कृषि विधेयक राज्य सभा में ध्वनिमत से पास, विपक्ष का हंगामा

Parliament Monsoon Session 2020: तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने रूल बुक फाड़ी, उपसभापति हरिवंश का माइक तोड़ने की कोशिश, मार्शलों को बुलाना पड़ा

Updated: Sep 20, 2020 11:14 PM IST

कृषि विधेयक राज्य सभा में ध्वनिमत से पास, विपक्ष का हंगामा

नई दिल्ली। सरकार के पुराने सहयोगी दलों की नाराजगी और किसानों के साथ विपक्ष की लामबंदी के बीच रविवार को विवादित कृषि विधेयक राज्यसभा में भी पास कर दिए गए। इसके विरोध में विपक्ष ने जम कर हंगामा किया। विधेेेयकों के पारित होने के बाद राज्यसभा की कार्यवाही 21 सितंबर सुबह 9 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। 

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने रविवार को खेती से जुड़े दो बिल फार्मर्स एंड प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) बिल और फार्मर्स (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विस बिल राज्यसभा में पेश किए। चर्चा के बाद वोटिंग के दौरान सदन में जमकर हंगामा हुआ। विपक्ष के सांसदों ने वेल में जाकर नारेबाजी की। तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सदन की रूल बुक फाड़ दी। उन्होंने उपसभापति हरिवंश का माइक तोड़ने की कोशिश की। सदन की कार्यवाही जारी रखने के लिए मार्शलों को बुलाना पड़ा। 10 मिनट तक सदन की कार्यवाही स्थगित करने के बाद फिर से वोटिंग प्रक्रिया शुरू हुई और हंगामे के बीच ही दोनों बिल सरकार ने पारित करवा लिए।

इससे पहले कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि ये दोनों बिल ऐतिहासिक हैं और किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले हैं। इस बिल के माध्यम से किसान अपनी फसल किसी भी जगह पर मनचाही कीमत पर बेचने के लिए आजाद होंगे। इन विधेयकों से किसानों को महंगी फसलें उगाने का अवसर मिलेगा।यह विधेयक इस बात का भी प्रावधान करते हैं कि बुआई के समय हुए करार में ही कीमत का आश्वासन भी मिल जाए।  किसान का संरक्षण हो सके और किसान की भूमि के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न हो इसका प्रावधान भी इन विधेयकों में किया गया है।इससे किसानों को मिलने वाली एमएसपी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने विधेयकों को ऐतिहासिक बताते हुए विपक्षी पार्टियों से अपना बदलने की अपील की। 

कांग्रेस इन बिलों को पूरी तरह रिजेक्ट करती है: बाजवा 

कृषि विधयकों को राज्य सभा में पेश किए जाने से पहले सीपीएम के सांसद केके रागेश ने कहा कि ये विधेयक किसानों को लूटने के लिए पूंजीपतियों को पूरी आजादी देते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने किसानों को पूरी तरह से पूंजीपतियों की दया पर छोड़ दिया है। 

दूसरी तरफ कांग्रेस के सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने विधयकों को गलत तरीके से और गलत समय पर लाया हुआ बताया। उन्होंने कहा कि हम किसानों के मृत्यु दंड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। बाजवा ने कहा कि कृषि बाजार पूरी तरह से राज्य सरकार का विषय है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब पूरा देश महामारी से लड़ रहा है और सीमा पर हलचल है, तब ये विधेयक लाने की क्या जरूरत थी। बाजवा ने कहा कि केंद्र सरकार ने इन विधेयकों पर हितधारकों से बात नहीं की है। अगर ये विधेयक इतने ही अच्छे हैं तो शुरुआत पहले गुजरात से होनी चाहिए।

कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए राजस्थान से बीजेपी सांसद भूपेंद्र  यादव ने कहा कि 2010 में मनमोहन सिंह की सरकार ने इन विधेयकों पर रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि एपीएमसी और एकाधिकार कॉर्पोरेट लाइसेंस को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि जब इस तरह की रिपोर्ट जारी हो चुकी है तो आज कांग्रेस राजनीति क्यों कर रही है।

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तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि विपक्ष किसानों को गुमराह कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने 2020 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था लेकिन इस रफ्तार से तो यह काम 2028 तक हो पाएगा। उन्होंने सवाल किया कि इन विधेयकों पर बहस करने के लिए बीजेपी कितनी योग्य है?

डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि इन विधेयकों के सहारे केंद्र सरकार, राज्य सरकारों का अधिकार छीनना चाहती है। हम एकलौते देश हैं जहां विधेयकों के पारित होने से पहले चर्चा नहीं होती। उन्होंने कहा कि विधेयकों में तो ग्राहकों के लिए भी कोई सुरक्षा नहीं है।

समाजवादी पार्टी के सांसद राम गोपाल यादव ने भी कहा कि ऐसा लगता है कि बीजेपी इन विधेयकों पर कोई बहस नहीं चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन विधेयकों पर किसान संगठनों से कोई बात नहीं की। यादव ने कहा कि जैसे जियो बीएसएनएल को लील गया वैैसे ही ये विधेयक किसानों को लील जाएंगे। उन्होंने पूछा कि किसान किस तरह से बड़ी कंपनियों का मुकाबला करेंगे।

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वहीं डीएमके के सांसद टीकेएस एलांगोवन ने कहा कि किसान देश की जीडीपी में 20 प्रतिशत का योगदान देते हैं। इन विधेयकों के पारित हो जाने पर वे गुलाम बन जाएंगे, महज एक वस्तु बनकर रह जाएंगे।

दूसरी तरफ वाईएसआरसीपी ने इन विधेयकों का समर्थन किया और कांग्रेस पार्टी पर बिचौलियों की पार्टी होने का आरोप लगाया। पार्टी के सांसद वी विजय रेड्डी ने कांग्रेस के ऊपर अपमानजनक टिप्पणी भी की, जिससे राज्य सभा में हंगामा हो गया।

राजद के सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि सरकार को यह निर्णय लेना होगा कि वो किसानों के दिल में रहना चाहती है या नहीं। उन्हींने कहा कि परिस्थितियां वैसी नहीं बनानी चाहिएं जैसी ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में थीं। झा ने कहा कि इन विधेयकों के बाद किसानों की आय बचेगी ही नहीं, वो दोगुनी कैसे होगी।

बीजेपी के सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल ने भी विपक्षी पार्टियों की हां में हां मिलाई और कहा कि विधेयकों को पहले चयन समिति के पास भेजा जाना चाहिए ताकि सभी हितधारकों के विचार जाने जा सकें। उन्होंने कहा कि पंजाब के किसान कमजोर नहीं है।

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विपक्षी दल और किसान क्यों कर रहे हैं विरोध

दूसरी तरफ इस पूरी बहस के दौरान पंजाब और हरियाणा में किसान प्रदर्शन करते रहे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार किसानों ने हरियाणा और पंजाब में कई राजमार्गों और सड़कों को ब्लॉक कर दिया। इन विधेयकों के विरोध की एक प्रमुख वजह यह बताई जा रही है कि इससे पूंजीपतियों को लूट की खुली छूट मिल जाएगी। किसानों का कहना है कि फसलों के जिस एमएसपी की गारंटी उन्हें सरकार से मिलती है, विधेयक पारित होने के बाद यह गारंटी खत्म हो जाएगी। बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस से जुड़ा किसान संगठन भी इसका विरोध कर चुका है। करीब 50 हजार से अधिक किसान प्रधामनंत्री को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध जता चुके हैं।

किसानों को डर है कि देशभर में 80 प्रतिशत किसान छोटे और मध्यम वर्ग के हैं। ऐसे में खुले बाजार में और बिना किसी संरक्षण के बाजार की बड़ी मछलियां उन्हें खा जाएंगी। इन विधेयकों के पारित हो जाने के बाद मंडियां भी खत्म हो जाएंगी। पैन कार्ड लिए हुए कोई भी व्यक्ति व्यापारी बनकर सीधा किसान से सौदा करने लगेगा।

विपक्षी पार्टियों का कहना है कि एमएसपी के समाप्त हो जाने पर खाद्य सुरक्षा को नुकसान पहुंचेगा, जो देश के वंचित तबके के हित में नहीं होगा। साथ ही साथ उनका यह भी कहना है कि ये विधेयक कृषि से संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार छीन लेंगे, जो मूल रूप से भारतीय संघवाद की भावना के खिलाफ होगा।

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