MP में MSP से कम दाम पर बिक रही मूंग, सरकारी खरीदी में देरी से बढ़ी किसानों की मुश्किलें

मध्य प्रदेश में मूंग की सरकारी खरीदी शुरू न होने से किसान परेशान हैं। MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल तय होने के बावजूद मंडियों में ₹6,000–6,500 का भाव मिल रहा है।

Updated: Jul 11, 2026, 11:46 AM IST

मध्य प्रदेश के जबलपुर सहित कई जिलों में मूंग उत्पादक किसान सरकारी खरीद शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं। खरीद प्रक्रिया में देरी और इस बार लागू किए गए नए नियमों के कारण बड़ी संख्या में किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है। सरकार ने मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 8,768 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है लेकिन मंडियों में व्यापारियों द्वारा केवल 6,000 से 6,500 रुपए प्रति क्विंटल तक ही कीमत दी जा रही है। इससे किसानों को प्रति क्विंटल लगभग 2,000 से 2,700 रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

किसानों का कहना है कि सरकारी खरीद केंद्र अब तक शुरू नहीं होने से उनके पास निजी व्यापारियों को फसल बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। दूसरी ओर खरीफ सीजन के लिए धान की बुआई का समय नजदीक आने से उन्हें बीज, खाद और अन्य कृषि कार्यों के लिए तत्काल नकदी की आवश्यकता है। इसी मजबूरी के चलते किसान कम भाव मिलने के बावजूद अपनी उपज बेच रहे हैं।

इस बार सरकार की नई खरीदी नीति भी किसानों की चिंता का कारण बनी हुई है। नई व्यवस्था के तहत कुल उत्पादन का केवल 25 प्रतिशत हिस्सा ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा। किसानों का कहना है कि यदि किसी किसान के खेत में 5 क्विंटल मूंग का उत्पादन होता है तो सरकारी केंद्र पर केवल करीब 1.25 क्विंटल ही खरीदा जाएगा। जबकि, शेष उपज बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ेगी।

इसके अलावा प्रति एकड़ सरकारी खरीदी की सीमा भी लगभग 1 क्विंटल 20 किलोग्राम तय की गई है। किसानों का कहना है कि इस सीमा के कारण उनकी पूरी फसल सरकारी खरीद के दायरे में नहीं आ पाएगी। जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा।

सरकार ने राज्य में मूंग की संभावित 8.06 लाख मीट्रिक टन उपज के मुकाबले केवल 4.55 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य निर्धारित किया है। किसानों का मानना है कि खरीद लक्ष्य कम होने और नई शर्तों के कारण बड़ी मात्रा में उपज MSP पर नहीं बिक सकेगी।

जबलपुर सहित प्रभावित क्षेत्रों के किसानों ने सरकार से मांग की है कि मूंग की सरकारी खरीद तत्काल शुरू की जाए और पूरी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाए। उनका कहना है कि समय पर उचित भुगतान मिलने से ही वे आगामी धान की बुआई और अन्य कृषि कार्य बिना आर्थिक दबाव के पूरा कर सकेंगे।