Hindi Diwas 2020: हिंदी दिवस के स्थान पर राजभाषा दिवस कहा जाए

Rajbhasha Diwas: हिंदी को केवल राजभाषा का दर्जा मिला है, अधिनियम और नियमों के आलोक में इसे केवल राजभाषा कहा जाना चाहिए, इसलिए 14 सितंबर को हिंदी दिवस नहीं बल्कि राजभाषा दिवस कहना ज्यादा उचित मालूम पड़ता है, पर पता नहीं क्यों इसे हिंदी दिवस कह रहे हैं, राजभाषा हिंदी, हिंदी के सागर से भरी गई एक अंजुरी भर है लेकिन इस दिन हम अंजुरी को ही समुद्र बनाने पर आमादा हो जाते हैं

Updated: Sep 14, 2020 10:29 PM IST

Hindi Diwas 2020: हिंदी दिवस के स्थान पर राजभाषा दिवस कहा जाए
Photo Courtsey: TV9

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किया गया। वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम बनाया गया। वर्ष 1976 में राजभाषा नियम बने। हिंदी को केवल राजभाषा का दर्जा मिला है। अधिनियम और नियमों के आलोक में इसे केवल राजभाषा कहा जाना चाहिए। इसलिए 14 सितंबर को हिंदी दिवस नहीं बल्कि राजभाषा दिवस कहना ज्यादा उचित मालूम पड़ता है। पर पता नहीं क्यों इसे हिंदी दिवस कह रहे हैं।

हिंदी एक व्यापक अर्थ देने वाला शब्द है। इसमें साहित्य, संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता आदि सबका बोध होता है। राजभाषा दिवस कहने से कोई विपरीत प्रतिक्रिया की संभावना नहीं बनती। जबकि हिंदी दिवस कहने से अन्य भाषाओं के समक्ष हिंदी को खड़ा कर देना है। राजभाषा नियमों विनियम में बंधी है। जबकि हिंदी उन्मुक्त है और सर्जना के व्यापक अर्थों में राष्ट्रीयता की पहचान है।

मेरा अनुभव कहता है कि राजभाषा दिवस के दिन साहित्यकारों की जगह सरकार के बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों से सवाल पूछे जाने चाहिए क्योंकि राजभाषा के प्रयोग और प्रोत्साहन की पूरी जिम्मेदारी सरकार के बड़े अधिकारियों पर है। पर पता नहीं क्यों लोग इनसे प्रश्न नहीं करते बल्कि साहित्यकारों के साक्षात्कार छाप कर समस्या का निदान ढूंढने का प्रयत्न करते रहते हैं। जो एक विफल प्रयत्न है। जिन्हें कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए वे लोग मौन रहते हैं और सर्जना के काम में लगे हुए लोग हिंदी दिवस पर बड़े साहित्यकारों के कामकाज की समीक्षा करते रहते हैं।

राजभाषा हिंदी, हिंदी के सागर से भरी गई एक अंजुरी भर है लेकिन इस दिन हम अंजुरी को ही समुद्र बनाने पर आमादा हो जाते हैं। 1963 में जब राजभाषा अधिनियम बना था और 1976 में जब नियम बनाए गए तब इन पर उस समय के समाज और राष्ट्र की जरूरतों का प्रभाव रहा होगा। लेकिन आज समाज बदल चुका है और यह स्वाभाविक मांग है कि इस अधिनियम और नियम को बदला जाए। पुराने नियम और विनियमों से आज के समाज और राष्ट्र की जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता। मेरा मानना है की 14 सितंबर को हिंदी दिवस के स्थान पर राजभाषा दिवस ही कहा जाए। इसके लिए साहित्यकारों के मंतव्यों की जरूरत नहीं है वरन सरकारी अफसरों को सवालों के घेरे में लिया जाना चाहिए।

सर्जना से जुड़े लोग संविधान में दी गई राजभाषा की व्यवस्थाओं से प्रायःअपरिचित ही होते हैं। इसलिए उनके सामने राजभाषा का परिदृश्य साफ नहीं होता। वे राजभाषा को भी सर्जना की भाषा की तरह देखने की कोशिश करते हैं, परिणाम यह होता है की हिंदी की चिंताएं विशेषकर कामकाजी हिंदी की चिंताएं स्पष्ट नहीं हो पाती। 

अगर आप सहमत हों तो हिंदी दिवस के स्थान पर राजभाषा दिवस कहना प्रारंभ करें। राजभाषा सीमित शब्दों में बंधी व्यवस्था है। इसका कविता, कहानी, उपन्यास या अन्य विधाओं से कोई संबंध नहीं है। सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है लेकिन जिस गति से बढ़ना चाहिए, वह गति नहीं है। जिसके अनेक कारण हैं।