जब मनुष्य के अन्दर समता हो तब हो सकता है परहित

समष्टि सुरक्षित रहेगी तो व्यष्टि की सुरक्षा अपने आप ही हो जाएगी, इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए

Updated: Sep 12, 2020 11:46 PM IST

जब मनुष्य के अन्दर समता हो तब हो सकता है परहित

जो मनुष्य विवेक के नियंत्रण को स्वीकार करता है उसी का जीवन रथ सही दिशा में जाता है। नियंत्रण उसी पर होता है जो मनुष्य अनुचित आचरण करता है। अविवेक से जो काम लेता है उसी को बांधना पड़ता है। जो गाय किसी दूसरे के खेत में चरने जाती है उसी को रस्सी से बांधना पड़ता है, और जो सीधे चरने के लिए जंगल जाती है और लौटकर सही समय पर आ जाती है, अपने स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जाती उस गाय को रस्सी से नहीं बांधा जाता है। जो व्यक्ति अपने ऊपर नियंत्रण कर लेता है उसके ऊपर से दूसरों का नियंत्रण समाप्त हो जाता है।राजा की भी आवश्यकता नहीं।

धर्म क्या है? ये आत्म नियंत्रण हमें सिखाता है। मनुष्य अपने ऊपर नियंत्रण कर ले तो उसके शासन की आवश्यकता नहीं, राजा की भी आवश्यकता नहीं। शास्त्रों में बताया गया है कि- गुरुरात्मवतां शास्ता, राजा शास्ता दुरात्मनाम्

जो अपने इन्द्रियों को नियंत्रित रखते हैं वो आत्मवान कहलाते हैं। उनका शास्ता गुरु है। गुरु के उपदेश के अनुसार वे अपना आचरण,अपना कार्य बना लेते हैं। इसीलिए उनको राजा की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो उनके अनुसार नहीं चलते, जो अपने आप को वश में नहीं रख सकते गुरुओं के उपदेशों का अनुसरण नहीं कर सकते उनके लिए राजा शास्ता है।

इसी प्रकार से लोग कहते हैं कि हम स्वतंत्र रहेंगे। ये स्वतंत्रता क्या है? स्वतंत्रता का अर्थ लोग उछृंखलता समझ लेते हैं। जो हमारा मन कहे वही हम करेंगे, क्यूंकि हम स्वतंत्र हैं। परन्तु स्वतंत्रता का ऐसा अर्थ करेंगे तो हम परतंत्र हो जायेंगे। हमारी स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रहेगी जब हम अपने नियंत्रण में रहेंगे।

कई लोग कहते हैं कि हम तो अपने मन और इन्द्रियों की बात मानते हैं। ऐसे व्यक्ति लोगों से तो आज़ाद हो जाते हैं लेकिन अपनी इन्द्रियों के गुलाम हो जाते हैं।जो आंख कहेगी,जो कान कहेगा, जो जिह्वा कहेगी वही करना होगा।इन इन्द्रियों की लोलुपता के कारण कैसे कैसे लोगों का चरण चुम्बन करना पड़ता है, इसके लिए बाध्य कर दे। तो जहां व्यक्ति आत्म नियंत्रण से रहित हुआ तो तुरत उसके ऊपर दूसरों का नियंत्रण हो जाता है।

आज अपने भारत की जो दशा है वो इसीलिए गड़बड है। लोगों में आत्मनियंत्रण नहीं रहा। हम अपनी सीमा को नहीं देखते। व्यष्टि और समष्टि का जब सामंजस्य होता है तभी समष्टि का उत्थान होता है। और समष्टि के साथ साथ व्यष्टि का उत्थान हो ही जाता है। कहते हैं कि वृक्ष वृक्ष से वन बनता है। अगर प्रत्येक वृक्ष को काट दिया जाए तो वन ही समाप्त हो जायेगा। तो हमें समष्टि को सुरक्षित रखना है। समष्टि सुरक्षित रहेगी तो व्यष्टि की सुरक्षा अपने आप ही हो जाएगी। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए। अपने देश के हित को दृष्टि में रखना चाहिए। अपने मोक्ष को अपने दृष्टि में रखना चाहिए। जब ये हम करेंगे तो सहज में ही हम स्वतंत्र हो जायेंगे।

वास्तविक स्वतंत्रता ये है बल के पीछे लगा दी गई क्षमा। लेकिन विवेक के लिए नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है। और दम के पीछे लगा दी गई कृपा। हम इन्द्रियों का दमन क्यूं करें? क्यूंकि यदि हम नहीं करेंगे तो दूसरों के अधिकारों को छीनेंगे। दूसरों के सुख की सामग्रियों को हड़प लेंगे। इसलिए दम की आवश्यकता है। दम के लिए कृपा चाहिए। हमको अगर भगवान ने खाने को दिया है तो खाएं, लेकिन खाने के पहले पड़ोसी के घर का चूल्हा भी देख लेना चाहिए। नहीं तो अगर पड़ोसी भूखा रहेगा तो हम हलवा पूरी हज़म नहीं कर पायेंगे। तो इसके लिए कृपा चाहिए। और परहित तब हो सकता है जब मनुष्य के अन्दर समता हो। अपने सुख दुःख के समान ही दूसरों का सुख दुःख समझना चाहिए,त ब वो परहित कर सकता है। इसलिए चार घोड़े और तीन रस्सियां हैं।

बल विवेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।