जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ बने देश के 50वें CJI, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिलाई शपथ

जज के रूप में डीवाई चंद्रचूड़ की पहली नियुक्ति साल 2000 में बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई थी। उनके पिता भी देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं।

Updated: Nov 09, 2022, 01:39 PM IST

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ बने देश के 50वें CJI, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिलाई शपथ

नई दिल्ली। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ देश के नए मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। बुधवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद की शपथ दिलाई। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, सुप्रीम कोर्ट के जज, केंद्रीय मंत्री समेत तमाम गणमान्य लोग उपस्थित रहे। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ का कार्यकाल 10 नवंबर 2024 तक होगा। शपथ ग्रहण के बाद जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आम लोगों की सेवा करना मेरी प्राथमिकता है।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे। उससे पहले वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। जज के रूप में उनकी पहली नियुक्ति साल 2000 में बॉम्बे हाई कोर्ट में हुई थी। उससे पहले 1998 से 2000 तक वह भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसीटर जनरल रहे। उन्होंने 1982 में दिल्ली विश्वविद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल की थी। उन्होंने प्रतिष्ठित हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाई की।

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जस्टिस चंद्रचूड़ देश के पहले ऐसे CJI होंगे जिनके पिता भी चीफ जस्टिस रह चुके हैं। उनके पिता यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ देश के 16वें CJI थे। पिता के रिटायर होने के 37 साल बाद उसी पद पर बैठेंगे। जस्टिस चंद्रचूड़ पिता के 2 बड़े फैसलों को SC में पलट भी चुके हैं। वह उदार छवि और बेबाक फैसलों के लिए जाने जाते हैं।

कोविड के दौर में उन्होंने ऑक्सीजन और दवाइयों की उपलब्धता पर कई आदेश दिए। एक ऐसा मौका भी आया जब वह खुद कोरोना पीड़ित होने के बावजूद अपने घर से वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए सुनवाई से जुड़े। हाल ही में उन्होनें रात 9 बज कर 10 मिनट तक कोर्ट की कार्यवाही चलाई और उस दिन अपने सामने लगे सभी मामलों को निपटाया।

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उदार छवि के फैसलों में हमेशा उनके व्यक्तित्व की छाप दिखी है। व्यभिचार के लिए लगने वाली आईपीसी की धारा 497 को रद्द करते समय दिए गए फैसले में उन्होंने लिखा कि एक शादीशुदा महिला की भी अपनी स्वायत्तता है।उसे अपने पति की संपत्ति की तरह नहीं देखा जा सकता। उसका किसी और पुरूष से संबंध रखना तलाक का उचित आधार हो सकता है, लेकिन इसे अपराध मान कर दूसरे पुरुष को जेल में डाल देना गलत होगा।

हाल ही में उन्होंने अविवाहित महिलाओं को भी 20 से 24 हफ्ते के गर्भ को गिराने की अनुमति दी। इस ऐतिहासिक फैसले में उन्होंने यह भी कहा कि अगर पति ने ज़बरन संबंध बना कर पत्नी को गर्भवती किया है, तो उसे भी 24 हफ्ते तक गर्भपात का अधिकार होगा।इस तरह गर्भपात के मामले ने ही सही, कानून में पहली बार वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप को मान्यता मिली।