MP: सतना जिला अस्पताल की बड़ी लापरवाही, थैलेसीमिया पीड़ित 4 बच्चों को चढ़ाया HIV संक्रमित ब्लड

सतना जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से थैलेसीमिया पीड़ित 4 बच्चों को एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ाए जाने का मामला सामने आया है। बच्चे पहले एचआईवी नेगेटिव थे। स्वास्थ्य मंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं।

Updated: Dec 16, 2025, 05:49 PM IST

सतना। मध्य प्रदेश के सतना जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से जुड़ा एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। थैलेसीमिया से पीड़ित चार मासूम बच्चों को कथित तौर पर एचआईवी पॉजिटिव रक्त चढ़ा दिया गया जिसके बाद अब वे सभी एचआईवी संक्रमित पाए गए हैं। यह मामला करीब चार महीने पुराना बताया जा रहा है लेकिन इसका खुलासा अब जाकर हुआ है।

जानकारी के अनुसार, संक्रमित बच्चों की उम्र 8 से 11 वर्ष के बीच है। ये सभी बच्चे थैलेसीमिया से पीड़ित हैं और उन्हें नियमित अंतराल पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। आईसीटीसी (इंटीग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर) में कराई गई जांच में सामने आया कि शुरुआती दौर में चारों बच्चे एचआईवी नेगेटिव थे लेकिन बाद की जांच में उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद संक्रमण के स्रोत को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कर दी है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने तत्काल जांच के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की गई है और यह भी जांच कराई जा रही है कि क्या इन बच्चों को जिला अस्पताल के अलावा किसी अन्य सरकारी या निजी अस्पताल में भी ब्लड ट्रांसफ्यूजन दिया गया था। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि संक्रमण कब और कहां हुआ।

ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. देवेंद्र पटेल ने बताया कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को जीवनभर कई बार ब्लड चढ़ाना पड़ता है। किसी बच्चे का अब तक 70 बार, किसी को 80 बार और किसी को 100 बार तक ट्रांसफ्यूजन किया जा चुका है। बार-बार ट्रांसफ्यूजन होने की वजह से ऐसे मरीजों में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। इसी आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि किस ट्रांसफ्यूजन के दौरान एचआईवी संक्रमण हुई।

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डॉ. पटेल के अनुसार, इन बच्चों को केवल सतना जिला अस्पताल से ही नहीं बल्कि रीवा के बिरला अस्पताल और मध्यप्रदेश के अन्य जिलों से भी ब्लड उपलब्ध कराया गया था। इसी वजह से जांच का दायरा बढ़ा दिया गया है और सभी संबंधित ब्लड डोनरों की पहचान कर उनकी जांच की जा रही है। बच्चों के माता-पिता की भी जांच कराई गई है। हालांकि, उनकी रिपोर्ट एचआईवी नेगेटिव आई है। 

ब्लड बैंक प्रबंधन का कहना है कि ब्लड डोनेशन के लिए तय मानकों का पालन किया जाता है। डोनर की उम्र 18 वर्ष से अधिक, वजन कम से कम 45 किलो और हीमोग्लोबिन 12 ग्राम से ऊपर होना जरूरी होता है। ब्लड लेने से पहले प्राथमिक स्वास्थ्य जांच के साथ एचआईवी समेत अन्य संक्रमणों की स्क्रीनिंग की जाती है। पहले रैपिड टेस्ट किट का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब एलाइजा तकनीक से एंटीबॉडी डिटेक्ट की जाती है।

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डॉ. पटेल ने यह भी बताया कि एलाइजा टेस्ट में आमतौर पर 20 से 90 दिन के भीतर बनने वाली एंटीबॉडी का पता चल जाता है। लेकिन शुरुआती विंडो पीरियड में संक्रमण पकड़ में न आने की संभावना रहती है। इसके अलावा जांच किट की सेंसिटिविटी भी जांच के दायरे में है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसी स्तर पर तकनीकी या मानवीय चूक तो नहीं हुई। जांच के दौरान ब्लड बैंक प्रबंधन को एक और बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। कई डोनरों के मोबाइल नंबर गलत निकल रहे हैं और पते अधूरे हैं जिससे उन्हें ट्रेस करने में भारी दिक्कत हो रही है। इससे जांच प्रक्रिया और जटिल हो गई है।

चार बच्चों में संक्रमण की पुष्टि के बाद यह आशंका भी जताई जा रही है कि एचआईवी संक्रमित ब्लड अन्य मरीजों को भी चढ़ाया गया हो सकता है। ब्लड बैंक से गर्भवती महिलाओं और अन्य गंभीर मरीजों को भी ब्लड दिया गया था। इनमें से कुछ लोग दोबारा जांच के लिए वापस नहीं लौटे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने संभावित संक्रमित मरीजों की पहचान एक बड़ी चुनौती बन गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सतना कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) से पूरे प्रकरण की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। प्रशासनिक स्तर पर भी जांच तेज कर दी गई है।

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दूसरी ओर पीड़ित परिवारों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। एक संक्रमित बच्ची के पिता ने दावा किया है कि एचआईवी पॉजिटिव बच्चों की संख्या चार नहीं बल्कि छह है। उन्होंने बताया कि उनकी बच्ची का जन्म 23 दिसंबर 2011 को हुआ था और 9 साल की उम्र में उसे थैलेसीमिया होने की जानकारी मिली। उसका इलाज सतना और पुणे में चला जबकि ब्लड ट्रांसफ्यूजन सतना जिला अस्पताल, जबलपुर में तीन बार और सतना के बिरला अस्पताल में दो बार कराया गया। पिता का कहना है कि प्रशासन की लापरवाही के कारण उनकी बच्ची को यह गंभीर संक्रमण हुआ।