सांसों की कमी से हुई मौत, अब उनकी अस्थियां देंगी लोगों को सांसें, मृतकों के भस्म से बनेगा कोविड स्मृति वन

भोपाल स्थित भदभदा विश्राम घाट पर कोरोना मृतकों के भस्म का अंबार, 21 डंपर राख से लगाए जाएंगे 12 हजार स्क्वायर फीट जमीन में पौधे, हरे-भरे पेड़ होंगे मानवता पर आए सबसे बड़ी आपदा के गवाह

Updated: Jul 05, 2021, 05:05 PM IST

सांसों की कमी से हुई मौत, अब उनकी अस्थियां देंगी लोगों को सांसें, मृतकों के भस्म से बनेगा कोविड स्मृति वन

भोपाल। कोरोना की दूसरी लहर से देश भले ही उबर गया हो लेकिन इस दौरान चारों तरफ़ जो मौत का मंजर देखने को मिला और जिन्होंने अपनों को खोया उसे भूलने में दशकों लग जाएंगें। महामारी से जिनकी मौतें हुईं वे तो अब कभी लौट के नहीं आने वाले, लेकिन जो जीवित हैं, उन्हें ताउम्र याद रहेगा कि किस तरह वे अपनों को बचाने के लिए जूझ रहे थे, रुकती सांसों को थामने के लिए दौड़-भाग कर रहे थे और एक-एक कर सांसें रुकती जा रहीं थीं। मौत के बाद जब श्मशानों में जगह नहीं थी, लंबी लाइनें लग रहीं थीं, इन खौंफनाक अनुभवों को सकारात्मक समापन देने का प्रयास भोपाल स्थित भदभदा विश्राम घाट समिति कर रही है।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित भदभदा घाट, कोरोना महामारी के लहर के उतार-चढ़ाव का साक्षी रहा है। कोरोना की दूसरी लहर के 100 दिनों में यहां करीब 7 हजार कोरोना मृतकों के अंतिम संस्कार हुए हैं। अब स्थिति ये है कि यहां 21 डंपर कोरोना मृतकों के भस्म जमा हो गए। विश्राम घाट समिति इन भस्मों को संजोए रखने के लिए कोविड स्मृति वन बनाने जा रही है, जिसमें पौधों के लिए भस्मों को खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा। 

कोविड स्मृति वन निर्माण करने के पीछे उद्देश्य ये है कि वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान काल कलवित हुए मृतकों की यादों को चिरस्थाई रखी जा सके। विश्राम घाट समिति के अध्यक्ष अरुण चौधरी ने बताया कि कोविड काल में दिवंगत आत्माओं की यादों को सहेजने के लिए इस स्मृति वन को विकसित कर रहे हैं। जिन्होंने ने अपने प्रियजनों को खोया है वे आकर यहां पौधरोपण करेंगे और प्रबंधन द्वारा पेड़ लगने तक सेवा की जाएगी। 

समिति के सचिव मम्तेश शर्मा उस दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं। शर्मा कहते हैं कि हर दिन सैंकड़ों घरों को उजड़ते देखना बेहद डरावना था। हम काल के आगे मजबूर थे। यहां हर रोज करीब 100 से 125 शव आते थे। लोगों का विलाप सुनकर भयंकर पीड़ा होती थी। हर दिन हमने कई स्त्रियों को विधवा होते, कई बच्चों को अनाथ होते देखा। इस दौरान परिस्थितियां ऐसी थीं कि लोग अपनों के राख-अस्थियां भी नहीं ले जा सकते थे। 

शर्मा के मुताबिक अमूमन लोग अस्थियों को कलश में और राख को बोरियों में भरकर नदी में प्रवाहित करने के लिए ले जाते थे। कोरोना काल में लोग अस्थियों के सिवाए कुछ नहीं ले गए और यहां 21 ट्रक राख बच गए। विश्राम घाट समिति में पहले तय किया था कि बचे हुए राख को मां नर्मदा को सुपुर्द कर दिया जाएगा। लेकिन हमने सोचा एकसाथ इतने राख प्रवाहित करने से मां नर्मदा प्रदूषित होंगी और इसी उधेड़बुन में सहसा ख्याल आया कि क्यों न इसका उपयोग पौधरोपण में किया जाए।

समिति के सदस्यों ने एक्सपर्ट्स से बात की उसके बाद जापान के 'मियावकी तकनीक' से वन विकसित करने का फैसला हुआ। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से विश्राम घाट में ही 12,000 की स्क्वायर फीट की जमीन पर करीब 4 हजार वृक्ष लगाए जाएंगे।जमीन की मिट्टी के साथ इस भस्म, गाय के गोबर एवं लकड़ी के बुरादे को मिलाया गया है। 

इस स्मृति वन को विकसित करने में करीब 10 लाख रुपए के खर्च आने के अनुमान हैं। समिति के कोषाध्यक्ष अजय दुबे ने बताया कि प्रदेश सरकार या नगर निगम ने इसके लिए पांच पैसे भी नहीं दिए हैं। उन्होंने कहा, 'आम लोग इस नेक काम के लिए आगे आए हैं और वे यथासंभव सहयोग कर रहे हैं। कुछ मृतक के परिजन भी इस कार्य के लिए सहयोग कर रहे हैं। उम्मीद है कि अगले 15 से 18 महीनों में यहां हरे-भरे छायादार वृक्ष होंगे और जिन लोगों के सर से कोरोना काल में बड़ों साया उठा है उन्हें इन वृक्षों की छांव में कुछ सुकून मिलेगा।