सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि क़ानूनों के अमल पर रोक लगाई, कमेटी भी घोषित

Supreme Court Hearing Live Updates: सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाने के साथ साथ चार सदस्यों की एक कमेटी बनाने का आदेश भी दे दिया है

Updated: Jan 12, 2021, 11:52 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि क़ानूनों के अमल पर रोक लगाई, कमेटी भी घोषित

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के बनाए तीनों कृषि कानूनों के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने कृषि कानूनों के मुद्दे पर किसान संगठनों की आपत्तियों को समझने और ज़मीनी हालात का जायजा लेने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी भी बना दी है। 

चार सदस्यों वाली इस समिति के सदस्यों के नाम भी सुप्रीम कोर्ट ने घोषित कर दिए हैं। ये नाम हैं 1. भूपिदर सिंह मान, अध्यक्ष भारतीय किसान यूनियन, 2.डॉ प्रमोद कुमार जोशी, कृषि विशेषज्ञ, 3. अशोक गुलाटी, कृषि अर्थशास्त्री, 4. अनिल घनवत, शेतकरी संघटना, महाराष्ट्र।

किसानों के आंदोलन में खालिस्तानी शामिल : सरकार

इससे पहले कृषि कानूनों के मसले पर हो रही सुनवाई के दौरान आज सरकार ने कहा कि किसानों के आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की घुसपैठ हो चुकी है। सरकार ने कहा कि 26 जनवरी को दिल्ली में गणतंत्र दिवस के कारण कड़े सुरक्षा बंदोबस्त होते हैं जिसके चलते उन्हें राजधानी में घुसने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। भारत सरकार की तरफ से यह बात अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कही। इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा  कि क्या वे किसान आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों के शामिल होने की पुष्टि करते हैं? अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हां वे इसकी पुष्टि करते हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने एटॉर्नी जनरल से इस बारे में हलफनामा दायर करने को कहा है। एटॉर्नी जनरल ने कहा कि वे कल हलफनामा और आईबी की रिपोर्ट दोनों कोर्ट में पेश कर देंगे। 

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि दिल्ली में सुरक्षा की दृष्टि से किसे आने देना है और किसे नहीं यह देखना सरकार का अधिकार है। यह देखना कि किसी के पास हथियार तो नहीं हैं, आपका काम है। प्रदर्शन की इजाजत दिल्ली पुलिस को देनी है। इस मामले में हम कोई दखल नहीं देंगे। 

 इससे पहले आज की सुनवाई शुरू होने पर सुप्रीम कोर्ट में किसान संगठनों के वकीलों ने कहा कि आंदोलनकारी किसान सिर्फ कानून की वापसी चाहते हैं। वे कानूनों पर अमल को फौरी तौर पर रोकने या एक्सपर्ट कमेटी बनाने के सुझाव से सहमत नहीं हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम कानून पर रोक लगाने का आदेश यूं ही नहीं दे सकते। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है और हम अपने अधिकारों के दायरे में ही काम कर सकते हैं। 

सुनवाई का ताज़ा अप़डेट: 

चीफ जस्टिस ने कहा है कि अगर किसी को दिल्ली में रैली या विरोध प्रदर्शन करना है तो उसे दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को एप्लीकेशन देना चाहिए। पुलिस उन्हें प्रदर्शन के लिए लागू ज़रूरी शर्तें बताएगी। रैली के लिए उन शर्तों का पालन करना होगा, वरना उसे रद्द कर दिया जाएगा। सवाल ये है कि क्या किसी ने प्रदर्शन के लिए एप्लीकेशन दिया है। 

चीफ जस्टिस ने रैली के लिए पुलिस की इजाजत लिए जाने का जिक्र उस वक्त किया जब वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने किसानों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार का मुद्दा उठाया। विकास सिंह ने कहा कि उन्हें दिल्ली में घुसने से रोका जा रहा है। किसानों को रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं दी जा रही, जहां आज़ादी के बाद से ही प्रदर्शन होते आ रहे हैं? या फिर बोट क्लब पर भी प्रदर्शन की इजाजत दी जा सकती है। अगर उन्हें किसी ऐसी जगह पर जाकर प्रदर्शन के लिए कहा जाएगा, जहां वो किसी को नज़र ही न आए तो प्रदर्शन का मतलब ही क्या रह जाएगा। 

इसी के बाद चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या किसान संगठनों ने प्रदर्शन की इजाजत देने के लिए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पास कोई एप्लीकेशन दिया है। इस पर विकास सिंह ने कहा कि उन्हें तो दिल्ली में आने ही नहीं दिया जा रहा। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि फिर भी वे पुलिस कमिश्नर के पास एप्लीकेशन तो दे ही सकते हैं। 

सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि कोर्ट को कोई भी आदेश पारित करते समय यह बात साफ कर देनी चाहिए कि इसे किसी की हार या जीत न माना जाए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि हमारा आदेश ईमानदारी से किए गए इंसाफ की जीत होगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसानों को नए कानून की वजह से अपनी जमीनें बिक जाने का डर है तो हम यह अंतरिम आदेश पारित कर सकते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके की खेती के तहत किसानों की ज़मीने बेची नहीं जा सकेंगी।   

 आज की सुनवाई जारी है, जिसका ताज़ा हम आपको यहां लगातार देते रहेंगे।

सोमवार की सुनवाई में क्या-क्या हुआ 

इसके पहले सोमवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी कई अहम बातें कहीं हैं, जिनका किसान आंदोलन और कृषि कानूनों के भविष्य पर गहरा असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सबसे बड़ी बात ये कही है कि केंद्र सरकार को तीनों कृषि कानूनों को होल्ड कर देना चाहिए। चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कानून को होल्ड पर रख दिया गया तो बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनेगा। इसके साथ ही अदालत ने एक्सपर्ट पैनल बनाकर समस्या के समाधान की तैयारी भी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई चीफ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस बोपन्ना और जस्टिस रामासुब्रमण्यम की बेंच ने की। 

