सिनीवाली शर्मा की कहानी: गिरेबां

Siniwali Sharma: भागलपुर (बिहार) में जन्मी सिनीवाली शर्मा अपनी ग्राम्य पृष्ठभूमि की संवेदनशील कहानियों के लिए चर्चित हैं। हंस, नया ज्ञानोदय, आजकल, कथानक, पाखी, कथादेश, परिकथा, लमही, इन्द्रप्रस्थ भारती, बया, निकट, माटी, कथाक्रम, विभोम स्वर में कहानियों का प्रकाशन, पहला कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' 2016 में प्रकाशित, अट्टहास एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य प्रकाशित, नोटनल पर ई-बुक प्रकाशित, हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा करतब बायस-कहानी का नाट्य मंचन

Updated: Sep 20, 2020 01:42 AM IST

सिनीवाली शर्मा की कहानी: गिरेबां
Photo Courtsey: meme arsenal

घर को जगमगाती धूप, अब अपनी थकी और उदास किरणें समेट कैक्टस पर जा टिकी। कमरे से आई जर्द आवाज ने सन्नाटा तोड़ा, "सुनो, जरा बाहर ले चलो।" 

प्रत्युत्तर में केवल दरवाजा हिला। 

यह आवाज उसी देह से आई जो उदासी और सन्नाटे के बीच रहा करती है। उसकी नज़र सामने धूल से भरी दीवाल घड़ी पर टिक गई। 

" वक्त बीत गया... या बीत नहीं रहा... !"

ढलती हुई शाम जब उदास और बेनूर होती है तो खनकती सुबह और मचलती दोपहर, बार-बार जेहन में तैर जाती है।

वो शादी के बाद पति के संग जीवन डोर बांध गांव आई थी। जीवन-.साथी की नौकरी शहर में थी। पर, वो अपनी मां का आंचल नहीं छोड़ता और वहीं मां, पुरखों की मिट्टी ! इस प्रेम में पति गांव से ही रोज नौकरी करने शहर जाता।

शादी के बाद वह गाँव तो आई  पर यहाँ की मिट्टी से जुड़ नहीं सकी। चूल्हे का धुआं, कुएं का पानी, मकई की रोटी, पति के पुरखों की माटी उसे नहीं भायी। शादी से पहले, कुछ समय वो शहर में रही थी। उसने वहाँ का रंग-ढ़ंग देखा था। वह उन चटख रंगों में डूब जाना चाहती थी। लेकिन नये जीवन का सवेरा गांव में हुआ, जहां का रंग धूसर था।

वह जब अपने टूटे सपनों को देखती तब मन मसोसती। कभी शिकायत, कभी उलाहने तो कभी गुस्से में जीवन साथी के आगे उफनते दूध की तरह  हो जाती। दो जोड़े पंख ला देने को कहती, जिनके सहारे दोनों शहर पहुंच जाएं और अपने सपनों का चटख रंगों से सजा महल बनाएं। लेकिन पति लोकलाज की दुहाई देता, अकेली मां का वास्ता देता। अपनी बात कभी दुलार से समझाता तो कभी-कभी हिदायत की मीठी गोली भी खिलाता।

शादी तय होने, मांग में सिंदूर लगने और पहली बार ससुराल से नैहर लौटने तक... अकेली बहू है! सास पलकों पर रखेगी, घर की रानी होगी! ये बातें उसके लिए गले में चमचमाती अशर्फी की तरह थीं। लेकिन शादी के कुछ महीने बाद ये चवन्नी बराबर भी नहीं रहीं।

ससुराल बसते ही, ता ता थैय्या ! अकेली बहू मतलब सौ झमेला। जिंदगी ही बेगानी हो गई।  

सब क्या कहेंगे, कैसी बहू है ? घर का जरा भी ध्यान नहीं ! एक बेटे का ही आसरा है और बहू ने तो बेटे को सिंदूर की डिबिया में बंद कर लिया है। नौकरी के बाद पति को इन्हीं बातों का सबसे पहले ध्यान आता। लेकिन घर की शांति और पत्नी की जरूरतों का ख्याल करते हुए साल में एक -दो बार किसी ना किसी बहाने घर से बाहर उसे उन्मुक्त उड़ान देता लेकिन रात होते-होते लौटकर वही...वही... वही, घर, सास और जिम्मेदारी !

