गीतामृतम्

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है

Updated: Dec 27, 2020, 02:03 PM IST

गीतामृतम्
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 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

प्रश्न ये उठता है कि जिस कुरुक्षेत्र में इतनी अधिक हिंसा हुई, महाभारत जैसा युद्ध हुआ, उसको धर्मक्षेत्र कैसे कहा गया। असल मेँ यह युद्ध धर्म के संरक्षण में और धर्म की रक्षा के लिए हुआ, इसलिए इसे धर्मक्षेत्र कहा गया। जिस राज्य की कुलवधू को राज दरबार में ही निर्वस्त्र करने का आदेश ज्येष्ठ राजकुमार ने दिया और राजा ने उसका विरोध नहीं किया।

यथा राजा तथा प्रजा

के अनुसार उस राज्य की प्रजा भी अधर्म के आचरण मेँ निश्चित रूप से प्रवृत्त रही होगी। अतः धर्म की रक्षा के लिए यह युद्ध हुआ। और धर्म के संरक्षण में हुआ। भगवान का एक नाम धर्म है। विष्णु सहस्रनाम मेँ

 धर्मो धर्म विदुत्तम:

अर्थात् भगवान धर्म भी हैं और धर्मज्ञों में श्रेष्ठ भी हैं।भगवान श्री कृष्ण के संरक्षण में युद्ध हुआ इसलिए प्रथम धर्म शब्द का प्रयोग किया गया। इसको आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाय तो धर्मक्षेत्रे का अर्थ शरीर, अन्त:करण जहाँ स्वयं भगवान बैठे हों और तोत्रवेत्रैकपाणि होकर दर्शन दे रहे हों, उसे धर्मक्षेत्र नहीं कहेंगे तो और किसे कहेंगे।

यह जो युद्ध है वो ममत्व मूलक वृत्ति (अधर्म) और शुद्ध वृत्ति (धर्म) इनका आपस में संघर्ष है। इस प्रथम अध्याय में दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद् के लक्षण का बहुत सुन्दर वर्णन है। संक्षेप में इसे यूँ समझा जा सकता है कि दैवी संपदा त्याग के लिए और आसुरी सम्पदा भोग के लिए होती है। दुर्योधन में आसुरी सम्पदा के पूरे लक्षण मिलते हैं।

दम्भो दर्पोSभिमानश्च

क्रोध: पारुष्यमेव च।।

ये आसुरी सम्पदाएँ है। ये जिसके अंदर हों वह असुर होता है।तो ये दैवी और आसुरी युद्ध हमारे भीतर भी निरंतर चलते रहता है।लेकिन जिसने अपने अन्त:करण में, हृदय रूपी रथ का सारथी श्री कृष्ण को बना लिया हो, अर्जुन की भांति धर्म के संरक्षण में रहकर संसार शत्रु से युद्ध करता हैा उसकी विजय सुनिश्चित होती है। इसलिए युद्ध क्षेत्र भी धर्म क्षेत्र बन गया।