दफ्तर दरबारी: कलेक्‍टर साहब देखिए, 60 साल के पहले लोग मरने न पाएं

MP News: मध्‍य प्रदेश की मोहन यादव सरकार गले-गले तक कर्ज में डूबी है। कर्ज से बचने के लिए खर्चों पर नजर रखी जा रही है। खर्च घटाने के लिए उठाया एक कदम चर्चा में है। इस कदम के तहत सरकार लोगों के करने पर नजर रख रही है। 

Updated: Mar 08, 2026, 04:49 PM IST

मोहन यादव सरकार द्वारा प्रस्‍तुत बजट बताता है कि फरवरी 2026 तक मध्य प्रदेश सरकार पर कुल कर्ज लगभग 4.90 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। यह राशि राज्य के 2025-26 के बजट लगभग 4.2 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है। इतना अधिक कर्ज गंभीर वित्तीय दबाव को बताता है। कर्ज में डूबी मध्य प्रदेश सरकार की हालत यह हो चुकी है कि अब उसे कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। 

सरकार ने खर्च कम करने के लिए कई तरह के वित्‍तीय अनुशासन लागू किए हैं। इन्‍हीं प्रयासों के तहत मध्य प्रदेश सरकार कोशिश कर रही है कि प्रदेश में गरीबों की मृत्यु 60 साल की उम्र के पहले न हो। श्रम विभाग द्वारा सभी कलेक्टरों को भेजी गई चिट्ठी में कहा गया है कि वे अपने जिले में 60 साल से कम उम्र के मजदूरों की मौत की समीक्षा करें। विभाग का कहना है कि प्रदेश में मनुष्य की सामान्य औसत आयु 67 साल है। फिर मजदूर 60 साल से कम उम्र में क्‍यों मर रहे हैं?

60 साल से कम उम्र में मजदूर की मौत की निगरानी के फरमान का कारण भी रोचक है। असल में 60 साल से कम उम्र में मृत्यु पर सरकार को मुआवजा देना पड़ता है। हर साल बढ़ रहे मुआवजे को देखते हुए श्रम विभाग ने कलेक्टरों से कहा गया है कि वे गरीबों की मृत्यु पर नजर रखे। दरअसल, शिवराज सिंह चौहान ने संबल योजना के तहत किसी भी मजदूर की सामान्य मृत्यु पर, उसके उत्‍तराधिकारी को दो लाख रुपए मुआवजा देने का प्रावधान किया था। 2023 से 2205 तक बीते तीन सालों में कुल 1 लाख 67 हजार मजदूरों की 60 वर्ष से कम उम्र में मौत हुई। इनमें से भी 57 हजार मजदूरों की मौत सामान्‍य कारणों से हुई। इन मजदूरों के आश्रितों को सरकार ने 2 लाख की दर से 1140 करोड़ की सहायता राशि प्रदान की है। 

यह 1140 करोड़ का मुआवजा सरकार पर भारी पड़ा। ऐसे मुआवजों पर रोक के लिए कलेक्टरों से कहा गया है कि वे मजदूरों के स्वास्थ्य पर नजर रखें। बीमार होने पर मजदूरोंको अच्छा इलाज उपलब्ध करवाएं, उपचार के लिए ले जाने के लिए एंबुलेंस उपलब्‍ध करवाएं, दवाई और जांच का उपयुक्‍त प्रबंध करें। आकलन है कि बीमारों के इलाज में मुआवजे की एक चौथाई राशि ही खर्च होगी। पैसा भी बचेगा और मजदूरों की असमय मौत का आंकड़ा भी सुधेरगा। अब यह कलेक्‍टरो पर है कि वे अपने जिले में मजदूरों की असमय मौत पर कितना गंभीर होते हैं और सरकार का बजट बचाते हैं। 

पूर्व सीएस इकबाल सिंह बैंस से अफसरों ने ले लिया बदला 

मुख्‍य सचिव रहते हुए आईएएस इकबाल सिंह बैंस का सख्‍त व्‍यवहार हमेशा चर्चा में रहा है। कर्मचारी तो कर्मचारी आईएएस अफसर भी उनके बर्ताव से कांपते थे। अब आईएएस इकबाल सिंह बैंस रिटायर हो चुके हैं और उनसे बदला लेने का मौका अफसर छोड़ नहीं रहे हैं। ताजा मामला ऐसा ही है। पोषण आहार और टेक होम राशन घोटाले से जुड़े सवाल के लिखित जवाब में मुख्‍यमंत्र डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा को बताया कि इस मामले पर जांच प्रकरण दर्ज है लेकिन आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किया गया है। अब तक प्रकरण दर्ज नहीं किया गया है क्योंकि लोकायुक्त द्वारा चाही गई जानकारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है।

मुख्यमंत्री की ओर से पेश जबाव में बताया गया है कि इकबाल सिंह और ललित मोहन बेलवाल के खिलाफ प्रकरण में लोकायुक्त में वर्ष 2025 में 12 अगस्त, इसके बाद 28 नवंबर और वर्ष 2026 में 5 फरवरी को साक्ष्य एवं जानकारी के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और आजीविका मिशन के अफसरों को बुलाया गया था, लेकिन जानकारी देने के लिए कोई भी अधिकारी उपस्थित नहीं हुआ, ना ही किसी ने जानकारी भेजी। ऐसा लगातार तीन बार हो चुका है।
मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हवाले से उत्‍तर आया तो बवाल मच गया। असल में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने अपने प्रश्न में लोकायुक्त में हुई एक शिकायत पर कार्रवाई की प्रगति जाननी चाही थी। इस प्रश्न में ना तो घोटाले का जिक्र था और ना ही उन अफसरों के नाम का उल्‍लेख किया गया थे, जिनके खिलाफ शिकायत की गई है। जब मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दिए गए उत्‍तर की खबरें प्रकाशित की गई तो उसमें घोटाले और अफसरों का नाम भी सामने आ गए। पोषण आहार और टेक होम राशन घोटाले से जुड़ी इस शिकायत में तत्कालीन मुख्‍यसचिव इकबाल सिंह बैंस और आजीविका मिशन के तत्कालीन डायरेक्टर ललित मोहन बेलवाल पर आरोप है। 

