व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी, सत चेतन घन आनंद राशी।

गुरु हमें अन्तरात्मा से परिचय करा देते हैं, उसका ज्ञान करा देते हैं.. और जब हमें आत्मबोध हो जाता है हम सम्पूर्ण सृष्टि के अधिपति हो जाते हैं, फिर कैसी दरिद्रता

Updated: Nov 02, 2020, 11:11 PM IST

व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी, सत चेतन घन आनंद राशी।
Pho to Courtesy: grelane.com

सदगुरु
जब तक हमारी बुद्धि बहिर्मुख रहती है, विषयों की ओर रहती है तब-तक हम सुख को प्राप्त नहीं कर सकते। जब बुद्धि अन्तर्मुख होती है तब सुख की अनुभूति होती है। सदगुरु यही करते हैं, बाहर से आपको कुछ नहीं देते, लेकिन जो आपके भीतर है उसी को जना देते हैं। इसलिए किसी गुरु ने कहा कि-
मेरा मुझको कुछ नहीं,
जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते,
क्या लागत है मोर।।

तो हमारे भीतर जो आनंद का समुद्र लहरा रहा है गुरु उसी का ज्ञान करा देते हैं। परमात्मा सबके हृदय में विद्यमान है। ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जिसके हृदय परमात्मा न हों। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि-
व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी
सत चेतन घन आनंद राशी।
अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।
सकल जीव जग दीन दुखारी

अर्थात् एक व्यापक, अविनाशी, सत् चित् आनन्द रूप परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में विद्यमान है। जब हमारे हृदय में आनंद स्वरूप परमात्मा विद्यमान है तो फिर हम दुखी क्यूं हैं? इसलिए कि हमको उसकी पहचान नहीं है। पहचान हो जाय तो हमारा दुःख उसी समय दूर हो जाय। गुरू पहचान करा देते हैं।
नैनं अविदितो देवो भुनक्ति
ये परमात्मा जब तक विदित न हो जाय तब-तक रक्षा नहीं करता। विदित हो जाने पर बोध हो जाने पर ही हमारी रक्षा करता है। गुरु हमें ज्ञान प्रदान करते हैं, बोध करा देते हैं कि तू इधर उधर मत भटक। तेरे हृदय में ही परमात्मा विद्यमान हैं। एक कस्तूरी मृग होता है, उसके नाभि में कस्तूरी होती है।जब वो पकती है तो उसकी सुगंध फैलती है। तो वो मृग ये समझता है कि ये सुगंध किसी वृक्ष या वनस्पति से आ रही है। तो भटकता है, लेकिन ये नहीं समझता कि मेरी नाभि में कस्तूरी है, उसी की ये सुगंध है। अभिप्राय यह है कि जो वस्तु है उसका ज्ञान होना परम आवश्यक है और वह ज्ञान भी सही-सही होना चाहिए। इसलिए गोस्वामी जी कहते हैं कि-
नाम निरूपण नाम जतन ते।
सोउ प्रकटत जिमि मोल रतन ते।।

नाम के निरूपण और नाम के यत्न से वह अप्रकट परमात्मा प्रकट हो जाता है, वैसे ही जैसे रत्न से उसका मूल्य प्रकट हो जाता है। एक किसान था वो अपने खेत में फ़सल की रक्षा के लिए मचान बनाकर गोफलो में पत्थर भर-भरकर चिड़िया भगाता था। एक दिन उसके पत्थर खतम हो गये वो नदी के किनारे गया वहां उसको एक घड़ा मिला जिसमें लाल- लाल पत्थर भरे हुए थे। फिर तो उसी पत्थर को गोफलों में भर-भरकर चिड़िया भगाने लगा। वो इतनी ताक़त से पत्थर फेंकता था कि वह पत्थर चिड़िया भगाने के बाद नदी के गहरे जल में डूब जाते थे।इस प्रकार उसके सारे पत्थर डूब गए,एक बचा तो घर से खबर आई कि आज घर में नमक नहीं है। उसके पास पैसे थे नहीं तो वह किसान वही एक बचा हुआ पत्थर लेकर बाजार में गया।नमक की दुकान की ओर जा रहा था,इतने में एक जौहरी की दृष्टि पड़ी। जौहरी ने पूछा कहां जा रहे हो? तो वो बोला कि नमक खरीदने जा रहा हूं। जौहरी पूछा कि पैसे हैं? तो किसान ने कहा कि पैसे तो नहीं हैं, ये पत्थर है। जौहरी समझ गया और उसको जौहरियों के पास लेकर गया। अब उसकी कीमत आंकी जाने लगी। किसी ने दस लाख, किसी ने बीस लाख, किसी ने कहा करोड़। जब नगर सेठ के पास गए तो उसने कहा कि ये तो रूबी (बहुमूल्य रत्न) है। इसे खरीदने का मेरा सामर्थ्य नहीं है। मेरी सारी सम्पत्ति लेकर यदि इसे दे सको तो दे दो। तो इतना सुनते ही उस किसान के मन में जो दरिद्रता के कारण हीन भावना थी वो दूर हो गई। तो यही कार्य गुरु भी करते हैं। अन्तरात्मा से परिचय करा देते हैं, उसका ज्ञान करा देते हैं। और जब हमें आत्म बोध हो जाता है हम परमात्म स्वरूप हो जाते हैं तो हम सम्पूर्ण सृष्टि के अधिपति हो जाते हैं, फिर कैसी दरिद्रता? लेकिन यह तो सदगुरु की कृपा से ही संभव हो सकता है।