यह कोई भूलने वाला मंजर नहीं है

कहते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद कुल 18 योद्धा बचे थे। इसमें से 15 पांडवों के पक्ष के और 3 कौरवों के। धृतराष्ट्र ने कुरुक्षेत्र में लाशों के अपार ढेर के बीच युधिष्ठिर से पूछा था, ‘‘पाण्डव नंदन ! तुम जीवित सैनिकों की संख्या तो जानते ही हो, मरे लोगों की संख्या मुझे बताओ’’ युधिष्ठिर बोले, ‘‘राजन! इस युद्ध में एक अरब, छाछठ करोड़, बीस हजार योद्धा मारे गए हैं। इसके अतिरिक्त चौबीस हजार एक सौ पैसठ लापता हैं।’’ परंतु आज विज्ञान के युग में जब सेटेलाइट आदि से बिना चूक के गणना की जा सकती है, तो आंकड़ो में इतना अंतर? प्रजा कहती है 1600 शिक्षक कोरोना में मारे गए। राजा कहते हैं, केवल 3 मरे। इसका सीधा सा अर्थ है कि अब कोई सच बोलने वाला युधिष्ठिर ही शेष नहीं रहा।

Updated: May 31, 2021, 04:12 PM IST

यह कोई भूलने वाला मंजर नहीं है
Photo courtesy: reuters

‘इन बंद दरवाजों में मेरी सांस घुटी जाती है,  खिड़कियाँ खोलता हूँ तो जहरीली हवा आती है।’’   (कितने पाकिस्तान से)                             यह सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि मुझे मुक्ति नहीं मिल पाई। तैयारी तो पूरी थी। परंतु समय बड़ा बलवान होता है। मैं एकदम ठीक समय (जी हां ठीक समझ रहे हैं) पर कोरोना पीड़ित हो गया। मेरा परिवार व मेरे डाक्टर मित्र किसी देवदूत की तरह मुझे अपने पंखों पर उठाकर अस्पताल तक पहुंचा आए। वहां एक और डाक्टर मिले जो झूठ नहीं बोलते थे। वे बोले संक्रमण फैल चुका है और आप सही समय पर आ गए हैं। आपका संक्रमण बढ़ भी जाए तो हम संभाल लेंगे। परंतु आपको लगातार आशावादी और सकारात्मक बने रहना पड़ेगा। वैसे भी इतना बीमार हो जाने के बाद नकारात्मक कुछ बचता ही नहीं। बहरहाल मैं स्वस्थ हो गया। अस्पताल से घर आ गया और अभी तक कमोवेश स्वस्थ ही हूँ।

परंतु मैं पिछले कुछ दिनों से मुक्ति या मोक्ष जो भी कहना चाहें, को समझने की दुविधा में बेतरह उलझ गया हूँ। मेरे सामने हैं दवाइयों के अभाव में मरते लोग, आक्सीजन के न मिलने से मरते लोग, अस्पताल में जगह न मिलने से मरते लोग, अस्पताल न पहुंच पाने से मरते लोग, जांच रिपोर्ट समय पर न आने से मरते लोग, जांच रिपोर्ट गलत आ जाने से मरते लोग, अस्पतालों में आग लग जाने से मरते लोग, सरकारी अस्पतालों में जगह न मिलने से मरते लोग, निजी अस्पतालों का खर्च न उठा पाने से मरते लोग, नकली दवाईयों की वजह से मरते लोग, एम्बुलेंस का हजारों रु. न भर पाने से मरते लोग, ब्लैक में आक्सीजन न खरीद पाने से मरते लोग, मास्क न लगाने की वजह से मरते लोग, मास्क लगाने के बावजूद मरते लोग, सरकारी रिकार्ड में दर्ज मृत लोग, जो सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं है ऐसे मृत लोग, अस्पताल की छत या बालकनी से कूदकर आत्महत्या करके मरते हुए लोग, चुनाव में मरते लोग, चुनाव कराते हुए मरते लोग, अपनों को मरता देख मरते लोग आदि अनादि। क्या ये सब मुक्त हो गए ?

