Boycott Chinese Product : भारत के उद्योगों को नुकसान का डर

भारतीय निर्यातकों के महासंघ फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन की राय चीन का बहिष्कार करने से भारतीय उद्योगों पर नकारात्मक असर पड़ेगा

Publish: Jun-27, 2020, 06:33 PM IST

Boycott Chinese Product : भारत के उद्योगों को नुकसान का डर
Pic: Swaraj Express

गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवानों के शहीद हो जाने और दोनों देशों के बीच लगातार जारी तनाव के बीच देशभर में चीन से आने वाले सामान की बहिष्कार की भावना बढ़ रही है। कुछ दिन पहले भारतीय बंदरगाहों पर अधिकारियों ने चीन से आने वाले सामान को रोक लिया था, जिसके बदले चीन ने भी हांगकांग के बंदरगाहों पर भारतीय निर्यातकों का सामान रोक लिया है। इस बीच विशेषज्ञों और भारतीय उद्योग जगत के चेहरों का मानना है कि चीन से व्यापारिक रिश्ते तोड़ना भारतीय उद्योगों के लिए नुकसानदेह होगा और यह बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं है।

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भारतीय निर्यातकों के महासंघ फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष एसके सर्राफ का कहना है कि भारत बड़े स्तर पर चीन से आने वाले कच्चे माल और उत्पादों पर निर्भर करता है, ऐसे में चीनी सामान पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें सीमित करने में भारत को सावधानी बरतने की जरूरत है। सर्राफ का कहना है कि ऑटोमोबाइल से लेकर फार्मास्यूटिकल तक भारत कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है क्योंकि भारत खुद इन्हें बनाने या कहीं और से सस्ते में प्राप्त करने में सक्षम नहीं है।

असल में हर छोटे से लेकर बड़े, जरूरी से लेकर गैर-जरूरी सामान तक भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरा पड़ा है। वहीं भारतीय निर्यातक भी चीन में अच्छी खासी मात्रा में अपना सामान भेजते हैं। आंकड़ो की अगर बात करें तो वित्त वर्ष 2019-20 में भारत ने 15.5 अरब डॉलर कीमत के सामान चीन निर्यात किए, वहीं चीन ने भारत को 62.4 अरब डॉलर कीमत के सामान निर्यात किए। इस तरह भारत को चीन से 46.9 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ।

यह व्यापार घाटा किस स्तर पर रहा इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाइए कि चीन से भारत आने वाले शीर्ष 6 सामानों की कीमत भारत से चीन जाने वाले शीर्ष 50 सामानों की कीमत से अधिक रही।

असल में 1991 तक, भारतीय अर्थव्यवस्था के खुलने से पहले, देश के आयात-निर्यात में चीन का हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम था। बाद में विश्व व्यापार संगठन के बैनर तले हुए समझौतों के चलते यह हिस्सा लगातार बढ़ता गया। 2004-05 में चीन, भारत के निर्यात का 6.7 प्रतिशत हिस्सा रहा और आयात का 6.4 प्रतिशत। आज चीन भारत के आयात का 14.1 प्रतिसत हिस्सा है।

यही नहीं चीन से भारत आने वाले शीर्ष 50 सामानों में से 44 का चीन, भारत को सबसे बड़ा निर्यातक है। वहीं भारत से चीन जाने वाले शीर्ष 50 सामानों में से 31 का भारत, चीन को सबसे बड़ा निर्यातक है।

इन शीर्ष 50 सामानों में से 30 के आयात में सभी देशों के मुकाबले चीन का हिस्सा 50 प्रतिशत से भी अधिक है। वहीं भारत से चीन जाने वाले शीर्ष 50 में से 23 सामानों में भी चीन का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक है। यह बताता है कि व्यापार के दोनों पक्षों अर्थात आयात और निर्यात में चीन, भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

चीन से भारत आने वाले सामानों में सबसे ऊपर मोबाइल फोन और उनके पार्ट्स हैं। चीन इनका करीब 4.9 अरब डॉलर का निर्यात भारत को करता है। यह करीब 44 प्रतिशत है। वहीं सोलर सेल, ऑर्गेनिक रसायन और ट्रांसमिनशन उपकरणों के आयात में चीन का हिस्सा क्रमश: 78, 74 और 61 प्रतिशत है। वहीं चीन जिस इलेक्ट्रिक ट्रांसफॉर्मर का आयात करता है उसमें भारत का हिस्सा 95 प्रतिशत है। इसी तरह लौह अयस्क के चीनी आयात में भारत का हिस्सा 88 प्रतिशत है। मछली और कपास के चीनी आयात में भारत का हिस्सा करीब एक चौथाई है।

भारत चीन से कच्चा माल मंगाकर, उसे अंतिम उत्पाद में बदलकर दूसरे देशों को निर्यात करता है। UNCTAD ग्लोबल वैल्यू चेन डेटाबेस के मुताबिक इस तरह कि गतिविधियों में भी भारत की निर्भरता चीन पर बढ़ती गई है। 2009 में कच्चा माल मंगाकर उसे अंतिम उत्पाद में बदलकर निर्यात करने में चीन से भारत आने वाले कच्चे माल का हिस्सा 1.8 प्रतिशत था, वहीं 2019 में यह बढ़कर 34.1 प्रतिशत हो गया है।

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ऐसे में नीति निर्धारकों को यह सोचना होगा कि अगर वे चीन से व्यापारिक रिश्ते तोड़ते हैं तो उससे जो देश का नुकसान होगा, उसकी भरपाई कैसे होगी। खासकर कोरोना के इस समय में, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महामंदी के बादल मंडरा रहे हैं।