अदालत धार्मिक मामलों में दखल न दे, सबरीमाला मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का जवाब

सबरीमला महिला प्रवेश मामले में केंद्र सरकार ने 2018 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका का समर्थन किया है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यह लैंगिक समानता नहीं, धार्मिक आस्था से जुड़ा प्रश्न है।

Updated: Apr 07, 2026, 06:19 PM IST

नई दिल्ली। सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं को लेकर केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है। केंद्र ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया।

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन 5 घंटें सुनवाई की। इस दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि 2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था। यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है। अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं।

इसपर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस मामले में अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई अछूतपन न रह जाए।

वहीं, केंद्र सरकार ने कहा कि अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास। सरकार ने तर्क दिया कि हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता।

इसपर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।