जीवन में शौक-मौज के नाम पर बूंद-बूंद ही मिला। सास के नाम पर जीवन और जवानी दोनों कुर्बान। पर सास अकेली प्राणी हो तब तो ! चार भाइयों की इकलौती बहन और नैहर का  रास्ता भी घंटे भर का। उस पर भी आफत यह कि भतीजों की भरमार। कोई ना कोई दंडवत करने पहुंच ही जाता। सबसे अधिक परेशानी  ठिठुरती ठंड में होती जब...  

तिल सकरात* का भाड़ा, एक के बाद एक चारों भाइयों के यहां से आता। दही, कतरनी चूड़ा, तिलकुट, सास की और उसकी साड़ी, उसके लिए संदीप की चूड़ी और बंगाली सिंदूर। जो आता एकाध दिन रुक ही जाता। खातिरदारी के बाद बिछावन पर जाते-जाते उसकी कंपकंपी छूट रही होती, देह थक कर चूर हो रही होती अलग से।

सास, बहू और बेटे पर प्रेम लुटाती रहती। उसी प्रेम ने तो उसे जेल की सजा दे दी। आजाद होने की कई बार कोशिश की पर अभी तक की गई सभी कोशिशें नाकाम ही रहीं।

जिस तरह देवकी को कृष्ण ने कारावास से मुक्त किया उसी तरह उसके बेटे, गौरव का जन्म भी इसी पुण्य कार्य के लिए हुआ। प्रेम में पगा कुछ साल तो बीता। लेकिन एक दिन बेटे के स्वर्णिम भविष्य को ध्यान  में  रखकर माता ने विद्रोह कर दिया। जीवनसाथी के लाख समझाने पर भी वो टस से मस नहीं हुई। पति की सीख और हिदायतें, सब बेकार। सास की चातक दृष्टि भी बेकार।

उसे अच्छी तरह पता था, पढ़ाई का अवसर हाथ से निकल गया तो कारावास की उसकी सजा पता नहीं कितने साल और बढ़ जाएगी। नजदीकी शहर में अच्छा स्कूल है। बेटा दूसरे बच्चों की तरह पढ़ सकता है लेकिन आजकल बच्चे स्कूल जाने से पहले प्ले स्कूल जाते हैं। आगे चलकर इन्हें चांद छूना है, गांव में रहा तो यहां के दलदल में फंसकर रह जाएगा।

सास बहू को जानती थी। उसने  अपने बेटे से कहा, "आने वाले समय की सोचो।" बेटे ने कुछ सोचा फिर मां को साथ चलने के लिए कहा पर मां आंसू छुपाते हुए बोली, "दूर तो नहीं जा रहे हो, यहां से बस दो घंटे का ही तो रास्ता है जहां तुम नौकरी करते हो, वहीं अपना घर बना लो और बसा लो। मैं बीच-बीच में देखने आ जाया करूंगी।" भीतर उमड़ रहे आंसू कह रहे थे, मेरा कलेजा तो तुम लोगों के साथ ही चला जाएगा।

शहर की हवा थी, पानी था, जमीन थी, वो थी, जीवनसाथी था और बेटा था। वहां उनका सपनों का घर बन गया। पति ने अब हिदायत और सीख देना कम कर दिया।

एक दिन पति ने पत्नी से कहा, " हमारे घर में एक कमरा मां का भी होना चाहिए, उसकी जब मर्जी होगी आकर रहेगी।"

"हमारा बेडरूम, बेटे का स्टडी रूम, उसका लिविंग रूम, फलां फलां रूम... तो मुश्किल है। हां, वह लास्ट वाला रूम ठीक रहेगा उनके लिए। छोटा जरूर है पर ठीक रहेगा उनके लिए। शांति भी मिलेगी उन्हें।"

अब जो ठंड आती, गेंदे और गुलदावदी की खुशबू से नहा कर आती। पर अब वह ठंड नहीं आती जब रिश्तेदारी के नाम पर उसकी देह थक कर चूर हो जाती और ठंड से हाथ-पैर की उंगलियां ठंडी पड़ जातीं। हां, सास बराबर आती। चूड़ा, दही, तिलकुट, बड़ी, पापड़, अचार सहेज कर लाती।

शुरू-शुरू में आती तो कुछ दिन रुकती भी। पोते पर प्यार लुटाती। बेटे का घर घूम-घूम कर देखती। मन कसकता या दिल में कहीं कोई हिलोर उठती, ये तो बस उनका मन ही जानता। बहू, बेटे को स्कूल पहुंचाने, लाने, ट्यूशन और स्पोर्ट्स क्लास अटेंड कराने में लगी रहती। इन क्लासों के बीच वह अपना क्लास बदल चुकी थी।

