सुख : बाहर नहीं भीतर, ग्रहण में नहीं त्याग में

योग के ग्रन्थों मे कहा गया है- समाधि से निर्मल चित्त को आत्मा में स्थित करने पर जो सुख मिलता है वह केवल अनुभव ही किया जा सकता है

Publish: Jul-08, 2020, 04:59 PM IST

सुख :  बाहर नहीं भीतर, ग्रहण में नहीं त्याग में

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जो साधक बाह्य विषयों में आसक्ति का त्याग कर देता है,उसे अपने भीतर एक विलक्षण सुख की अनुभूति होती है, जिसको वह ब्रह्म साक्षात्कार के द्वारा अक्षय रुप से प्राप्त कर लेता है। योग के ग्रन्थों मे कहा गया है- समाधि से निर्मल चित्त को आत्मा में स्थित करने पर जो सुख मिलता है, वह वाणी का विषय नहीं है। उसका तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है।

वस्तुत: जैसे जैसे मनुष्य का मन शुद्ध होता जाता है वैसे-वैसे उसकी रुचि परिष्कृत होती जाती है। रुचि के परिष्कार से सुख सम्बन्धी धारणा भी परिवर्तित हो जाती है। एक ग्रामीण बालक गुड़ को ही मधुर समझता है पर जब शर्करा,सिता और कन्द का स्वाद उसे मिलता है तो पूर्व से पूर्व उसका मन हटता जाता है। ग्राम्य गीतों पर मुग्ध होने वाला व्यक्ति जब संगीत का पारंगत हो जाता है तो स्वत: ही ग्राम्य गीतों से विरत हो जाता है। काव्यालंकारशास्त्र में निष्णात साहित्य के रसिक के लिए ग्राम्य गीत उपेक्षित हो जाते हैं। इसीलिए अध्यात्म ग्रंथों में कहा गया है- जो सुख वीतराग एकान्त जीवी मुनि को प्राप्त होता है, वह न तो चक्रवर्ती सम्राट को मिलता है और न देवराज इन्द्र को ही।

जो योगी ब्रह्मानंद रस का पान करके उन्मुक्त हो गए हैं, उनको इन्द्र भी रंक (दरिद्र) के तुल्य प्रतीत होता है फिर नृप-कीट की तो कथा ही क्या है। भगवान आद्य शंकराचार्य भी वेदांत वाक्यों में रमण करने वाले वीतराग कौपीन धारियों को भाग्यशाली मानते हैं-

कौपीन वन्त: खलु भाग्यवन्त:

लोक में जो कामजन्य सुख है तथा परलोक में पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले जो विशाल सुख हैं यह सब मिलकर भी तृष्णा के क्षय होने वाले सुख की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है। भगवान भूत भावन विश्वनाथ सदाशिव की चर्या श्मशानवास, पिशाचों का साहचर्य, मुण्डमाला धारण करना, अंग में चिता भस्म लगाना आदि इसी तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि सुख बाहर नहीं भीतर ही है, ग्रहण में नहीं त्याग में है। योग वाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ ने ही श्रीराम को सुख का मार्ग बताया कि नेति नेति के द्वारा अशेष विशेष का निषेध करने के पश्चात् जो परम पद शेष रहता है, जिसका निराकरण नहीं किया जा सकता,। वही मैं हूं यह जानकर सुखी हो जाओ। जड़ता को छोड़कर शिला के समान जो हृदय की स्थिरता है, वही परमपद है।