98 साल के हुए अभिनय सम्राट दिलीप कुमार

दिलीप कुमार की फिल्मों में नेहरूवादी सोच की झलक नज़र आती है, दिलीप कुमार ने खुद अपनी आत्मकथा में माना है कि वे पंडित जवाहरलाल नेहरू से बेहद प्रभावित रहे हैं

Updated: Dec 11, 2020, 03:26 PM IST

98 साल के हुए अभिनय सम्राट दिलीप कुमार
Photo Courtesy: The Siyasat Daily

मुंबई। बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार आज 98 वर्ष के हो गए हैं। दिलीप कुमार ने अपनी फ़िल्मी जीवन में हिंदा सिनेमा के इतिहास में अमर होने वाली बहुतेरी फ़िल्में की हैं। अंदाज़, नया दौर, फुटपाथ, राम और श्याम, गंगा जमुना, देवदास सहित अनेक फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया। भारतीय फिल्म जगत में स्टार, सुपर स्टार, मेगास्टार जैसे खिताब तो कई अभिनेताओं से जुड़े लेकिन जिस अभिनेता को देश ने अभिनय सम्राट के नाम से पुकारा वो दिलीप कुमार ही हैं। भारतीय सिनेमा के सार्वकालिक महानतम अभिनेताओं की सूची में उनका नाम हमेशा शीर्ष पर होगा।

दिलीप कुमार का असली नाम यूसुफ खान है। उनका जन्म 11 दिसंबर 1922 को पेशावर में हुआ था, जो तब अविभाजित भारत का हिस्सा था और आज पाकिस्तान में है। आज़ादी और बंटवारे से पहले उनके पिता पेशावर से मुंबई आ गए थे। 1944 में उनकी फिल्म ज्वार भाटा रिलीज़ हुई। लेकिन उस दौर की मशहूर अभिनेत्री और फिल्म निर्माता देविका रानी के कहने पर उन्होंने फिल्मों में अपना नाम यूसुफ खान से बदलकर दिलीप कुमार रख लिया। बॉम्बे टाकीज़ की मालकिन देविका रानी ने ही दिलीप कुमार को ब्रेक दिया था।

दिलीप कुमार को फिल्मों में असली पहचान 1949 में रिलीज़ हुई अंदाज़ से मिली। अंदाज़ में दिलीप कुमार के साथ राज कपूर और नरगिस ने भी काम किया था। अंदाज़ के बाद दिलीप कुमार ने दीदार, नया दौर, देवदास, राम और श्याम, मुग़ल ए आज़म, आज़ाद, गंगा जमुना और दाग जैसी क्लासिक फिल्मों में काम किया। दिलीप कुमार ने अपनी बेमिसाल अदाकारी के लिए अलग ही पहचान बनाई। देवदास और दीदार जैसी फिल्मों में गम में डूबे नायक का किरदार में मशहूर होने के चलते उन्हें ट्रेजेडी किंग कह कर पुकारा जाने लगा। 1998 में रिलीज़ हुई किला में दिलीप कुमार आखिरी बार फ़िल्मी परदे पर दिखाई दिए। 

दिलीप कुमार को उनके शानदार अभिनय के लिए फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड से कुल 8 बार नवाज़ा गया। दिलीप कुमार को 1991 में भारत के तीसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म भूषण से नवाज़ा गया था। 1994 में उन्हें अभिनय के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे बड़ा दादा साहब फाल्के सम्मान से भी पुरस्कृत किया गया था। इसके साथ ही दिलीप कुमार को पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान निशान ए इम्तियाज़ से नवाज़ा जा चुका है। उन्हें 1998 में यह सम्मान मिला था।  

नेहरूवादी दिलीप कुमार

भारतीय मूल के अंग्रेजी लेखक मेघनाद देसाई दिलीप कुमार को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हीरो के तौर पर देखते हैं। मेघनाद देसाई ने 'नेहरूज़ हीरो दिलीप कुमार' में दिलीप कुमार को नेहरू की सोच को अपनी अदाकरी के ज़रिए प्रसारित करने वाले अदाकार के तौर पर बताया है। देसाई ने लिखा है कि आज़ादी के बाद आधुनिकता, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सामंजस्य से परिपूर्ण नेहरू की विचारधारा को दिलीप कुमार ने अपने किरदारों में पिरोने का काम किया। देसाई ने तो यहां तक लिखा है कि उस दौर में नेहरू और दिलीप कुमार दोनों ही अपने क्षेत्रों में भारत के नायक थे।   

