दफ्तर दरबारी: बेमुरव्वती से हटाए गए शिवराज के पसंदीदा अफसर की आधी रात वापसी क्यों
MP Politics: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का एक फैसला फिर चर्चा में है। इस बार उन्होंने उस अफसर को अपने करीब नियुक्त किया है जिसे दो साल पहले हटाया था। तब हटाने की वजह आईएएस का पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का करीबी होना बताया गया था।
13-14 फरवरी की रात 2 बजे जारी हुई आईएएस तबादला सूची में आईएएस मनीष सिंह पुन: जनसंपर्क आयुक्त बना दिए गए हैं। इस तरह सवा दो साल बाद पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के पसंदीदा अफसर आईएएस मनीष सिंह फिर उसी कुर्सी पर आ गए हैं जिस पर उन्हें बेमुरव्वती से हटा दिया गया था।
मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने काम संभालते ही दिसंबर 23 में सबसे पहले जिन अफसरों को हटाया था उनमें एक नाम आईएएस मनीष सिंह का भी था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खास अफसरों में शुमार मनीष सिंह जनसंपर्क विभाग की कमान संभाल रहे थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 2009 बैच के आईएएस अफसर मनीष सिंह की जनसंपर्क आयुक्त जैसे ताकतवर पद से हटाते हुए बिना विभाग का अपर सचिव बना कर मंत्रालय में बैठा दिया था। जनसंपर्क के साथ-साथ उन्हें मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के एमडी पद से भी हटा दिया गया है। वे करीब आठ माह लूप लाइन में रहे फिर हाउसिंग बोर्ड में एमडी बना कर उन्हें मुख्यधारा में लाया गया था।
तब माना गया था कि उन्हें नगरीय विकास एवं प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विभाग से जुड़े हाउसिंग बोर्ड में भेजना एक राजनीतिक निर्णय था। आईएएस मनीष सिंह ने इंदौर में पहले निगम आयुक्त और फिर कलेक्टर रहते हुए कई कार्य किए थे। उनकी खूब पीठ थपथपाई गई थी लेकिन उनकी कार्यशैली ने बीजेपी के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय को खूब नाराज भी किया था। इस नियुक्ति पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने एक्स पर लिखा था, ''इंदौर और उज्जैन में हजारों करोड़ों की हाउसिंग बोर्ड की अधिकृत एवं प्रस्तावित भूमियां को मुक्त करवाने के लिए मनीष सिंह को हाउसिंग बोर्ड का एमडी नियुक्त किया गया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि मनीष सिंह की नियुक्ति के बाद हाउसिंग बोर्ड की योजनाओं से किन जमीनों को मुक्त किया जाएगा। सीएम मोहन यादव इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं और उज्जैन उनका गृह नगर है। समझिए! इसके पीछे बड़ा खेल है भैया!''
फिर नवंबर 24 में एक और तबादला सूची आई जिसमें मप्र गृह निर्माण एवं अधोसंरचना विकास मंडल के आयुक्त मनीष सिंह को परिवहन विभाग का अपर सचिव, मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम का प्रबंध संचालक तथा इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट अथारिटी भोपाल का कार्यपालन अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
अब वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के विभाग जनसंपर्क में आयुक्त बना दिए गए हैं यानी मुख्यमंत्री के सबसे करीबी अधिकारियों में से एक हो गए हैं। शिवराज सिंह चौहान की विदाई के बाद मनीष सिंह पर बीजेपी नेताओं की नाराजगी भारी पड़ी थी। जनसंपर्क आयुक्त जैसे अहम् पद से हटा कर बेहद सामान्य पद पर भेजे जाने का कारण शिवराज सिंह चौहान के प्रति वफादारी ही मानी गई थी। वे मुख्यमंत्री ने अपने चहेते अफसर आईएएस दीपक सक्सेना को हटा कर मनीष सिंह पर भरोसा जताया है तो इसलिए कि वे मोहन सरकार के लिए भी वैसा टारगेटेड कार्य करेंगे जो शिवराज सरकार के दौरान किया था।
यह भी गौरतलब है कि जबलपुर कलेक्टर के रूप में अपने काम से ख्यात हुए आईएएस दीपक सक्सेना साढ़े चार माह ही आयुक्त जनसंपर्क रह सके हैं। साफ है, मनीष सिंह के आने के बाद जनसंपर्क विभाग में फिर बदलाव दिखाई देगा। आयुक्त के रूप में मनीष सिंह के आने के बाद जनसंपर्क विभाग में फिर बदलाव दिखाई देगा। राजनीतिक संकेत तो यह भी है कि यह असर केवल जनसंपर्क में प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं बल्कि इंदौर सहित प्रदेश में राजनीतिक स्तर पर भी दिखाई देगा।
क्या लाठी चला कर बच जाएंगे कलेक्टर?