जीवनसाथी देख, समझ और परख सब रहा था किन्तु उसने भी बहुत कुछ सोच कर बड़ा सा ताला अपने मुंह पर लगा रखा था। हालाँकि उसके भीतर कुछ कचोटता रहता। कोई शाम रही होगी जब भावना की लहर में बह कर पति ने चुप वाला ताला खोला और बोला, "मां तो अब बहुत कम आती हैं यहां। जब आती हैं तो थोड़ा समय उनके लिए भी निकाला करो।"

सामने की लहर शांत बनी रही। 

पति फिर बोला, "हर बार दशहरा में बस एक दिन के लिए मैं गांव जा पाता हूं। वहां भी तुम लोगों के बिना घर सूना-सूना लगता है।" पर वह यह नहीं बोल पाया कि हर बार मां की आंखों में सूनापन और गहरा होता जाता है।

इस बार लहर, लहराई। "हमारा घर तो यही है, तुम्हें जाना हो तो जाओ। बस बहुत दिन रह ली। वहां का ध्यान रखने के लिए तो तुम हो ही। हर महीने पैसे भेज ही देते हो। मैंने तो कुछ नहीं कहा। अब हमारा बेटा भी बड़ा हो रहा है। कल को बाहर पढ़ने जाएगा तो पैसों के बारे में सोचना पड़ेगा। मुट्ठी कसनी होगी।"

लेकिन उन्हें आगे नहीं सोचना पड़ा। इन बीते सालों में सास ने बहुत कुछ देखा-सुना और सहा। एक दिन चुपचाप चली गई सूने घर से-- वहां, जहां से कोई वापस नहीं लौटता। 

जीवनसंगिनी ने गीता की दो चार पंक्तियां जो कहीं पढ़ी थी उसका उपयोग किया और शरीर के नश्वर होने की बात समझाई। कर्म करने के नाम पर बेटे के भविष्य का वास्ता देकर जीवनसाथी को शोक की लहर से खींच कर बाहर निकाल लिया।

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समय अपनी रौ में बहता रहा और एक दिन दोनों के जीवन के आनंद का एकमात्र स्रोत उनका बेटा गौरव चांद छूने की कल्पना को सच करते हुए किसी बहुत बड़ी कंपनी में बहुत बड़े पद पर चांद की तरह सुशोभित हो गया।

चांद तो जमीन पर कभी उतरता नहीं, बस उसे निहारा जाता है। अब मां भी बस बेटे को दूर से टकटकी लगाए देखने लगी। सास की खाली हुई जगह पर अब वह थी। बिना कोई सीख और हिदायत दिए जीवनसाथी भी अपनी मां के पास जा चुका था।

गांव के घर से निकला सन्नाटा और सघन होकर शहर वाले सपनों के घर में कुंडली मारकर बैठ गया।

मोबाइल की घंटी से सूनेपन का ख़ामोश तार हिला। उसकी तंद्रा टूटी। मोबाइल कान से लगाया। हलो कहा और आंखें पनीली होते-होते रुक गईं। भारी आवाज में 'अच्छा' कहा और मोबाइल रख दिया।

उसने लेटे-लेटे खिड़की से देखा, धूप अब कैक्टस के पौधों से उतरकर जमीन पर गिरे सूखे पत्तों पर जा ठहरी थी।

दिन के उजाले में भी अब अंधेरा घुलने लगा था, उसने कुछ सोच कर फिर आवाज दी, "सुनो थोड़ी देर के लिए बाहर ले चलो।"

"बाहर तो बहुत ठंड है, बस अंधेरा होने ही वाला है", देखभाल के लिए आज ही आई नई लड़की ने कहा।

"अब तो देह ही ठंडी होने वाली है", लड़की की ओर देख कर बोली "तुम कहां थी ? पहले भी तुम्हें आवाज दी थी।"

"मेरी मां का फोन आ गया था शायद उनसे बात करते हुए नहीं सुन पाई।"

"मां, अच्छा तुम्हें पता तो है तुम्हारी मां कैसी है, उनकी सेहत... " बोलना चाहा पर चुप रही। कुछ देर बाद बोली,  "बहुत अच्छा करती हो बेटी।"

"आप यह शॉल ओढ़ लीजिए, थोड़ी देर आपको बाहर बैठा देती हूं। फिर भीतर आकर दवाई ले लीजिए।"

