जी भाई साहब जी: सियासत का पेंच, गोपाल भार्गव हँसें या रोयें

वरिष्‍ठ बीजेपी नेता गोपाल भार्गव चर्चा में बने हुए हैं। पार्टी और बुंदेलखंड क्षेत्र में कई नेता उन्‍हें चुनौतियां दे रहे हैं। ऐसे में गोपाल भार्गव की फिक्र अपनी सीट बचाने या अपनी सीट अपने उत्‍तराधिकारी को सौंप देने को लेकर है। बीते सप्‍ताह कुछ ऐसा हुआ कि गोपाल भार्गव समर्थक समझ नहीं पा रहे हैं कि वे खुश हों या दु:खी। मामला कुछ ऐसा है कि न हँसते बन रहा है और न रोते। 

Updated: Apr 26, 2022, 12:28 PM IST

जी भाई साहब जी: सियासत का पेंच, गोपाल भार्गव हँसें या रोयें

मध्‍य प्रदेश बीजेपी की राजनीति में पिछले कई दिनों से वरिष्‍ठ नेता गोपाल भार्गव चर्चा में बने हुए हैं। पार्टी और बुंदेलखंड क्षेत्र में कई नेता उन्‍हें चुनौतियां दे रहे हैं। ऐसे में गोपाल भार्गव की फिक्र अपनी सीट बचाने या अपनी सीट अपने उत्‍तराधिकारी को सौंप देने को लेकर है। गोपाल भार्गव की समूची राजनीति इस फिक्र के इर्दगिर्द घूम रही है। लेकिन बीते सप्‍ताह कुछ ऐसा हुआ कि गोपाल भार्गव समर्थक समझ नहीं पा रहे हैं कि वे खुश हों या दु:खी। मामला कुछ ऐसा है कि न हँसते बन रहा है और न रोते। 

हुआ यूं कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भोपाल आए। अमित शाह की यात्रा पर सभी की निगाहें टिकी थी। आकलन किए जा रहे हैं कि शाह के इशारे किसकी राजनीति चमकाते हैं और किस पर गाज गिरती है। मिशन 2023 की दृष्टि से अति महत्‍व की इस यात्रा में जब अमित शाह ने गोपाल भार्गव का नाम लिया तो भार्गव समर्थकों के चेहरे खिल गए।  

संगठन के कामकाज की समीक्षा करते हुए अमित शाह ने यह कहते हुए गोपाल भार्गव का उल्‍लेख किया कि आदिवासी क्षेत्रों में भार्गव जी को काम पर लगा देंगे तो सफलता कैसे मिलेगी? बात आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की रणनीति को सफल करने को लेकर थी लेकिन गोपाल भार्गव के जिक्र भर से उनके समर्थक खुश हो गए। माना गया कि दुश्‍मन लाख कोशिश कर लें बाबूलाल गौर के बाद सबसे ज्‍यादा बार विधायक चुने गए गोपाल भार्गव का सिक्‍का दिल्‍ली तक चलता है। उन्‍हें यूं साइड लाइन कर देना आसान नहीं है। 

स्‍वयं को पार्टी में अलग-थलग महसूस कर रहे गोपाल भार्गव बीते माह रहली में आयोजित पारंपरिक उत्‍सव के दौरान भी चर्चा में आ गए थे। उस वक्‍त भावुक अंदाज में दिए गए भाषण के तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने भार्गव के कंधे पर हाथ रख कर कहा था कि भार्गव जी आप परेशान न हों, मैं आपके साथ हूं। 

तब भी समर्थक खुश हुए थे कि बीजेपी में अपनी अलग जगह बना रहे सिंधिया का साथ मिलने से भार्गव के विरोधियों के मंसूबे कामयाब नहीं होंगे। समर्थक मान रहे हैं कि अब अमित शाह ने सारी नेताओं में से केवल भार्गव का नाम लिया है तो यह भार्गव की राजनीति का प्रताप ही है और किसी भी संकट के समय शाह तारणहार बन ही जाएंगे। 

दूसरी तरफ, भार्गव का विरोधी खेमा करीब आठ साल पहले हुई शाह की उस यात्रा को याद दिला रहा है जिसमें शाह ने सारे नेताओं को छोड़ केवल बाबूलाल गौर से बात की थी। तब शा‍ह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और बिना पूर्व घोषित कार्यक्रम के इंदौर से भोपाल पहुंचे थे। यहां से उन्हें दिल्ली जाना था, लेकिन फ्लाइट लेट होने के कारण एयरपोर्ट पर ही इंतजार करना पड़ा। इस दौरान उनसे मिलने गृहमंत्री बाबूलाल गौर पहुंचे। वीआईपी लाउंज में शाह का जैसे ही गौर से सामना हुआ, शाह ने उनसे पूछ लिया - ‘बाबूलाल जी कितनी उम्र हो गई आपकी? हाथ-पैर तो ठीक से चल रहे हैं ना?’ शाह के इस प्रश्न से गौर कुछ असहज हो गए। फिर हंसते हुए जवाब दिया था कि सर, अभी तो 84 साल ही हुए हैं। इस मुलाकात के बाद गौर का टिकट कट गया था। 

विरोधी मान रहे हैं कि उस वक्‍त अमित शाह ने गौर का उल्‍लेख किया था और टिकट कटा था, अब भार्गव का उल्‍लेख किया है तो उनका टिकट कटना तय है। हालांकि, गौर का टिकट कटने पर उनकी बहू को पार्टी ने उम्‍मीदवार बनाया था। यदि गोपाल भार्गव का टिकट काटा जाता है तो देखना होगा कि उनके बेटे अभिषेक को पार्टी राजनीतिक उत्‍तराधिकारी मानती है या नहीं। यही कारण है कि गोपाल भार्गव समर्थक रोयें या हँसे वाले संकट से जूझ रहे हैं। 

