दफ्तर दरबारी: एमपी के आईएएस क्‍यों मांग रहे आईपीएस जैसी किस्‍मत

प्रशासनिक क्षेत्र में आईएएस और जरा से नंबरों से चूक कर आईएपीएस बनने वाले अफसरों की आपसी टसल और वर्चस्‍व की प्रतिस्‍पर्धा के किस्‍से आम हैं। एमपी में इसबार उल्‍टा हो रहा है। यहां आईएएस अफसर आईपीएस जैसी किस्‍मत मांग रहे हैं। इस चाह के पीछे भी एक दिलचस्‍प वजह है। 

Updated: Jun 19, 2022, 12:03 PM IST

दफ्तर दरबारी: एमपी के आईएएस क्‍यों मांग रहे आईपीएस जैसी किस्‍मत
IAS Harshal Pancholi

मध्‍य प्रदेश में प्रशासनिक सख्‍ती के चलते आदिवासी मॉब लिंचिंग के बाद युवा आईपीएस को मैदानी पोस्टिंग से हटा कर पुलिस मुख्‍यालय में पदस्‍थ कर दिया गया था। मगर कुछ ही दिनों साहब को पहले की तुलना में बड़े जिले की कमान मिल गई। ऐसा ही एक अन्‍य आईपीएस के साथ भी हुआ जिन्‍हें मुख्‍यमंत्री की नाराजगी के बाद हटाया गया था मगर वे भी अच्‍छी पोस्टिंग पा गए। 

प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी हैं जो आईपीएस अफसरों की इस किस्‍मत से रश्‍क कर रहे हैं। 2015 बैच के ये युवा आईएएस हर्षल पंचौली अनूपपुर में जिला पंचायत के सीईओ थे। यहां साहब की कलेक्‍टर से पटी नहीं। अनूपपुर की महिला कलेक्‍टर 2013 की आईएएस अधिकारी तत्‍कालीन सीईओ हर्षल पंचौली से दो साल सीनियर हैं। प्रभारी मंत्री के साथ हुए विवाद में सीईओ हर्षल पंचौली आरोपों से तिलमिला गए और बैठक छोड़ कर चले गए थे। प्रभारी मंत्री मीना सिंह की शिकायत के बाद हर्षल पंचौली को हटा कर भोपाल बुला लिया गया। 

आईएएस हर्षल पंचौली मानते हैं कि मंत्री द्वारा की गई शिकायत तो ठीक उनके तबादले की मुख्‍य वजह कलेक्‍टर के साथ जारी विवाद ही है। वे मायूस हैं कि आईपीएस बिरादरी ने साथ दिया तो हटाए गए आईपीएस तो जल्‍द ही नई मैदानी पोस्टिंग पा गए मगर आईएएस लॉबी तो अपने इन युवा आईएएस के विवाद से दूर रही। आईएएस हर्षल पंचौली की कसक यह है कि सीनियर अफसरों का साथ मिलता तो उन्‍हें भी कुछ समय और मैदान में रहने को मिलता। 

खबर है कि अपनों से निराश आईएएस हर्षल पंचौली अब राजनीतिक संपर्कों में अपनी पोस्टिंग की सीढि़यां तलाश रहे हैं। 

एमपी के आईएफएस अफसरों को लगा ये कैसा रोग

प्रशासनिक हलकों में यह कहन चर्चित है कि जंगल और जेल का अपना अलग कानून है। मतलब, इन विभागों में दूसरे विभागों से अलग अपने नियम कायदों से काम होता है। एमपी के जंगल विभाग यानि फारेस्‍ट विभाग के अफसरों में एक ऐसा ‘रोग’ लग गया है जिसकी सब तरफ चर्चा है। 

तबादला होने के बाद अफसर या तो तुरंत नई जगह जॉइन करते हैं या कुछ दिनों का अवकाश लेकर नई पोस्टिंग पर आमद देते हैं। मगर एमपी के वन विभाग का तो कुछ अलग हाल है। यहां के एक आईएफएस अधिकारी एम. कालीदुर्रई पौने दो साल तक गायब रहे। इस दौरान विभाग उन्‍हें ढूंढता रहा फिर अचानक वे ड्यूटी पर लौट आए। मुख्य वनसंरक्षक एम.कालीदुर्रई सितंबर 2020 में गायब हो गए थे। उन पर आर्थिक गड़बडि़यों के आरोप थे। वे फरवरी 2022 में लौटे हैं। उनके विरूद्ध जांच चल रही है।

अब वन विभाग आईएफएस वीएस होतगी को खोज रहा है। 1994 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के आईएफएस वीएस होतगी गायब हैं। वन विभाग उन्‍हें पिछले 10 महीनों से ढूंढ रहा है। भिंड में पदस्‍थ आईएफएस वीएस होतगी का अगस्त 2021 में तबादला कर वन मुख्यालय भोपाल में पदस्थ किया गया था। तब से विभाग इंतजार कर रहा है कि वे आ कर नई जगह आमद देंगे। 

दस माह से विभाग तीन बार नोटिस दे चुका है मगर अब तक कोई जवाब नहीं आया है। नियमानुसार अब डिपार्टमेंटल एक्‍शन लिया जाएगा। विभाग में आईएफएस वीएस होतगी के साथ किसी अनहोनी को लेकर भी चर्चा है ले‍किन सब उनके पूर्व व्‍यवहार को लेकर निश्चिंत हैं। पड़ताल में पता चला है कि आईएफएस वीएस होतगी इससे पहले भी ड्यूटी से दो बार गायब हो चुके हैं। तब वे दो साल तक गायब रहे थे। एक बार तो विभाग को उनके गुम होने का विज्ञापन प्रकाशित करवाना पड़ा।