बात यहीं खत्म नहीं होती। अगली यात्रा में हैं मरने के बाद गंगा में तैरते मृत लोग, सड़क के किनारे लावरिस मृत पड़े लोग, अपनों से अंतिम संस्कार न करवा पाने वाले मृत लोग, चील कौओं, कुत्तों, मछलियों और मगरमच्छों का शिकार होते मृत लोग, बुलडोजर से खुदी कब्र में सिर के बल डाले जाते मृत लोग, लकड़ियां न होने से गाड़े जाते मृत लोग आदि अनादि | सब ओर मौत का शोर है | लोग दिल्ली में मर रहे हैं, मुंबई में मर रहे हैं, कोलकता में मर रहे हैं, चेन्नई में मर रहे हैं, पूना में मर रहे है, इंदौर में मर रहे हैं, भोपाल में मर रहे हैं, बेंगलोर में मर रहे हैं, लखनऊ में मर रहे हैं, पटना में मर रहे हैं, गाजियाबाद में मर रहे हैं, बदायूं में मर रहे हैं, बाराबंकी में मर रहे हैं, आरा में मर रहे हैं, बनारस में मर रहे हैं, रायपुर में मर रहे हैं, जयपुर में मर रहे हैं, आदि अनादि।

पर विवाद या विचार इन सब स्थितियों पर न होकर आंकड़ों पर अटक गया है। महाभारत के शांतिपर्व में लिखा है, ‘‘पहले न राज्य था, न राजा, न दंड और न दांडिक, सभी प्रजा धर्म से परस्पर एक-दूसरे की रक्षा करती थी।" आज राज्य है, राजा है, कानून है, कानून के रखवाले हैं और प्रजा है, पर वैसा धर्म नहीं है। ऐसा धर्म जो परस्पर एकदूसरे की रक्षा करना सिखाता हो। हां अपवाद जरुर हैं, सिख धर्म जैसे ! पर अपवादों से दुनिया नहीं चलती। दुनिया शायद मंदिर बनाने, मस्जिद बनाने और सेंट्रल विस्टा बनाने से चलती है और यह सब निर्बाध चल रहा है। चलता भी रहेगा। वैसे भी महामारियां पूरी सृष्टि का नाश थोड़े ही करती हैं। उनका विपरीत प्रभाव अधिकतम तीन चार प्रतिशत पर ही पड़ता है। परंतु मृतकों की गति या दुर्गति को लेकर किसी तरह के पछतावे की कोई खबर सामने नहीं आई। भारत में जो कुछ कोरोना की इस दूसरी लहर में हुआ वह वास्तव में बेहद चौकाने वाला भी रहा। याद रखिए अकेले उत्तर प्रदेश पंचायत चुनावों में चुनावी ड्यूटी के दौरान 1600 शिक्षकों की मृत्यु का दावा कर्मचारी संगठनों ने किया है। वहीं सरकारी आंकड़ों में यह केवल 3 (तीन) हैं। ऐसा देशभर में हो रहा है। देशभर में शिक्षकों को जोखिम भरे काम में लगाया गया है | तो सहज ही अंदाज लगाइए कि उनके साथ क्या हुआ होगा? इस दूसरी लहर में अब तक 420 से ज्यादा डाक्टरों की मृत्यु का समाचार है और सबसे ज्यादा यानी 100 से भी ज्यादा की मृत्यु राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुई है। बिहार में 95 से ज्यादा और मध्यप्रदेश में करीब 15 |

सन् 1920 के आसपास के एल सहगल ने स्ट्रीट सिंगर फिल्म में एक अनूठा गीत गाया था। न मालूम क्यों पिछले कुछ दिनों से यह गीत बेसाख्ता याद आ रहा है | शुरुआत है,

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए, चार कहार मिलैं मोरी डोलियां सजावें रे।

परंतु हमारे यहां तो इस दौरान कंधा देने के लिए चार कंधे/लोग तक नहीं मिले। बाज जगहों पर तो कंधा देने तक के हजारों रु. मांगे गए। अंतिम संस्कार का खर्च इतना हो गया कि लोग अपने प्रियजनों को बिना संस्कार किए ही विदाई दे आए। आज हम ऐसी पंगु व्यवस्था का हिस्सा हो गए हैं जो हमें गरिमामय मृत्यु संस्कार तक उपलब्ध नहीं करा सकती। गौर करिए शव वाहन न मिलने या मुंह मांगा पैसा न दे पाने की स्थिति में भारतीय नागरिक अपने प्रिय लोगों के शव सिर पर रखकर ले जा रहे हैं, कंधे पर लाद कर ले जा रहे हैं, साइकिलों पर लटकाकर ले जा रहे हैं, आटो रिक्शाओं में ले जा रहे हैं, ठेलों में ले जा रहे हैं, बैलगाड़ियों में ले जा रहे हैं, कार के सिटबेल्ट से बांध कर ले जा रहे हैं। इतना ही कई लोगों को तो अपने प्रियजनों को लकड़ी पर बांध कर घसीटते हुए ले जाना पड़ रहा है। आदि - अनादी

