मंडियों में नए सोयाबीन की आवक शुरू, लागत मूल्य निकालने की जद्दोजहद, फीकी हुई पीले सोने की चमक

मालवा का पीला सोना कहे जाने वाले सोयाबीन की फसल के दाम मंडियों में काफी कम हैं। इससे किसानों में काफी निराशा देखने को मिल रही है। इस बार मुनाफा तो दूर किसान लागत मूल्य निकालने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

Updated: Sep 28, 2022, 10:48 AM IST

मंडियों में नए सोयाबीन की आवक शुरू, लागत मूल्य निकालने की जद्दोजहद, फीकी हुई पीले सोने की चमक

नीमच। मध्य प्रदेश के मंडियों में नए सोयाबीन की आवक शुरू हो गई है। उत्पादन में गिरावट के बाद सोयाबीन किसानों को दोहरा झटका लगा है। दरअसल, मालवा का पीला सोना कहे जाने वाले सोयाबीन के दाम जमीन पर आ गए हैं। मुनाफा तो दूर किसान लागत मूल्य निकालने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

नीमच जिले के मनासा से एक किसान की परेशानी का वीडियो भी सामने आया है। इसमें किसान मंडी के बाहर अपना दुख जाहिर करते हुए कहता है कि इतना कम रेट में बेचने से बेहतर है कि पानी में बहा दें। किसान कहता है कि 3,100 रुपए रेट मिल रहा है। इससे तो लागत निकलना भी मुश्किल है। बीज, खाद, डीजल सब महंगा, लेकिन उपज सस्ता? ये कहां का न्याय है।

दरअसल, मध्य प्रदेश का मालवा-निमाड़ क्षेत्र सोयाबीन के लिए जाना जाता है। सोयाबीन की खेती करने वाले किसान भी समृद्ध रहे हैं। लेकिन पिछले साल से ही सोयाबीन किसानों के किस्मत में ग्रहण लगी हुई है। सोयाबीन की फसल जून और जुलाई के महीने में बोई जाती है, जबकि इसकी कटाई दीपावली के पहले हो जाती है। किसानों को सबसे ज्यादा उम्मीद सोयाबीन की फसल पर रहती है। लेकिन अब ये उम्मीद भी टूटता दिख रहा है।

 इस बार मौसम की मार और तमाम वायरस की वजह से सोयाबीन की पैदावार में काफी कमी आई है। इसके बाद किसानों को सोयाबीन के दाम की दोहरी मार उठानी पड़ रही है। मंडियों में 7 हजार रुपए क्विंटल बिकने वाला सोयाबीन आज बमुश्किल आधे कीमत यानी 3500 रुपए में बिक रहा है। मंदसौर के किसान दिलीप पाटीदार ने बताया कि एक एकड़ जमीन में करीब 15 हजार रुपए लागत आती है।

पाटीदार बताते हैं कि इस बार बमुश्किल एक एकड़ में औसतन साढ़े तीन से चार क्विंटल सोयाबीन ही हुआ है। इस तरह उन्हें एक एकड़ के उपज का भाव 12 हजार रुपए तक ही मिल रहा है जबकि लागत 15 हजार है। यानी फायदा दो दूर सोयाबीन घाटे का सौदा बन गया है। नीमच, मंदसौर, खंडवा, भोपाल समेत अन्य जिलों की मंडियों का भी यही हाल है।

कृषि विशेषज्ञ केदार सिरोही ने सोयाबीन उत्पादक किसानों कि दुर्दशा के लिए सरकार को जिम्मेदार बताया है। सिरोही के मुताबिक मौसम की मार अपनी जगह है, किसानों को सबसे ज्यादा कॉर्पोरेट और सरकार के गठजोड़ की मार पड़ी है। उन्होंने कहा कि, 'प्रदेश में बड़े स्तर पर सोयाबीन के बीज की गुणवत्ता के साथ समझौते हुए। कीटनाशक दवाओं के नाम पर किसानों को लूटा गया। कॉरपोरेट लॉबी ने अपने फायदे के लिए सोयाबीन की उपज कम कराई है। एक तो प्रोडक्शन कम है, ऊपर से मंडियों में व्यापारी रेट नहीं चढ़ने दे रहे हैं। किसानों की मजबूरी का हर जगह गलत फायदा उठाया जा रहा है।'