Economic Crisis: आर्थिक संकट से निपटने की जगह बही-खातों के खेल में उलझी सरकार

Economic Mismanagement: 8 सरकारी कंपनियों को शेयर बायबैक के लिए कहेगी सरकार, एक जेब से पैसे निकालकर दूसरी जेब में डालने से कैसे सुधरेगी इकॉनमी की हालत

Updated: Oct 19, 2020, 06:06 PM IST

Economic Crisis: आर्थिक संकट से निपटने की जगह बही-खातों के खेल में उलझी सरकार
Photo Courtesy: Firstpost

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आठ सरकारी कंपनियों को अपने शेयर 'बायबैक' करने यानी सरकार से अपनी हिस्सेदारी वापस खरीदने को कहा है। इनमें कोल इंडिया, एनटीपीसी, एनडीएमसी और ईआईएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। मीडिया संस्थान लाइव मिंट ने अपने सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है। 

बताया जा रहा है कि सरकार इस प्रक्रिया से राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना चाहती है। एक सूत्र ने लाइव मिंट को बताया कि यह रणनीति इन कंपनियों की मार्केट प्राइस को मजूबत बनाने में भी कारगर हो सकती है। हालांकि, सरकार एक तरह से अपनी हिस्सेदारी उन कंपनियों को ही वापस बेचने जा रही है, जो पहले से ही सरकार की हैं। इसलिए गहराते आर्थिक संकट के दौर में यह सारी कोशिश सिर्फ बही-खाते को बेहतर दिखाने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं लग रही। ऐसे कठिन समय में इस तरह के निरर्थक कदम आर्थिक बदइंतजामी को और गहरा कर सकते हैं।

इससे पहले भी केंद्र की मोदी सरकार एक सरकारी कंपनी के शेयर दूसरी सरकारी कंपनी को बेचने जैसे कारनामे कर चुकी है। कैग इसके ऊपर एतराज भी जाहिर कर चुका है। कैग ने पिछले मानसून सत्र में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सरकार जब अपनी ही एक कंपनी के शेयर दूसरी कंपनी में बेचती है तो इससे कोई फायदा नहीं होता। यह कदम भी कुछ ऐसा ही है। 

दूसरी तरफ चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रखा है। राजस्व संग्रह में आई भारी कमी से सरकार इस लक्ष्य के आसपास भी जाती नजर नहीं आ रही है। ऐसे में अब उसने अपनी ही हिस्सेदारी अपनी ही कंपनियों में बेचने का नया शिगूफा छेड़ा है। 

इस साल फरवरी में सरकार ने कम हिस्सेदारी वाली सरकारी कंपनियों में विनिवेश कर 27 अरब डॉलर जमा करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन अब जिन कंपनियों से सरकार ने अपने ही शेयर खरीदने के लिए कहा है उनमें सरकार बड़ी हकदार है। ऐसे में कई कंपनियां तो शेयर वापस भी नहीं खरीद पाएंगी। क्योंकि ऐसा करने पर सरकार इन कंपनियों में बड़ी हकदार नहीं रहेगी। इन कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत है। हालांकि, ऐसा करने के लिए सरकार कैबिनेट की मंजूरी लेकर अपना मालिकाना हक छोड़ सकती है। 

वहीं केंद्र सरकार ने 23 सरकारी कंपनियों को चालू वित्त वर्ष में 1.65 खरब रुपये का पूंजीगत खर्च करने का लक्ष्य दिया है। सरकार का कहना है कि या तो ये कंपनियां अपना लक्ष्य हासिल करें या फिर शेयरधारकों को लाभान्वित करें। दूसरी तरफ कंपनियां कोरोना वायरस खतरे के बीच खर्च संबंधी परेशानी से जूझ रही हैं।