अगर यह सवाल सीधा पूछा जाता और इसमें घोटाले या अफसरों के नाम होते तो इसका जवाब वैसा नहीं आता जैसा आया है। प्रश्‍न पूछने वाले विधायक प्रताप ग्रेवाल ने जितनी चतुराई दिखाई, अफसरों ने भी उतनी ही आसानी से मुख्‍यमंत्री से जवाब दिलवा दिया। यह कितनी बड़ी बात है कि मुख्‍यमंत्री स्‍वयं स्‍वीकार कर रहे हैं कि एक विभाग ही लोकायुक्त को तथ्य नहीं दे रहा है। एक तरह से सरकार ने अपनी ही कमजोरी को उजागर किया। अगर अफसर समझदारी दिखाते तो यह जानकारी बाहर नहीं आती। जवाब के बाद सनाका खींच गया लेकिन अब भी पंचायत विभाग ने कोई कदम नहीं उठाया है। विभाग ने जानकारी नहीं दी है और लोकायुक्त की जांच वहीं की वहीं है।

जय श्री राम वाली डीएसपी हिना खान और रिश्वत

ग्वालियर में हिंदूवादी संगठनों के साथ जुबानी विवाद में जय श्री राम का नारा लगा कर चर्चा में आई डीएसपी हिना खान अब नए विवाद से घिर गई हैं। आरटीआई कार्यकर्ता आशीष चतुर्वेदी ने एक ऑडियो जारी कर दावा किया है कि ग्वालियर की सीएसपी हिना खान द्वारा 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगी जा रही है। इस ऑडियो की जांच होनी चाहिए। 

यह ऑडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है। दावा है कि यह ऑडियो कथित तौर पर सीएसपी हिना खान और साबिर खान नाम के व्यक्ति के बीच बातचीत का है। बातचीत में फाइल मैनेज करने, अग्रिम जमानत दिलाने और मीडिया को संभालने जैसी बातें भी कही जा रही हैं। ऑडियो के एक हिस्से में 25-25 लाख रुपये की बात का जिक्र भी सुनाई देता है। आरटीआई कार्यकर्ता आशीष चतुर्वेदी का कहना है कि यह ऑडियो ग्वालियर पुलिस के कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि अगर यह ऑडियो सही पाया जाता है तो यह आम जनता के भरोसे को तोड़ने वाली बात होगी। 

मध्य प्रदेश पुलिस अफसरों पर भ्रष्‍टाचार के आरोप का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले अक्‍टूबर 2025 में हवाला के लगभग तीन करोड़ रुपये लूटने के मामले में महिला डीएसपी समेत 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। अच्‍छे काम के लिए देशभर के सभी थानों में नौंवीं रैकिंग वाने वाले मल्‍हारगढ़ थाने ने भी पुलिस की नाक कटवाई है। हाईकोर्ट की फटकार के बाद 12 वीं के एक वि़द्यार्थी को फर्जी केस में गिरफ्तारी करने पर मल्‍हारगढ़ थाने के छह पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था।

अब डीएसपी हिना खान आरोपों के घेरे में हैं। हालांकि, इस आरोप पर डीएसपी हिना खान ने मानहानि का दावा किया है लेकिन प्रदेश में बड़े पुलिस अफसरों द्वारा रिश्वत मांगने के बार-बार हो रहे खुलासे पूरे सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं। 

सवा लाख शिक्षकों की परीक्षा, सुप्रीम कोर्ट से आस 

देश भर में चर्चा का केंद्र बनी शिक्षकों की टीईटी परीक्षा अब मध्य प्रदेश में उबाल ला रही है। स्कूल शिक्षा विभाग ने आदेश जारी कर कहा है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने से पहले हुई थी। उन्हें सेवा में बने रहने के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल ने सभी संभागीय संयुक्त संचालकों और जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी कर कहा है कि ऐसे शिक्षक जिनकी सेवानिवृत्ति में अभी 5 साल से ज्यादा समय बचा है, उन्हें अनिवार्य रूप से टीईटी परीक्षा देनी होगी।

स्कूल शिक्षा विभाग ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर उठाया है। अगर कोई शिक्षक दो साल की तय समय सीमा में टीईटी पास नहीं करता है तो उसे सेवा से हटाया जा सकता है। इस आदेश के बाद शिक्षकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। राज्य शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष जगदीश यादव ने बताया कि आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता से चर्चा की गई है। कानूनी सलाह के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल की जाएगी। तर्क दिया जा रहा है शिक्षकों की नियुक्तियां मैरिट के आधार पर हुई थी फिर अब परीक्षा का औचित्‍य क्‍या है? प्रांताध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा कि शिक्षक हितों की रक्षा के लिए संगठन पूरी मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ेगा और मध्यप्रदेश में ये परीक्षा आयोजित नहीं करने देगा। सरकार फिलहाल बेफिक्र है कि उसका तनाव कोर्ट के पाले में चला गया है।