Mahatma Gandhi: गांधी का आज़ाद भारत सभी का भारत

गांधी की आज़ादी में मानवता के वे महान मूल्य निहित है जो धर्म,जाति,संप्रदाय और प्राणी का बिना भेद किए सबके कल्याण पर आधारित है। गांधी के आंदोलन इन्ही महान आदर्शों और मूल्यों पर आधारित थे। वे शोषणयुक्त समाज को किसी राजनीतिक सत्ता से खत्म करने में विश्वास नहीं करते थे,इसके लिए वे स्वावलंबी समाज और विकेंद्रीकृत व्यवस्था चाहते थे जिससे अहिंसक वातावरण तैयार हो सके

Updated: Aug 18, 2020 05:32 PM IST

Mahatma Gandhi: गांधी का आज़ाद भारत सभी का भारत
photo courtesy: Deccan quest

महात्मा गांधी ने अपने साथ लोगों के चलने का आह्वान कुछ इन शब्दों में किया था,”मेरे साथ चलना है तो अपना सब कुछ त्यागकर चलना होगा। जो लोग मेरे साथ आएंगे वे खाली जमीन पर सोने को तैयार रहे,मोटा कपड़ा पहनना होगा, जल्दी उठना होगा,सीधा साधा और नीरस खाना खाकर पेट भरना होगा और यहाँ तक की अपना मल स्वयं साफ करने के लिए तैयार रहे। दरअसल गांधी की आज़ादी गोरों के विरुद्ध संघर्ष के साथ सामाजिक न्याय स्थापित करने में भी थी,जिसके लिए बापू आजीवन कृतसंकल्पित रहे।

गांधी बहुत अच्छे वक्ता नहीं था लेकिन उनकी आवाज भौगोलिक और सांस्कृतिक विभिन्नता वाले इस देश के कोने कोने तक उस समय पहुंची जब संचार के कोई साधन नहीं थे। वे अवतारी पुरुष भी नहीं थे लेकिन वे जब भी आवाज देते,पूरा देश उनके साथ होता।

देश के विभाजन को लेकर वे इतने मुखर थे कि उन्होंने बार बार कहा ,”भारत के टुकड़े करने से पहले मेरे  शरीर के टुकड़े करने होंगे। यह उनका आत्मबल ही था कि वे कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी साहस नहीं खोते थे और अपने प्रयासों में जुटे रहते थे। जब देश विभाजन की आग में बुरी तरह से झुलस रहा था और गाँधी बंगाल में अहिंसा के चिथड़े होते हुए देख रहे थे,उस समय भी वे अपने अनुयायियों से बोले,”मैं यहाँ एक नई कार्य-प्रणाली की खोज में और उस सिद्धांत की सार्थकता परखने आया हूँ जिसके सहारे मैं अब तक जिंदा हूँ और जिसने मेरे जीवन को जीने योग्य बनाया है।”   

नौआखली में साम्प्रदायिक दंगों के दुःख से संतप्त वे प्रायश्चित स्वरूप सात सप्ताह तक 116 किलोमीटर पैदल चलकर 47 गांवों तक पहुंचे। हिन्दू मुस्लिम दंगों से जले हुए इन इलाकों में शांति स्थापित करने का गांधी का संकल्प नामुमकिन लगता था। लोग उन्हें घर से बाहर भगा देते थे,किवाड़ खोलकर गांधी को गलियां दी जाती थी। वे जिस रास्ते से गुजरते उस पर मैला फेंक दिया जाता था। लेकिन गांधी को लगता था कि इस क्षेत्र में उन्हें शांति की स्थापना में यदि कामयाबी मिली,तो यह पूरे देश की हिन्दू मुस्लिम एकता को मजबूत करेगा। गाँधी एक पोटली बांधकर चलते थे जिसमें भगवदगीता,कुरान, ईसा मसीह का जीवन और यहूदी विचारों पर आधारित पुस्तक रखी होती थी।