पत्रकार रशीद किदवई अपनी किताब नेता अभिनेता में तो दिलीप कुमार को एक पक्के कांग्रेसी के तौर पर दर्शाते हैं। रशीद किदवई लिखते हैं कि दिलीप कुमार के पिता और उनके दादा जब पेशावर में रहते थे, उस समय दोनों ही कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता थे। दिलीप कुमार के नाम से ख्याति प्राप्त करने से पहले भी युसूफ को जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा इस कदर प्रभावित करती थी कि वे नेहरू को सुनने उनकी रैलियों में पहुंच जाया करते थे। रशीद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि दिलीप कुमार ने अपनी फिल्मों भी नेहरू की विचारधारा ही प्रदर्शित की। चाहे वो नया दौर हो, गंगा जमुना या लीडर, दिलीप कुमार की इन फिल्मों में नेहरू की सोच की ही परछाई दिखती है। रशीद किदवई, पत्रकार वीर संघवी के हवाले से बताते हैं कि दिलीप कुमार एक सच्चे राष्ट्रवादी मुसलमान रहे और इसके बदले हिन्दुस्तान ने उन्हें जीवित रहते हुए ही लीजेंड का खिताब दिया।   

नेहरू के बारे में दिलीप कुमार ने खुद अपनी आत्मकथा द सब्सटेंस एंड द शैडो में बताया है कि ' मैं पंडित जी की बात एक बार में मानता था। उनके प्रति मेरा प्यार और सम्मान वैसा ही था जैसे आगाजी के लिए था। दिलीप साहब अपने पिता को आगाजी कह कर बुलाते थे। नेहरू उनके लिए पिता तुल्य थे।' दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में पंडित नेहरू के साथ अपनी पहली मुलाकात का ज़िक्र किया है। दरअसल 1959 में जब वे मुंबई में अपनी पैगाम फिल्म की शूटिंग कर रहे थे प्रधानमंत्री नेहरू अचानक ही उनके सेट पर पहुंच गए। सेट पर मौजूद सभी लोगों को लगा कि पंडित नेहरू सबसे पहले फिल्म की हीरोइन से मिलेंगे लेकिन पंडित नेहरू ने उनसे मिलने वालों की लाइन में सबसे आखिर में खड़े दिलीप कुमार के कंधे पर हाथ रखा और कहा, यूसुफ मुझे पता चला कि तुम यहां हो और मैंने यहां आने का फैसला कर लिया। 

इस मुलाकात के कुछ ही सालों बाद दिलीप कुमार को देश के प्रधानमंत्री की ज़रूरत पड़ने वाली थी। 1961 में दिलीप कुमार की ऑल टाइम क्लासिक फिल्मों में शुमार गंगा जमुना रिलीज़ होने वाली थी। लेकिन सेंसर बोर्ड ने फिल्म के क्लाइमैक्स सीन पर आपत्ति जताते हुए फिल्म को लटका रखा था। दरअसल क्लाइमैक्स में दिलीप कुमार के किरदार की मौत ' हे राम ' कहते हुए होती है। लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस सीन पर इसलिए रोक लगाने का निर्णय किया था क्योंकि यह शब्द महात्मा गांधी ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले दम तोड़ते हुए कहा था। सेंसर बोर्ड को लगता था कि किसी मुसलमान का फिल्म में यह शब्द कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दखल के बाद दिलीप कुमार की फिल्म को रिलीज कर दिया गया। 

जब दिलीप साहब ने नेहरू के रक्षा मंत्री की रक्षा की थी

1962 के आम चुनावों में चीन युद्ध के समय रक्षा मंत्री रहे कृष्ण मेनन के सामने सोशलिस्ट नेता जेबी कृपलानी थे। विपक्ष लगातार नेहरू से मेनन को रक्षा मंत्री के पद से हटाने की मांग कर रहा था। लेकिन नेहरू तैयार नहीं थे। लिहाज़ा जेबी कृपलानी बिहार की सीतामढ़ी की अपनी सुरक्षित सीट को छोड़कर मेनन के खिलाफ लड़ने उत्तरी मुंबई आ गए। मेनन और खुद नेहरू जान रहे थे कि चुनावों में मेनन की हार अब सुनिश्चित है। ऐसे में पहली बार प्रचार के मैदान में दिलीप कुमार को उतारा गया और प्रचार ऐसा हुआ कि मेनन चुनाव जीत गए।