मेरा अपना, बेगाना छूटा जाए, अंगना तो परबत भया और देहरी भई बिदेस |

हमसे कहा गया था कि कोरोना की पहली लहर 21 दिन में जीत ली जाएगी। महाभारत के 18 दिन की दुहाई भी दी गई थी। महाभारत के स्त्री पर्व में गांधारी द्वारा विदुर, युधिष्ठिर आदि से किए गए महत्वपूर्ण प्रश्नों के अतिरिक्त, इस बात का वर्णन भी है कि युधिष्ठिर ने महाभारत में मृत सभी व्यक्तियों का श्राद्ध किया था और उनका विधिवत अंतिम संस्कार भी करवाया था। कहते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद कुल 18 योद्धा बचे थे। इसमें से 15 पांडवों के पक्ष के और 3 कौरवों के। धृतराष्ट्र ने कुरुक्षेत्र में लाशों के अपार ढेर के बीच युधिष्ठिर से पूछा था, ‘‘पाण्डव नंदन ! तुम जीवित सैनिकों की संख्या तो जानते ही हो, मरे लोगों की संख्या मुझे बताओ’’ युधिष्ठिर बोले, ‘‘राजन! इस युद्ध में एक अरब, छाछठ करोड़, बीस हजार योद्धा मारे गए हैं। इसके अतिरिक्त चौबीस हजार एक सौ पैसठ लापता हैं।’’ परंतु आज विज्ञान के युग में जब सेटेलाइट आदि से बिना चूक के गणना की जा सकती है, तो आंकड़ो में इतना अंतर? प्रजा कहती है 1600 शिक्षक कोरोना में मारे गए। राजा कहते हैं, केवल 3 मरे। इसका सीधा सा अर्थ है कि अब कोई सच बोलने वाला युधिष्ठिर ही शेष नहीं रहा। गौरतलब है, महाभारत युद्ध के दौरान दुर्योधन प्रतिदिन अपनी मां गांधारी से आशीर्वाद लेने जाता था। तब वे उससे कहती थीं, ‘‘यतो धर्मस्ततो जयः’’ यानी जहां धर्म है, वहीं विजय है।’’ गौरतलब है कि यह कोई हिन्दू-मुसलमान वाला धर्म नहीं है। यह वास्तविक धर्म है, जिसका पालन सभी को करना होता, विशेषकर शासकों को।

 सोचिए कोरोना से मारे गए तमाम निर्दोष नागरिकों का क्या होगा? क्या उन्हें मुक्ति मिलेगी? महाभारत में युधिष्ठिर द्वारा सबका श्राद्ध कर्म करने के बाद धृतराष्ट्र ने यह भी पूछा था कि मृतकों को क्या गति प्राप्त होगी? इस पर युधिष्ठिर ने कहा था कि जिसने जिस तरह से युद्ध किया, उसी के अनुसार उनको गति प्राप्त हुई है। परंतु कोरोना से मारे गए तमाम लोगों को कौन सी गति प्राप्त होगी? उनमें से अधिकांश तो किसी और की त्रुटि का शिकार हुए थे। ऐसे में उन सबकी मुक्ति का क्या होगा? वे सब कहां अटके रहेंगे? शासक वर्ग तो सभी प्रकार की ग्लानि से स्वयं को मुक्त कर एक वर्ष बाद उत्तरप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गया है।

गीत की अंतिम पंक्तियां हैं,

ले बाबुल घर आपनों, मैं चली पिया के देस।।

हमारे तमाम प्रियजन हमें छोड़ देस चले गए हैं। हमारे समाज ने अपनों से बिछुड़ गए लोगों का जो अपमान किया है, वह समझ से परे है। हम लगातार 135 करोड़ भारतीयों का रागड़ा सुनते रहते हैं। परंतु यह बेहद शर्मनाक है कि ये 135 करोड़ लोग अपनी जनसंख्या के 0.1 प्रतिशत तक को सम्मानजनक ढंग से बिदा नहीं कर पाए। हमें अपनी सामाजिक संरचना पर पुनर्विचार करना होगा। हमें अपनी गिरती नैतिकता पर भी सोचना होगा। और यह तभी संभव है कि हम अपने पूरे जीवनभर कोरोना की वजह से नदियों में तैरती लाशों, जानवरों के श्मशान में अंतिम संस्कार पाए अपने स्वजनों, श्मशान घरों और कब्रिस्तान में लंबी-लंबी कतारों को न भूलें। यह कोशिश करें कि चुनाव का रास्ता देखे बिना इस सबके लिए जिम्मेदार लोगों को आईना दिखा सकें। क्या हम सब ऐसा कर पाएंगे ?