सरकार को कड़ी फटकार

अदालत ने सोमवार को इस मामले में सुनवाई के दौरान सरकार के रवैये पर नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि सरकार किसानों के भारी विरोध को देखते हुए इन कानूनों को होल्ड क्यों नहीं कर रही? कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार कानूनों को होल्ड नहीं करती तो यह कदम उसे उठाना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस मामले को जिस तरह से संभाला, उससे अदालत को निराशा हुई है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कानून पर रोक लगाने के प्रस्ताव का विरोध किया। जिस पर अदालत ने कहा कि कानून पर नहीं, तो उसके अमल पर तो रोक लगाई ही जा सकती है। 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के आखिरी लम्हों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के बारे में काफी तल्ख टिप्पणियां की हैं। इस पर सीजेआई ने कहा कि हमने बिलकुल सीधी-सादी और तथ्यपरक बातें ही कही हैं। मेहता ने कहा कि सरकार के फैसले सर्वोच्च स्तर पर किए गए हैं। कुछ किसान संगठनों के लोग बैठक में आने के बाद अपनी कुर्सी पीछे घुमा लेते थे और मंत्रियों के बात करते समय अपने आंख-कान बंद कर लेते थे। सीजेआई ने कहा कि इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते। मेहता ने इस पर दावा किया कि सरकार ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। जिस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, लगता तो नहीं कि उसका कुछ असर हुआ है। इसी के बाद सीजेआई ने सुनवाई मंगलवार को फिर जारी रखने की बात कही और बेंच उठ गई।

सिर्फ कानून वापसी की मांग न करें किसान : अटॉर्नी जनरल

सुनावाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि किसानों को ये भरोसा दिलाना चाहिए कि वे सिर्फ कानून वापसी की मांग नहीं करेंगे। अगर वे ऐसा वादा नहीं करते, तो कृपया कानून के अमल पर रोक न लगाई जाए। इस पर सीजेआई ने कहा कि हमें रोक लगाने में जल्दी क्यों नहीं करनी चाहिए? अटॉर्नी जनरल अदालत को धैर्य रखने के बारे में लेक्चर न दें।

एक्सपर्ट पैनल बनाने की तैयारी

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस मसले के समाधान के लिए एक एक्सपर्ट पैनल बनाने की मंशा जाहिर की है, जिसके लिए दोनों पक्षों से नामों का सुझाव देने को कहा गया है। चीफ जस्टिस ने इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों को शामिल करने की बात भी कही है। सीजेआई ने कहा कि उन्होंने इस बार में पूर्व सीजेआई पी सथासिवम से बात भी की थी, लेकिन वे हिंदी नहीं समझते लिहाजा उन्हें पैनल में शामिल नहीं किया जा सकता। सीजेआई ने दोनों पक्षों से और नामों का सुझाव देने को कहा है। चीफ जस्टिस ने कहा है कि अदालत इस मसले को सुलझाने के लिए एक पैनल बनाने का सुझाव दे रही है। उन्होंने कहा कि कोर्ट अपनी तरफ से एक पैनल का गठन करने को तैयार है, जो इस मसले पर वार्ता करके समाधान निकालेगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि हम बातचीत के लिए माहौल को बेहतर बनाना चाहते हैं। जब तक आम सहमति से कोई समाधान नहीं निकलता, तब तक कानूनों को होल्ड पर रखने में क्या दिक्कत हो सकती है?

कानून होल्ड होने के बाद कम से कम बुजुर्ग प्रदर्शन न करें: CJI

चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर हम कानूनों को होल्ड कर देते हैं तो फिर यहां प्रदर्शन जारी रखने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। खासतौर पर बुजुर्गों के लिए। इस पर किसानों की तरफ से दलीलें रख रहे वरिष्ठ वकील एच एस फूल्का ने कहा कि हमने बुजुर्गों को मनाने की कोशिश की, लेकिन वे वापस लौटने को तैयार नहीं हैं। इस पर चीफ जस्टिस बोले, उन्हें बताइए कि CJI यानी भारत के प्रधान न्यायाधीश ने कहा है कि वे वापस लौट जाएं। फिर देखिए कि क्या वे तैयार होते हैं।

खून-खराबा हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा : CJI

उन्होंने पूछा कि अगर कोई खून-खराबा हुआ तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? संवैधानिक अदालत के तौर पर देश के नागरिकों को अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है। अगर कोई टकराव हो गया तो क्या होगा? 

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि किसानों को प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। अदालत इस पर रोक नहीं लगा सकती। हालांकि इसके साथ ही अदालत ने ये हिदायत भी दी कि प्रदर्शन का तरीका गांधी जी के सत्याग्रह की तरह शांतिपूर्ण होना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट में किसानों की तरफ से वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे समेत कई वकीलों की टीम ने दलीलें पेश कीं, जबकि सरकार का पक्ष अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, स़ॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने रखा।

कानून के समर्थक संगठनों के वकील भी पेश हुए

सुनवाई के दौरान कुछ ऐसे संगठनों की तरफ से भी वकील पेश हुए हैं जो कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं।वकील हरिओम शर्मा ने राजस्थान के किसानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल कानूनों को लागू करवाना चाहते हैं। इसी तरह वकील अर्चना पाठक दवे ने दक्षिण भारत के एक किसान संगठन की तरफ से पेश होते हुए कहा कि उनके मुवक्किल भी कानूनों पर अमल के पक्ष में हैं। वकील एमपी देवनाथ ने भी कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स की तरफ पेश होकर कानूनों पर अमल का समर्थन किया है।