अगस्त क्रांति के सिपाही जीजी पारिख कौन हैं, जिन्हें भारत जोड़ो अभियान से जोड़ना चाहती है कांग्रेस

डॉ. जीजी परिख 9 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल वो स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने आज भी नफ़रत छोड़ो का नारा देकर भारत को जोड़ने की मुहिम चला रखी है, 98 वर्षीय पारिख ने अगस्त क्रांति की यादें साझा करते हुए बताया कि अब वो वक़्त आ गया है कि लोगों को फिर से जेल के डर से मुक्त होना पड़ेगा

Updated: Aug 09, 2022, 09:09 PM IST

अगस्त क्रांति के सिपाही जीजी पारिख कौन हैं, जिन्हें भारत जोड़ो अभियान से जोड़ना चाहती है कांग्रेस

मुंबई। अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी ने सात सितंबर से शुरू होने जा रही भारत जोड़ो यात्रा के लिए अपनी तैयारियां तेज़ कर दी हैं। पार्टी ने देश के विभिन्न हिस्सों में संवैधानिक मूल्यों के लिए संकल्पित लोगों से संपर्क और सहयोग की अपील की है। इसी क्रम में मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े लोगों से भी अपील की जा रही है कि वे एक बार फिर से देश के माहौल में सुधार लाने के लिए अपना समर्थन दें। मुंबई वह गढ़ है जहां से महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो अभियान की शुरूआत की। उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन तब भी अभियान कमजोर नहीं पड़ा और तत्कालीन युवा आंदोलनकारियों ने इसकी अलग जगाए रखी। इन्ही में से एक हैं जीजी पारिख। 98 बरस के पारिख आज भी नफरतों भारत छोड़ो का नारा बुलंद किए हुए हैं।

उस संघर्ष को याद करते हुए वो बताते हैं कि- महात्मा गांधी ने 8 अगस्त के भाषण में हिन्दू-मुस्लिम एकता की अपील करते हुए घोषणा की थी कि देश का हर नागरिक आज के बाद खुद को आज़ाद समझे। उन्होंने ‘करो या मरो’ का आव्हान करते हुए कहा कि देश की सत्ता मेहनतकश लोगों के हाथ में जानी चाहिए और यह आंदोलन अहिंसात्मक होना चाहिए। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा था कि सांप्रदायिक मानसिकता वालों को आंदोलन से दूर रहना चाहिए।

मुंबई के लोकप्रिय समाजवादी मेयर यूसुफ मेहेर अली, जिन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था, को मालूम हो गया था कि गिरफ्तारियां की जाएंगी। परंतु गांधी जी को लगता था कि अंग्रेज इतनी जल्दबाजी नहीं करेंगे। यूसुफ मेहेर अली ने सभी सोशलिस्टों को भूमिगत होने की सलाह दे दी थी। जिसके चलते डॉ. राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन, एसएम जोशी, शिरू भाऊ लिमये तथा सुचेता कृपलानी सहित कई कांग्रेसी नेता भूमिगत हो गए थे। 9 अगस्त की सुबह सभी प्रमुख कांग्रेस नेता गिरफ्तार कर लिए गए। यूसुफ मेहेर अली अशोक मेहता आदि समाजवादी नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए। जेपी पहले से ही जेल में थे।

जीजी पारिख 9 अगस्त के उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि उस दिन कस्तूरबा जी को तिरंगा फहराना था लेकिन उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया तब अरुणा आसफ अली आई और राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर चली गईं।आंसू गैस छोड़ी गई, गोलियां भी चलीं। सर्वविदित है कि 23 जून 1757 के दिन जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पलासी के युद्ध में हरा दिया था, तबसे देश को गुलाम बनाने की शुरुआत की थी। तब से लेकर 15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने तक 9 अगस्त 1942 का अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन सबसे बड़ा जनआंदोलन था। जिसमें 50 हज़ार राष्ट्रभक्त शहीद हुए और एक लाख से ज्यादा लोगों को सजाएं हुईं।

डॉ. जीजी पारिख को 12 अगस्त को गिरफ्तार किया गया। वर्ली (मुम्बई) में अस्थाई जेल बनायी गयी थी, वहां तीसरी मंजिल पर एक कमरे में उन्हें रखा गया था जिसमें अन्य 12 लोग भी पहले से थे। बिछाने के लिए जूट की दरी दी गई थी। डॉ. जीजी बताते हैं कि वर्ली जेल में रोज सुबह बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लाया जाता था। अधिकतर लोगों को शाम तक छोड़ दिया जाता था। जिससे उन्हें लगता था कि छात्र होने के कारण उन्हें भी छोड़ दिया जाएगा। एक दिन ऑर्थर रोड जेल से कुछ आंदोलनकारी लाए गए। वे कुछ मांगे कर रहे थे, रास्ते पर बैठ गए, शाम को जब वे अपने कमरे में गए, तब उन्हें लगा कि उनकी मांगे मान ली गई हैं। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। ज्यों ही वह नारा लगाया गया, जेल के कर्मचारियों ने आकर सभी को पीटना शुरू कर दिया। जीजी को भी चोटें आयीं, खून निकला तब उन्हें यह समझ आ गया कि उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा।

