकिन जापान में इसे एक बीमारी के रूप में देखा जाता है। वहां मान्यता है कि अगर इंसान लगातार टाल रहा है तो दिक्कत उसके इरादों में नहीं उसके सिस्टम में है। इसी सोच से जापान ने आलस्य से निपटने के कुछ ऐसे तरीके अपनाए हैं जो अब वैश्विक चर्चा का विषय बन चुके हैं।
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1) काइजेन
जापानी सोच के मुताबिक शुरुआत इतनी छोटी होनी चाहिए कि दिमाग मना ही न कर सके। एक पुश-अप, एक लाइन लिखना या सिर्फ एक मिनट का काम। रिसर्च बताती है कि छोटे कदम मानसिक रुकावट को तोड़ते हैं और धीरे-धीरे बड़ी आदत बन जाते हैं।
2) इकिगाई
यह सवाल अहम नहीं कि आप क्या करते हैं बल्कि यह है कि आप क्यों उठते हैं। उद्देश्य और अर्थ से जुड़ा जीवन ऊर्जा और अनुशासन बढ़ाता है। जब क्यों का जवाब साफ होता है तो मेहनत बोझ नहीं लगती।
3) हारा हाची बु
जापान में बुजुर्ग 80% पेट भरते ही खाना बंद कर देते हैं। उनका मानना है कि ज्यादा खाना फोकस और मूड को बिगाड़ता है। हल्का पाचन मतलब ज्यादा ऊर्जा और मानसिक स्पष्टता। कई बार आलस्य शरीर पर पड़े अतिरिक्त बोझ का नतीजा होता है।
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4) एंकरड फोकस
एंकरड फोकस सिखाता है कि 25 मिनट काम और 5 मिनट आराम बेहद जरूरी है। साथ ही एक छोटा रिचुअल जैसे गहरी सांस, हाथ का इशारा या कोई साउंड। इससे दिमाग सीख लेता है कि यह संकेत मतलब फोकस। न्यूरोसाइंस इसे कंडीशनिंग कहता है और यह तेजी से असर करता है।
5) सेइरी और सेइटन
बिखरा कमरा मानसिक शोर पैदा करता है। रिसर्च बताती है कि अव्यवस्था तनाव बढ़ाती और फोकस घटाती है। साफ जगह से काम करने की इच्छा अपने-आप बढ़ती है।
6) किंत्सुगी
कई बार आलस्य असल में असफलता के डर की आड़ होता है। किंत्सुगी सिखाता है कि खामियां गलती नहीं बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा है। काम को परफेक्ट नहीं बल्कि पूरा करना जरूरी है।
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7) वाबी-साबी
जापानी लोग आदर्श हालात का इंतजार नहीं करते। जो है उसी से शुरुआत करते हैं। परफेक्शन एक्शन को टालती है जबकि एक्शन से स्पष्टता आती है।