शहडोल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की यात्रा के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखा कर प्रदर्शन किया। सुरक्षा में इस चूक से कलेक्टर डॉ् केदार सिंह इतने कुपित हो गए कि उन्होंने पुलिसकर्मी से लाठी लेकर खुद प्रदर्शनकारियों को हटाया। चर्चा है कि कलेक्टर कांग्रेसियों को पीट कर भी सरकार को खुश नहीं कर पाएंगे। उनकी कार्यप्रणाली विदाई का कारण बनने वाली है।
वीडियो सामने आने के बाद कलेक्टर की आलोचना की जा रही है। यही नहीं प्रशासन ने प्रदर्शन को देखते हुए जिन लोगों को गिरफ्तार किया था उनमें एक नाबालिग भी था। जिसकी 12 वीं की परीक्षा थी। अन्य को तो समय पर छोड़ दिया गया लेकिन इस विद्यार्थी को हिरासत में रखा गया। बार-बार परीक्षा की दुहाई देने के बाद भी उसकी जमानत में देरी हो गई तथा उसकी पेपर छूट गया। सीएम के सुरक्षा में चूक तथा काले झंडे दिखाए जाना कलेक्टर के लिए भारी पड़ सकती है।
इसके पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा गलत एनएसए आदेश जारी करने के मामले में शहडोल कलेक्टर डॉ. केदार सिंह पर 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है। कोर्ट ने कलेक्टर की कार्यशैली को मनमाना बताया था और उनके खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश दिए थे। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कलेक्टर आंखें बंद करके काम कर रहे हैं और भ्रामक हलफनामा पेश किया। इस गंभीर टिप्पणी और जुर्माने के बाद उन्हें हटाए जाने के आसार थे। अब मुख्यमंत्री की सुरक्षा में चूक उनके हटने का एक और कारण बन गया है।
आईएएस के कहे का जवाब दो आईएएस की पोस्ट
ब्राह्मण बेटियों को लेकर दिए गए बयान पर दलित आईएएस संतोष वर्मा के खिलाफ वैसी कार्रवाई नहीं हुई है जैसी ब्राह्मण संगठन और नेता चाहते थे। बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं ने आईएएस संतोष वर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला और भोपाल से लेकर दिल्ली तक विरोध जता दिया लेकिन आईएएस संतोष वर्मा का केवल तबादला किया गया। मोहन सरकार ने आईएएस संतोष वर्मा पर कार्रवाई को लेकर केंद्र को पत्र भेजा है। जब पत्र भेजा गया था तभी यह आकलन किया गया था कि सरकार का यह पत्र मात्र दिखावा है क्योंकि दलित आईएएस पर कार्रवाई के लिए जो प्रक्रिया पूरी करनी थी वह सरकार ने नहीं की है। सरकार के इस रवैये से ब्राह्मण आक्रोशित है।
अब दो रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव और नियाज अहमद ने ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बताते हुए सोशल मीडिया पोस्ट की है। प्रदेश के पूर्व अपर मुख्य सचिव रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव ने अपनी फेसबुक वॉल पर कहा कि ब्राह्मण कोई जाति नहीं बल्कि एक वर्ण है। उन्हें जबरन जातिवादी विचारधारा में लपेट दिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियां नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं? ब्राह्मणों की श्रेणियां अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। जाति व्यवस्था में ऊंचा-नीचा होता है। पर ब्राह्मणों के स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है।
दूसरी तरफ, आईएएस नियाज खान फिर ब्राह्मण वर्ग के पक्षधर बनकर आगे आए। रिटायर आईएएस नियाज खान ने कहा है कि शिखा का अपमान या अपवित्रता किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने एक्स हेंडल पर लिखा कि वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि ब्राह्मणों के लिए शिखा रखना अनिवार्य है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि शिखा का अपमान या अपवित्रता बर्दाश्त न करें। कोई शिखा का अपमान करे तो ब्राह्मण तुरंत कानूनी एक्शन लें।
ब्राह्मण समाज के नेताओं के लिए यही एक राहत की बात है कि कोई तो उनके पक्ष में बोल रहा है, अन्यथा तो बीजेपी ने जो जातीय समीकरण देखते हुए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। पार्टी और सरकार के स कदम ने जले पर नमक की तरह ही काम किया है।
राजधानी की शराब दुकान, मानव अधिकार और कलेक्टर
राजधानी के सबसे व्यस्त और हाई प्रोफाइल बाजार 10 नंबर मार्केट इनदिनों नए विवाद का कारण है। यहां मुख्य मार्ग पर दूसरी शराब दुकान खुल गई है। यह शराब दुकान आम दुकान जैसी नहीं बल्कि लिकर मॉल की तरह है। मुद्दा व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का नहीं है बल्कि नई दुकान का आर्य समाज मंदिर के ठीक सामने होना है।
इस नई शराब दुकान का विरोध करत हुए लोग सड़क पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मुख्य मार्ग पर आर्य समाज मंदिर के सामने सिर्फ 29 मीटर दूर पर शराब दुकान चल रही है। दिर में सुबह-शाम दर्शन-पूजन के लिए द्धालु पहुंचते हैं तो वहीं दूसरी ओर शराब दुकान पर नशेड़ियों का जमावड़ा लगा रहता है। यह आए दिन विवाद का कारण बनता है। शिकायत के बाद राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो आर्य मंदिर पहुंचे थे। रहवासियों की शिकायत पर आयोग सदस्य प्रियंक कानूनगो ने इंच टेप से मंदिर से शराब दुकान की दूरी नापी। इस जांच में आर्य समाज मंदिर से शराब दुकान की दूरी महज 29 मीटर निकली। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा है कि शराब दुकान और मंदिर की दूरी गाइडलाइन से कम है। ऐसे में अब शराब दुकान पर जल्द कार्रवाई की जानी चाहिए। दुकान हट नहीं पा रही है। अब आयोग सदस्य प्रियंक कानूनगो ने भोपाल कलेक्टर से कहा है कि वह चार सप्ताह में कार्रवाई करे। प्रदर्शनकारी निराश हैं और इस आशंका में भी हैं कि एक माह में शराब दुकान नहीं हटी तो क्या होगा? आखिर मामला ताकत का है। पुराना रिकार्ड बता रहा है कि कलेक्टर का आबकारी के मामले पर कार्रवाई करना मुश्किल है।