अपनी कार्यशैली के कारण हमेशा विवादों में रहे होतगी ने वन मुख्यालय में रहते हुए होतगी ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के साथ मारपीट की थी। इसके बाद उन्हें जबलपुर भेजा गया था। होतगी के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आने पर 2016 में उन्‍हें अनिवार्य रूप से रिटायर करने की तैयारी कर ली गई थी मगर यह राज ही है कि यह फाइल सीएम ऑफिस में पहुंच कर भी कैसे अटक गई। 

बताया जाता है कि आईएफएस वीएस होतगी की पत्‍नी भिंड के सरकारी अस्‍पताल में पदस्‍थ है। वे 2025 में रिटायर्ड होने वाले हैं। रिटायरमेंट के ठीक पहले इस तरह गायब होने की विभाग में बड़ी चर्चा है। 

आईएएस के पीए सफाई दरोगा का बटोरो अभियान 

यूं तो वह दरोगा है। तृतीय श्रेणी के कर्मचारी का काम शहर की सफाई व्‍यवस्‍था को संभालना है मगर वह ऊंचे पद की जिम्‍मेदारी निभा रहे हैं। सफाई दरोगा लंबे समय से महत्‍वपूर्ण पदों पर क्‍यों पदस्‍थ है और क्‍यों इंदौर नगर निगम की अतिरिक्‍त आयुक्‍त आईएएस अधिकारी का पीए बना हुआ है, यह कई लोगों के लिए जिज्ञासा का सबब बना हुआ था। 

मगर पिछले दिनों  मध्य प्रदेश पुलिस के आर्थिक अपराध अनुसंधान प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने छापा मारा तो इस राज से पर्दे हटने लगे हैं। भ्रष्टाचार की शिकायत पर मारे गए छापों में आईएएस अधिकारी के निजी सहायक की 2.25 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्तियों का खुलासा हुआ है। 

अपर आयुक्‍त के पीए मुकेश कुमार पांडे नगर निगम के दरोगा हैं। छापों में पांडे और उसकी पत्नी के नाम से शहर में दो मंजिलों वाला एक मकान, एक स्कूल और चार भूखंडों का पता चला है। छापों में पांडे की कुल 2.25 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्तियां मिली हैं, जबकि 26 साल की नौकरी के दौरान वेतन-भत्तों से कुल आय 55 लाख रुपए होनी थी। 

आरोप है कि वैध आय से चार गुना से ज्‍यादा की सम्‍पत्ति अवैध कमाई से बनाई गई है। चर्चा है कि बटोरने का यह हुनर ही दरोगा जैसे अदने कर्मचारी को आईएएस सहित अन्‍य अफसरों की आंख का तारा बनाए हुए था। नगरीय निकायों में भर्ती की कमी और ऐसे ही हुनर के कारण कई छोटे कर्मचारी बड़े पदों को सुशोभित कर रहे हैं। उनका यह हुनर उनकी नहीं, उनके आला अधिकारियों की शान भी बढ़ा रहा है। विभाग के अन्‍य कर्मचारी कहते हैं, यह तो एक उदाहरण है, सही कार्रवाई हो जाए तो ऐसी कई म‍छलियों मिलेंगी। 
  
कमिशनर की इस किताब में किस एसडीएम के किस्‍से 

मुख्‍यमंत्री सचिवालय में पदस्‍थ रिटायर्ड आईएएस आनंद कुमार शर्मा अपने नियमित कॉलम में प्रशासनिक अनुभवों को लिखते हैं। लंबे कॅरियर में अफसरों के साथ जुड़े ये किस्‍से पाठकों को प्रशासनिक सेवा के कई जाने अनजाने पहलुओं से रूबरू करवाते हैं। ऐसे ही एक अफसर है राजीव शर्मा। सीनियर आईएएस राजीव शर्मा इनदिनों शहडोल संभाग के कमिशनर हैं। उनका किताब प्रेम भी जगजाहिर हैं।

राजीव शर्मा के अब तक तीन कविता संग्रह, एक इतिहास पुस्तक के साथ दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। शंकराचार्य और भगवान परशुराम के के जीवन पर केंद्रित उनके उपन्यास अद्भुत सन्यासी और विद्रोही संन्यासी काफी चर्चित  हो चुके हैं। भगवान परशुराम के जीवन पर आधारित उपन्यास अद्भुत संन्यासी का मराठी अनुवाद हो चुका है। यह बांग्ला, कन्‍नड़ और अंग्रेजी में अनुदित हो कर प्रकाशित होने वाला है। 

राजीव शर्मा इनदिनों अपनी नई पुस्‍तक एसडीएम को लेकर चर्चा में है। जब इस किताब के आने की घोषणा हुई थी तब समझा गया था कि राजीव शर्मा अब तब पर्दे में रहे किस्‍सों को उजागर करेंगे। उनके जरिए एसडीएम जैसी मैदानी पोस्टिंग के जाने अनजाने अनुभव नुमाया होंगे। मगर यह ताजा किताब को नए नवेले एसडीएम बने युवा अफसरों के लिए गाइड की तरह काम करने वाली है।

आम पाठक इससे निराश न हो। घोषणा हो चुकी है कि जल्‍द ही एसडीएम की सिक्‍वल आएगी जिसमें वे मैदानी अनुभव होंगे जिनसे एक अफसर दो चार होता है। इन किस्‍सों में प्रशासनिक उलझनों का बयान भी होगा तो मुश्किल वक्‍त निकल आने की तरतीबों के किस्‍से भी। फिलहाल प्रशासनिक क्रियाकलापों और पेंचिदगियों के चटखारेदार किस्‍सों के लिए पाठकों को इंतजार करना होगा।