RJD सांसद ने राम मंदिर ट्रस्ट को भेजा लीगल नोटिस, चंदे और खर्च का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग
नोटिस में कहा गया है कि अगर तय समय के अंदर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो मामले को उचित कानूनी मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा की चोरी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष तक के नेताओं ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है। इसी बीच आरजेडी के सांसद सुधाकर सिंह ने राम मंदिर ट्रस्ट को लीगल नोटिस भेजा है। इस नोटिस में कहा गया है कि अगर तय समय के अंदर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो मामले को उचित कानूनी मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।
बक्सर से आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह के वकील एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत ने गुरुवार को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टियों, महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज (अध्यक्ष), चंपत राय (महासचिव) और स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज (कोषाध्यक्ष) को यह कानूनी नोटिस भेजा है।
इस नोटिस में ट्रस्ट से कहा गया है कि वह नोटिस मिलने के तीन दिनों के भीतर वित्त वर्ष 2021–22 से वित्त वर्ष 2025–26 के बीच जमा हुए चंदे और किए गए खर्च का पूरा और मद-वार (टाइम-वाइज) ब्योरा सार्वजनिक करे। इसमें ऑडिट की गई बैलेंस शीट, आय-व्यय का विवरण, ऑडिटर की रिपोर्ट, ट्रस्ट की ओर से खरीदी गई जमीन की जानकारी, बैंक खाते का विवरण और एफसीआरए के तहत मिला कोई भी विदेशी चंदा शामिल होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत ने कहा कि यह नोटिस पूरी तरह से जनहित में जारी किया गया है, न कि किसी राजनीतिक, पक्षपाती या व्यक्तिगत मकसद से। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के पास भारत और विदेशों में लाखों भक्तों की ओर से दिए गए सार्वजनिक चंदे की जिम्मेदारी है। जहां जनता का पैसा शामिल हो, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही कोई एहसान नहीं है, ये हर दानदाता और आम जनता के प्रति एक दायित्व है।
मामले पर आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने कहा, "मेरी चिंता बस यह सुनिश्चित करने की है कि भक्तों की ओर से नेक नीयत से दिए गए फंड का हिसाब-किताब पारदर्शी तरीके से हो। जमीन की खरीद, ऑडिटेड जानकारी न देने और खर्च में पारदर्शिता की कमी को लेकर लगातार खबरें और चिंताएं सामने आती रही हैं। इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80जी के तहत रजिस्टर्ड और जनता के फंड की जिम्मेदारी संभालने वाले ट्रस्ट का यह फर्ज है कि वह जनता को स्पष्ट और सत्यापित हिसाब-किताब दे।"
उन्होंने आगे कहा, "मुझे उम्मीद है कि ट्रस्टी इसे टकराव का मामला मानने के बजाय जरूरी पारदर्शिता के साथ जवाब देंगे।" इस नोटिस में इंडियन ट्रस्ट्स एक्ट, 1882, इनकम टैक्स एक्ट, 1961, उत्तर प्रदेश पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 का जिक्र किया गया है। ये कानून पब्लिक धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टियों पर सही अकाउंटिंग और जानकारी देने की जिम्मेदारी डालते हैं।
नोटिस में मद्रास हाई कोर्ट के हालिया फैसले (आर. थिरुमुरुगन बनाम आर. थेन्नारासु और अन्य, 21 नवंबर 2025) का भी हवाला दिया गया है। इस फैसले में कहा गया था कि किसी पब्लिक धार्मिक संस्था को दिया गया दान ट्रस्टियों की निजी संपत्ति नहीं होता, बल्कि यह समुदाय के फायदे के लिए होता है, और समुदाय को ऑडिट और पारदर्शिता की मांग करने का पूरा अधिकार है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि अगर तय समय के अंदर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो मामले को उचित कानूनी मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।




