कृषि क़ानूनों पर अमल दो महीने के लिए टाल सकती है सरकार, दूसरे दौर की वार्ता से पहले लगी अटकलें

Farmers Protest: कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार किसानों के सामने कृषि कानूनों पर अमल दो महीने के लिए रोकने का नया प्रस्ताव रख सकती है, इस दौरान कमेटी बनाकर दोनों पक्ष आपस में बातचीत कर सकते हैं

Updated: Dec 03, 2020, 07:17 PM IST

कृषि क़ानूनों पर अमल दो महीने के लिए टाल सकती है सरकार, दूसरे दौर की वार्ता से पहले लगी अटकलें
Photo Courtesy : The Tribune

नई दिल्ली। केंद्र सरकार कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों के साथ आज दूसरे दौर की वार्ता में एक नया प्रस्ताव रख सकती है। इस प्रस्ताव के तहत केंद्र सरकार विवादास्पद कृषि कानूनों पर अमल दो महीने के लिए रोकने की पेशकश किसान नेताओं के सामने रख सकती है। अंग्रेजी अखबार द ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक सरकार दो महीने की इस अवधि के दौरान दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की एक कमेटी बनाकर पूरे मसले पर विचार-विमर्श करके मसले को सुलझाने का सुझाव देने की सोच रही है।

इस बीच, केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन आज आठवें दिन भी जारी है। आज सरकार और किसान नेताओं के दूसरे दिन की बातचीत भी होनी है। उससे पहले आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से भी बात करेंगे।

इससे पहले कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे किसानों के नेताओं ने बुधवार को शाम करीब सवा पांच बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ़ शब्दों में अपनी माँगे सरकार के सामने रखीं। किसान नेताओं ने कहा कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाए और उसमें किसान विरोधी कृषि क़ानूनों को रद्द करे। किसान नेताओं ने अपनी मांगें पूरी न होने पर 5 दिसंबर को मोदी सरकार और कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन करने का एलान भी किया है।

किसान नेताओं का कहना है कि अगर कृषि कानूनों से जुड़ी उनकी समस्याओं का हल नहीं होता है तो फिर वे और कदम उठाएंगे। प्रदर्शन कर रहे किसान नेताओं ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अगर सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी तो किसान दिल्ली की और सड़कों को ब्लॉक करेंगे। किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, ''अगर सरकार हमारी मांगें नहीं मानेगी तो हम और कदम उठाएंगे।''

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संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए किसान नेता दर्शन पाल ने आरोप लगाया कि केंद्र किसान संगठनों में फूट डालने की कोशिश कर रही है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाएगा। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन की सबसे प्रमुख माँग यही है कि केंद्र सरकार फ़ौरन संसद का विशेष सत्र बुलाकर नए कृषि कानूनों को रद्द करे। इससे पहले, करीब 32 किसान संगठनों के नेताओं ने सिंघू बॉर्डर पर बैठक की जिसमें भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत भी शामिल हुए।

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भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष स्वराज सिंह ने कहा, 'हम सड़क पर नहीं बैठे हैं। प्रशासन ने बैरिकेड्स और जवान खड़े करके हमारा रास्ता रोका है और इसीलिए हम यहां रुके हैं। हमें यह जगह अस्थाई जेल जैसी लगती है और हमें रोका जाना गिरफ्तारी की तरह है। हम जैसे ही यहां से छूटे सीधे दिल्ली जाएंगे।'

तोमर और गोयल ने शाह को दिया अपडेट

इस बीच, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल बुधवार को गृह मंत्री अमित शाह से उनके घर पर मिले। दोनों मंत्रियों ने मंगलवार को किसानों से हुई बातचीत का अपडेट शाह को दिया। इससे पहले मंगलवार को सरकार के साथ 35 किसान संगठनों की 3 घंटे की बातचीत बेनतीजा रही। मीटिंग में सरकार की तरफ से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के अलावा रेल मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री सोमप्रकाश मौजूद रहे थे। मीटिंग में सरकार कानूनों पर प्रेजेंटेशन दिखाकर फायदे का दावा करती रही, जबकि किसान नेता तीनों कानूनों को किसान विरोधी बताकर उन्हें वापस लेने की मांग पर डटे रहे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि हम दिल्ली से कुछ तो हासिल करेंगे, भले गोली हो या फिर शांतिपूर्ण समाधान। किसानों ने कृषि कानूनों को अपने लिए डेथ वॉरंट बताया।

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वहीं, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बुधवार को एक बार फिर से दावा किया कि कृषि कानून पूरी तरह किसानों के हित में हैं और सभी सुधारों को लंबे इंतज़ार के बाद लागू किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार किसान नेताओं के साथ गुरुवार को एक बार फिर से बातचीत करेगी। देखते हैं कि किस हद तक मुद्दे सुलझते हैं।

ये भाजपा नहीं, कंपनी सरकार है: कांग्रेस

इस बीच, कांग्रेस ने किसानों की मांगें मानने की जगह समिति बनाने की सरकार की पेशकश पर कड़ा एतराज़ किया है। कांग्रेस का कहना है कि क़ानून को लागू करने के बाद उस पर विचार के लिए समिति बनाने का क्या मतलब है। किसानों के साथ सलाह-मशविरे का काम तो क़ानून बनाते समय पहले होना चाहिए था। कांग्रेस ने कहा कि ये भाजपा की सरकार नहीं, कंपनी सरकार है, जिसका विरोध करना ज़रूरी है। उधर, कृषि बिलों के विरोध में मोदी सरकार से अलग होने वाले शिरोमणि अकाली दल ने कहा है कि सरकार बातचीत को जानबूझकर लंबा खींच रही है ताकि किसान थक जाएं।

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दिल्ली की सीमाओं पर सुरक्षा बंदोबस्त और कड़े किए गए

इस बीच, दिल्ली से लगी सीमाओं पर किसानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए बुधवार को पुलिस ने सुरक्षा और कड़ी कर दी। दिल्ली के उत्तर प्रदेश से लगने वाले गाजीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन तेज हो गया है, जिससे राज्य को राष्ट्रीय राजधानी से जोड़ने वाला एक प्रमुख मार्ग बंद हो गया है। नोएडा लिंक रोड पर चिल्ला बॉर्डर भी बंद कर दिया गया है।