आदिवासियों की राजनीति खिली, मुरझाए आदिवासी चेहरे 

आठ माह में आदिवासियों को लेकर तीन भव्‍य शो और इनमें से दो में अमित शाह व एक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति। यह दृश्‍य बताने के लिए काफी है कि बीजेपी की राजनीति में आदिवासी समुदाय का क्‍या स्‍थान है और वह मिशन 2023 को जीतने के लिए आदिवासी वोट बैंक को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। मगर समुदाय को रिझाने की इस कवायद पर पूरा फोकस होने के बाद भी पार्टी के आदिवासी चेहरे मुरझा गए हैं। उन्‍हें जैसा राजनीतिक खाद-पानी मिलना चाहिए, वैसा बीजेपी में मिल नहीं रहा है। 

सितंबर 2021 में जबलपुर में जनजातीय महोत्‍सव हुआ जिसमें अमित शाह शामिल हुए थे। फिर नवंबर में भोपाल के जंबूरी मैदान पर भव्‍य जनजातीय गौरव दिवस मनाया गया जिसमें प्रधानमंत्री मोदी शामिल हुए। इस दौरान की गई घोषणाओं को पूरा करने का जश्‍न मनाने के लिए बीते सप्‍ताह जंबूरी मैदान पर ही एक कार्यक्रम और आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि थे। उन्‍होंने आदिवासियों की समस्‍याएं दूर करने और उन्हें पार्टी के साथ बनाए रखने के लिए शिवराज सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा भी की। 

तमाम तरह की घोषणाओं के बाद भी बीजेपी में आदिवासी राजनीति के प्रमुख चेहरे मंत्री विजय शाह, पूर्व मंत्री रंजना बघेल, अंतर सिंह आर्य जैसे नेता परिदृश्‍य से गायब हैं। सितंबर 2021 में जबलपुर में अमित शाह की यात्रा के कारण मंत्री विजय शाह को रघुनाश शाह की समाधि तक जाने से रोक दिया गया था। नाराज विजय शाह कार्यक्रम छोड़ कर चले गए थे। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमित शाह की मौजदूगी में हुए कार्यक्रम में मंत्री विजय शाह का नाम कई बार लिया मगर विजय शाह की पार्टी से नाराजगी कम नहीं हुई है। विजय शाह की तरह अन्‍य नेता भी हाशिए पर हैं। हां, बीजेपी के लिए राज्‍यपाल की सक्रियता लाभ का कारक हो सकती है। 

आकलन है कि मध्‍य प्रदेश में आदिवासी वोट बैंक के महत्‍व को देखते हुए ही केंद्र सरकार ने गुजरात के आदिवासी नेता मंगूभाई पटेल को एमपी का राज्‍यपाल बना कर भेजा है। राज्‍यपाल मंगूभाई अपनी रूचि के चलते मध्‍य प्रदेश सरकार द्वारा चलाए जा रहे आदिवासी हितैषी कार्यों की सतत निगरानी कर रहे हैं। वे आदिवासी गांवों में रात्रि विश्राम कर मैदानी फीडबैक भी जुटा रहे हैं। राज्‍यपाल की सक्रियता के कारण सरकार अपनी रीति नीतियों में सुधार कर रही है। इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिलना तय माना जा रहा है मगर मैदानी नेताओं की नाराजगी कैसे दूर की जाएगी, देखना होगा। 


दूरी और संशय को दूर करने में जुटी कांग्रेस 

अपनी तरह की राजनीति करने के लिए पहचाने जाने वाले कमलनाथ इनदिनों मध्‍य प्रदेश में कांग्रेस को सक्रिय करने में जुटे हैं। उनके सामने मिशन 2023 है और लक्ष्‍य है 2018 की तरह सरकार बनाना। वे खुद जानते हैं राह अब उतनी ही जटिल है जितनी 2018 में हुआ करती थी। यही कारण है कि उन्‍होंने संगठन पर पूरा ध्‍यान केंद्रित किया है। उनकी सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस नेताओं और संगठन के बीच आ रही दूरियों को खत्‍म करने की है। कांग्रेस नेताओं की नाराजगी की खबरें बार-बार आती हैं और एकजुटता पर सवाल उठते हैं। इन खबरों को विराम देने और दूरियां पाटने के लिए कमलनाथ ने बीते दिनों पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्‍यक्षों और पूर्व नेता प्रतिपक्षों की बैठक आयोजित की थी। यह बैठक संगठन के कामों को गति देने के साथ ही आपसी दूरियों को मिटाने की कोशिश के रूप में भी देखी गई। 

दूरियों के अलावा पार्टी में अगला सवाल नेता प्रतिपक्ष का है। जब से तय हुआ है कि कांग्रेस एक व्‍यक्ति एक पद फार्मूला लागू करेगी, तब से माना जा रहा है कि कमलनाथ नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ेंगे। अब संगठन में इस फार्मूले को सख्‍ती से लागू करने का फैसला हो गया है तो तय है कि कुछ दिनों में विधानसभा में नया नेता प्रतिपक्ष होगा। अब इस बात पर संशय है कि यह पद किस नेता को मिलेगा। आमतौर पर जिन नेताओं के नाम चर्चा में रहते हैं, उनमें से कोई एक नेता प्रतिपक्ष होगा या नया चेहरा सामने आएगा। फिलहाल, मध्‍य प्रदेश कांग्रेस में यही दो कवायद छाई हुई है।