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जब देश आज़ादी का जश्न मना रहा था तब गांधी बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहे थे और वे इसमें सफल भी हुए। 15 अगस्त 1947 पर तिरंगा झंडा कई धर्मावलम्बियों ने कोलकाता में मिलकर फहराया और मिठाईयां बांटी। धर्म के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण और उस समय एक दूसरे के प्रति धार्मिक कटुता की पराकाष्ठा की बीच यह अकल्पनीय था,जिसे  संभव करने का माद्दा सिर्फ मोहनदास करमचंद गांधी में ही था। 

गाँधी आज़ादी के दिन भी चरखा चला रहे थे,जनता उनका आशीर्वाद लेना चाहती थी,लेकिन गांधी के लिए विभाजन के कारण यह शोक का दिन था। इस दिन उन्होंने जनता को संदेश तो दिया लेकिन यह नेताओं के लिए था। उन्होंने कहा,”सत्ता से बचो। सत्ता भ्रष्टाचार फैलाती है। उसकी तड़क भड़क के भ्रम में मत आओ। स्मरण रखो कि यह पद तुम्हें भारत के गांवों के गरीबों की सेवा करने के लिए मिला है।“

दरअसल गांधी की आज़ादी में मानवता के वे महान मूल्य निहित है जो धर्म,जाति,संप्रदाय और प्राणी का बिना भेद किए सबके कल्याण पर आधारित है। गांधी के आंदोलन इन्ही महान आदर्शों और मूल्यों पर आधारित थे। वे शोषणयुक्त समाज को किसी राजनीतिक सत्ता से खत्म करने में विश्वास नहीं करते थे,इसके लिए वे स्वावलंबी समाज और विकेंद्रीकृत व्यवस्था चाहते थे जिससे अहिंसक वातावरण तैयार हो सके।

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गांधी अस्पृश्यता मुक्त चाहते है लेकिन इसके लिए वे समाज को ही संकल्पित करके उनकी भूल सुधारने का संदेश देते है।  गांधी असहमति को बुरा नहीं समझते,उनके लिए लोकतंत्र की मजबूती असहमति की शक्ति से बढ़ती है। उनके लिए अपना धर्म विश्वास,आस्था और गरिमा का विषय है लेकिन दूसरे धर्मों के प्रति घृणा या दुर्भावना की आज़ादी वे नहीं देते। अपने राष्ट्र से उन्हें प्यार है,वे राष्ट्रवादी कहलाना पसंद भी करते है लेकिन इसमें सर्वधर्म समभाव है जो अंतराष्ट्रीयता को जोड़ता और उसका सम्मान करता है। गांधी स्वदेशी वस्तुओं का सम्मान करते है क्योंकि यह शांति और सुखमय समाज का मार्ग प्रशस्त करती है। वे अहिंसा को इसलिए श्रेष्ठ बताते है क्योंकि मानवता की रक्षा और प्रगति का यह प्रमुख अस्त्र है।

गांधी का आज़ाद भारत सभी का भारत है,जहाँ सामाजिक,आर्थिक या धार्मिक आधार पर कोई भेद नहीं किया जा सकता। यह सभी को पर्याप्त विकास और आगे बढ़ने का अवसर देता है। यह विचारों और आस्थाओं का सम्मान करता है। यह पुरुष और नारी के भेद को मिटाकर पारस्परिक सहयोग की भावना को मजबूत करता है। यह साझा संस्कृति का सम्मान सिखाता है। यह सत्ता  को विकेन्द्रीकृत कर सर्वोच्च शक्ति आम जनता के हाथों में सौपना चाहता है जिससे सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो और समाज के सभी वर्गों का सर्वांगीण विकास हो सके। यह साम्यवादी या पूंजीवादी आक्रामक विचारों को स्वीकार नहीं करता बल्कि ट्रस्टीशीप जैसे उदार सिद्दांतों के बूते समाज में समन्वय और सहभागिता बढ़ाना चाहता है। यह असमानता,अमानवीयता,असहिष्णुता,अत्याचार,आतंकवाद की अनीति को स्वीकार नहीं करता। जब भी दुनिया के किसी भी कोने में अन्याय या शोषण हो तो उसके विरोध में आवाज सबसे पहले यहीं से उठे, गांधी की आज़ादी के मूल्य मानवीयता के ऐसे महान सरोकारों को छूते है।

                                                       [गांधी है तो भारत है,पुस्तक के अंश]