"दवाई, कोई ऐसी दवाई देना जो मेरा इंतजार खत्म कर दे", फिर संभलते हुए बोली "सुनो, सामने कैलेंडर में कल की तारीख काट देना। काला पेन वहीं टेबल पर रखा है। मेरा बेटा कल फिर नहीं आएगा। बहुत काम रहता है उसे। बहू समाज सेवा में लगी रहती है और बच्चों को अपने क्लासेज से छुट्टी नहीं मिलती।" बोलते हुए उसकी आंखें सूखे पत्तों में न जाने क्या खोजने लगीं।

"मेड से कहना आज खाने का जी नहीं है।"

"लेकिन सोने से पहले आपको दवाई भी लेनी है। दोपहर में भी नहीं खाया था आपने। थोड़ा सा कुछ भी खाना ही होगा !"

"भूखी कहां रहती हूं गम खाती हूं!"

लड़की ने उसके हाथों को धीरे से सहलाया, "मैं दलिया बनाने बोल देती हूं।"

"तब तो तुम मुझे बिछावन पर भेज दोगी घंटे भर में।" 

बाहर से भीतर आते हुए वो एक बंद कमरे की ओर इशारा करते हुए बोली, " अब तुम मुझे उस लास्ट वाले कमरे में ले चलो। 

"अभी तो आप बाहर से आई हैं, थोड़ी देर लेट जाइये।"

"नहीं, पहले ले चलो। बच्चे मेरा इंतजार कर रहे होंगे और मेरा बीता हुआ कल भी। उस कमरे में जी भर कर बातें करती हूं बच्चों से, शैतानियां देखती हूं, कहानियां सुनाती हूँ और वे मेरे कंधों पर झूलते हैं।"

देखभाल करने वाली लड़की आज ही आई थी। सुबह से इस घर का सूनापन पढ़ रही थी। फिर उसे लगा डिप्रेशन का असर हो सकता है।

तुरंत संभलते हुए बोली, "ठीक है, फिर लौट कर टाइम से खाना और दवाई लेकर बिछावन पर जाना है।" 

उसने किसी भोली बच्ची की तरह जिद करते हुए कहा, "पहले ले तो चलो।"

लड़की ने बताया हुआ कमरा खोला। बिछावन पर एक गोलमटोल बड़ी सी गुड़िया सोई थी। नीचे फर्श पर दीवार के सहारे एक बड़ा सा गुड्डा आंखों के सामने बेतरतीब बाल लटकाए हंस रहा था।

"देखो, इन बच्चों को देखो, मेरा घर सूना कहां है ! अभी इनको बाहर निकाल दूं तो सारा घर सिर पर उठा लेंगे। इनकी बातें और फरमाइशें ऐसी कि कभी पूरी ही नहीं होतीं। सारी रात यह हमें जगाए रखती हैं। देखो अभी कैसे सो रहे हैं। यह नीचे शैतानी करके हंस रहा है। इसकी मम्मी इसे चांद पर भेजेगी, रुपया कमाने वाली मशीन बनाएगी। पर आदमी... !" अलमारी पर रखे हुए खाली मर्तबान को देखते हुए बोली, "कल का अंधेरा कभी मैंने घना किया था...। अभी मेरा अंधेरा इतना घना है... पता नहीं उसका अंधेरा और कितना डरावना होगा !" बोलते हुए उसकी आंखें छल छला गईं।

दूसरे दिन की उसकी शुरुआत रोज की तरह दवाइयों से हुई। लेकिन जो सामने लड़की दवाई दे रही थी वह दूसरी लड़की थी। उसने विस्फारित आंखों से पूछा, " तुम ! वह कहां गई ?"

"मैम, वह अपने घर चली गई।"

"घर, मुझे बता कर नहीं गई !"

"मैम आप सोच रही थीं। वह आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी। कल रात ही उसकी मां की तबीयत अचानक खराब हो गई। वह जाने की तैयारी करने लगी तो मैंने कहा भी था कि- "और भी तो लोग होंगे तुम्हारी मां के पास।" उसने कहा-- " हैं तो ज़रूर.. पर मैं तो नहीं हूं न!"

फिर मैंने कहा, " इस तरह जाओगी तो नौकरी?" "कॉन्ट्रैक्ट! उसने कहा- नौकरी तो दूसरी मिल जाएगी पर मां! और वह चली गई।"

पानी का ग्लास पकड़ाते हुए लड़की बोली, "पानी!"

पानी ग्लास से छलक कर बाहर गिर रहा था। उसकी आंखों के सामने जाने कितने अक्स तैर रहे  थे।