डॉ पारिख बताते हैं कि तब से वे पक्के जेल वाले बन गए। उन्हें एक महीने के लिए ठाणे जेल में रखा गया। वर्ली जेल में रोहित दवे स्टडी सर्किल लिया करते थे। वे मार्क्सवाद से लेकर भारतीय संस्कृति तक पढ़ाया करते थे। जीजी याद करते हैं कि लगातार अंग्रेजी की किताबें पढ़ते-पढ़ते उनकी अंग्रेजी भी सुधर गई थी। ठाणे जेल में दत्ता तमाणे और वर्ली जेल के सीबी वारद उनका ख्याल रखते थे। पारिख उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि एक और पारसी साथी थे जो बहुत रईस घराने के थे। उनके पिताजी जेल में बढ़िया खाना कभी-कभी लाया करते थे जो सभी मिलकर खाते थे।

अंग्रेजी कैद में जीजी भारतीय अधिकारियों की तारीफ भी करते हैं। लेकिन अपनी पिटाई को भी नहीं भूले हैं। उन्होंने कहा कि हम पहले जब किताब, वॉलीबॉल या कैरम की मांग करते थे, तो पहले कई दफा पीटा गया, लेकिन बाद में जेल अधिकारी मान लेते थे। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के आंदोलन के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि काफी भारतीय पुलिस और सीआईडी के अधिकारी और कर्मचारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ हमदर्दी रखते थे, जो आदेश आता था उसका पालन तो करते थे लेकिन व्यवहार से पता चलता था कि उनकी हमदर्दी आंदोलनकारियों के साथ है।

1942 के आंदोलन में 10 महीने के जेल प्रवास के बारे में खास बातें पूछने पर वे बताते हैं कि 1942 के आंदोलन में कम्युनिस्ट शामिल नहीं थे इसलिए उन्हें कांग्रेसियों के द्वारा विश्वासघाती माना जाता था। इस परिस्थिति में तीन नए संगठन बनाने का निर्णय लिया गया। एआईटीयूसी छोड़कर राष्ट्रीय मज़दूर सभा बनाने का निर्णय लिया गया जो बाद में हिन्द मज़दूर सभा बनी। सांस्कृतिक समूह इप्टा की जगह इंडियन नेशनल थियेटर तथा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की जगह स्टूडेंट कांग्रेस को स्थापित किया गया। इंडियन नेशनल थियेटर कमलादेवी चट्टोपाध्याय तथा रोहित दवे के नेतृत्व में जेल से निकलने के बाद गठित किया गया। वे बताते हैं कि लंबे समय तक इंडियन नेशनल थियेटर चला। बाद में बिरला ने उस पर कब्जा कर लिया। उन्हें यह भी याद है कि इस ग्रुप का एक नाटक 'भूख' बंगाल के अकाल को लेकर बना था जोकि उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ था।

स्टूडेंट कांग्रेस के गठन में जीजी अपनी भूमिका के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि उनके साथ रामसुमेर शुक्ला, प्रभाकर कुंटे तथा रवि वर्मा की बड़ी भूमिका थी। डॉ. जीजी पारिख 1947 में स्टूडेंट कांग्रेस मुंबई के अध्यक्ष थे। जेल से आने के बाद 42 ग्रुप तथा समाजवादियों ने तय किया है कि वे गिरगांव चौपाटी से अगस्त क्रांति मैदान तक का मौन जुलूस नियमित निकाला करेंगे। इस कार्यक्रम में मधु दण्डवते, रोहित दवे, नरेंद्र पंड्या, चंद्रकांत दलाल, दामू झावेरी, ललित मोहन जमुनादास किनारीवाला, निरुपमा मेहता, हिम्मत झवेरी आदि शामिल हुआ करते थे।

एक बार 9 अगस्त को जब उषा मेहता, मृणाल गोरे, मंगला पारिख के नेतृत्व में मौन जुलूस निकाला जा रहा था तब नाना चौक पर पुलिस ने उसे रोक दिया, लाठीचार्ज भी हुआ और विरोधस्वरूप संगठन ने सत्याग्रह किया। तब से आज तक कभी मौन जुलुस को महाराष्ट्र पुलिस और प्रशासन द्वारा नहीं रोका गया। उन दिनों को याद कर जीजी पारिख और अन्य समाज सेवियों ने मंगलवार 9 अगस्त को फिर एक मौन जुलूस निकाला, जो बाल गंगाधर तिलक और विठ्ठल भाई पटेल की मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ समाप्त हुआ।

अंग्रेजों भारत छोड़ो की आवाज़ बुलंद करनेवाले स्वतंत्रता सेनानी डॉ जीजी अब देश में फैले नफरत के माहौल से आहत हैं। उन्होंने इस अगस्त नफरतों भारत छोड़ो का नारा दिया है। उनके साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दत्ता गांधी, महात्मा गांधी के प्रपोत्र तुषार गांधी, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, हिमांशु कुमार, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और अनेक सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने मौजूदा लोकतंत्र पर बढ़ते हमलों के खिलाफ मौन मार्च निकाला और देश को इस माहौल से निकालने की प्रतिज्ञा की।