त्रिपुरा में वकीलों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ UAPA पर सुप्रीम कोर्ट करेगी सुनवाई

बीजेपी शासित त्रिपुरा में भड़की हिंसा के खिलाफ पोस्ट करने पर पुलिस ने 102 लोगों पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज किया था

Updated: Nov 11, 2021, 01:37 PM IST

त्रिपुरा में वकीलों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ UAPA पर सुप्रीम कोर्ट करेगी सुनवाई
Photo Courtesy: ABP

नई दिल्ली। बीजेपी शासित त्रिपुरा में फैली सांप्रदायिक हिंसा को लेकर बोलने पर वकीलों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ UAPA के तहत मुकदमा दर्ज करने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। 

याचिकाकर्ता पत्रकार श्याम मीरा सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना से जल्द सुनवाई की मांग की। चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता से कहा कि आप इस मामले को लेकर हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? इस पर प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (UAPA) कानून को भी चुनौती दी है। इस पर CJI ने कहा कि वो जल्द सुनवाई की एक तारीख देंगे।

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दरअसल, बीते दिनों बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा के विरोध में 26 अक्टूबर को विश्व हिंदू परिषद ने एक रैली का आयोजन किया था। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने इस दौरान कथित रूप से जमकर उपद्रव मचाया गया। उन्होंने मस्जिद में तोड़फोड़ की और कई मुसलमानों की दुकानें जला दी गई। इसके बाद कई जगहों से दिल दहलाने वाली तस्वीरें सामने आई। 

त्रिपुरा हिंसा के बाद सोशल मीडिया यूजर्स सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार की आलोचना करने लगे। पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने लिखा, 'Tripura is Burning' यानी त्रिपुरा जल रहा है। इस तरह अन्य लोगों ने भी इस घटना की निंदा की। सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों की टीम इस घटना की तह तक पहुंचने के लिए त्रिपुरा पहुंची। फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 26 अक्टूबर की रैली के तीन दिन पहले से लोगों को उकसाना शुरू कर दिया गया था। 

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फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक हिंदू धर्म के लोगों को लगातार भड़काया गया नतीजतन 26 अक्टूबर को 50 से अधिक जगहों पर तकरीबन 10 हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई। अनियंत्रित भीड़ ने दर्जनों मस्जिदों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के घरों को निशाना बनाया। त्रिपुरा पुलिस इसपर कार्रवाई के बजाए उल्टा वकीलों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ ही UAPA जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस के इस कार्रवाई को अब सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई है।