Hunger Watch: लॉकडाउन ने बढ़ाया भूख का संकट, कमज़ोर तबकों का और भी बुरा हाल

हंगर वॉच के सर्वे के मुताबिक़ 67% लोगों का भोजन घटा, 62% की आय कम हुई, क़र्ज़ लेकर पेट भरने और भूखे सोने की नौबत भी बढ़ी, राहुल गांधी बोले- गरीबों के मौलिक अधिकार छीन रही है मोदी सरकार

Updated: Dec 10, 2020, 11:40 PM IST

Hunger Watch: लॉकडाउन ने बढ़ाया भूख का संकट, कमज़ोर तबकों का और भी बुरा हाल
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नई दिल्ली। कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर देशभर में लगाए गए अचानक लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की तकलीफें तो सभी ने देखी हैं। लेकिन अब एक ताजा सर्वे आया है, जिसने सरकार के तमाम दावों और वादों की सच्चाई उजागर कर दी है। सर्वे के मुताबिक दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग से ताल्लुक़ रखने वाले क़रीब 67 फ़ीसदी लोगों को लॉकडाउन के पहले के दौर के मुक़ाबले अब कम भोजन से काम चलाना पड़ रहा है।

हंगर वॉच संस्था द्वारा किए गए इस सर्वे में शामिल करीब 46 फ़ीसदी लोगों ने बताया कि लॉकडाउन के पहले उनके सामने भूखे रहने की नौबत कभी नहीं आई थी, लेकिन लॉकडाउन और उसके बाद ऐसी स्थिति कई बार आ चुकी है। क़रीब 45 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन और उसके बाद के समय में उन्हें भोजन के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है।

नहीं मिल रहा पहले जितना भोजन

सर्वे के मुताबिक करीब 62 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन से पहले उनकी आमदनी जितनी थी, उतनी अब नहीं रह गई है। क़रीब 25 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि लॉकडाउन के बाद उनकी कमाई पहले के मुक़ाबले आधी रह गई है। लगभग 53 फ़ीसदी लोग बताते हैं कि उनकी गेहूं और चावल की खपत अब पहले से कम हो गई है, जबकि 64 फ़ीसदी लोगों ने बताया कि अब वे पहले के मुक़ाबले कम दालें खा पाते हैं। सब्ज़ियों की खपत के मामले में तो हालत और भी ख़राब है। सर्वे के मुताबिक़ क़रीब 73 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि वे पहले के मुक़ाबले कम हरी सब्ज़ियाँ खा पाते हैं। हंगर वॉच ने यह भी पाया कि लगभग 74 प्रतिशत दलितों के भोजन की खपत में कमी आई है। 

हंगर वॉच संस्था द्वारा किए गए सर्वे में कई हैरान करने वाली बातें सामने आई हैं। मसलन लॉकडाउन के दौरान दलितों और मुसलमानों को बाकी आबादी की तुलना में बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन के बाद करीब 25 फीसदी दलितों और मुसलमानों को दो वक्त की रोटी के लिए जूझना पड़ा, जबकि सामान्य श्रेणी के लोगों में ऐसी स्थिति का सामना 10 फीसदी लोगों को ही करना पड़ा।

अध्ययन में पाया गया कि कोरोना लॉकडाउन की वजह से 11 राज्यों के लगभग 45 प्रतिशत लोग आर्थिक रूप से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें खाने के लिए पैसे उधार लेने पड़े। रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों द्वारा पैसे उधार लेने की जरूरत सामान्य श्रेणी की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक थी। यह स्थित तब है, जब विशेषज्ञों ने सरकार को बार-बार चेताया था कि आर्थिक गतिविधियां ठप होने के कारण भुखमरी का संकट बढ़ेगा। समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो भयानक मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है। 

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कई बार बिना खाए सोना पड़ा

सर्वे के दौरान इस बात की जानकारी सामने आई कि सितंबर-अक्टूबर महीने के दौरान हर सात में से एक व्यक्ति को कई बार बिना खाना खाए ही सोना पड़ा। इस रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, दिल्ली, तेलंगाना, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के कमजोर और हाशिए पर पड़े लगभग 4,000 लोगों से प्राप्त प्रतिक्रिया के आधार पर तैयार किया गया है। हंगर वॉच द्वारा यह सर्वे लॉकडाउन लागू होने के बाद से लेकर सितंबर-अक्टूबर तक की स्थिति को जानने के लिए किया गया था।

ये मानवता के विरुद्ध अपराध है

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस सर्वे रिपोर्ट आने के बाद कहा है कि यह मानवता के विरुद्ध एक अपराध है। उन्होंने इस रिपोर्ट को साझा करते हुए ट्वीट किया, 'मोदी सरकार ग़रीबों के मौलिक अधिकार छीन रही है। ये मानवता के विरुद्ध अपराध है। देश के बेहतर भविष्य के लिए हमें हर वर्ग के अधिकारों का सम्मान करना ही होगा।' राहुल ने इसके साथ ही ह्यूमन राइट्स डे यानी मानवाधिकार दिवस का शटैग भी दिया है।

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भूख से जूझते लोगों की असली हालत का खुलासा करने वाले इस सर्वे ने तमाम सरकारी दावों की कलई खोल कर रख दी है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां प्रधानमंत्री के आलीशान इमारतें बनाने के शौक को पूरा करने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम खर्च की जा सकती है, प्रधानमंत्री के लिए विशेष लग्ज़री विमान खरीदने पर 8 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए जा सकते हैं, वहां तकरीबन आधी आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो, ये देश के हुक्मरानों के लिए शर्म से गड़ जाने वाली बात है।