75वाँ स्वतंत्रता दिवस: जागते हुए चेहरों पर भी हो खुशी, संगीत और दोस्ती

14 अगस्त 1947 की आधी रात को ठीक 12 बजे पंडित नेहरु ने भारतीय संसद में एक ऐतिहासिक भाषण ‘‘ट्रिस्ट विद दि डेस्टनी’’ अर्थात, ‘‘नियति के साथ एक वायदा’’ दिया था। यह बीसवीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण व सारगर्भित भाषणों में से है। अभी हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, इसलिए उस भाषण का पुनरावलोकन कर लेना अनिवार्य हो जाता है।

Updated: Aug 14, 2022, 03:50 PM IST

75वाँ स्वतंत्रता दिवस: जागते हुए चेहरों पर भी हो खुशी, संगीत और दोस्ती

14 अगस्त 1947 की आधी रात को ठीक 12 बजे पंडित नेहरु ने भारतीय संसद में एक ऐतिहासिक भाषण ‘‘ट्रिस्ट विद दि डेस्टनी’’ अर्थात, ‘‘नियति के साथ एक वायदा’’ दिया था। यह बीसवीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण व सारगर्भित भाषणों में से है। अभी हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, इसलिए उस भाषण का पुनरावलोकन कर लेना अनिवार्य हो जाता है। वे इसमें कहते हैं, ‘‘वर्षों पहले हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था और अब वह समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह से न सही पर बहुत हद तक तो निभाएं।

आधी रात को जब दुनिया सो रही है भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में एक बार ही आता है। आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत फिर से खुद को खोज पाने के लिए आजाद है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक कदम है, नए अवसरों के खुलने का। इससे भी बड़ी जीत और उपलब्धियां हमारा इंतजार कर रहीं हैं। आज एकबार फिर वषों के संघर्ष के बाद भारत जाग रहा है और स्वतंत्र है।’’ यह भारत और दुनिया के महानतम राजनयिकों में शामिल ऐसे व्यक्ति के उद्गार हैं जिसकी निगाह एक ऐसे भारत को देख रही थी जिसमें मनुष्य मनुष्यता के चरम पर होगा। मानवीयता ही एकमात्र धर्म होगी। सोचने का नजरिया वैज्ञानिक होगा। पुरातनता और आधुनिकता के समागम से एक नई महान लोकतांत्रिक संस्कृति के विकसित होने के द्वार खुलेंगे। 

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उस व्यक्ति की आँखें फलित ज्योतिष के आधार पर कोष्टकों में लिखे, बुध, शनि, चंद्र, बृहस्पति या सूर्य पर नहीं टिकी थीं। वह वहां अपना आधार नहीं खोज रहीं थीं। वह तो वास्तव में वहीँ यानी उन ग्रहों पर साक्षात पहुंचने के साकार हो सकने वाले सपने देख रही थीं और उस आदमी में इस सपने को पूरा कर पाने की न केवल अदम्य लालसा थी बल्कि क्षमता भी थी। तभी तो भारत आज चंद्रमा और मंगल तक पहुंच पाया। और 75 वर्ष बाद अमृत महोत्सव वर्ष में प्रधानमंत्री पद पर बैठे हमें काला जादू के प्रभाव समझा रहे हैं। आजाद भारत में समय शायद पहली बार अपनी गति बदल रहा है।

उसी दिन, दिल्ली से करीब 1500 किलोमीटर दूर कलकत्ता (कोलकता) में मानवीय इतिहास की एक अन्य विशिष्टतम विभूति, महात्मा गांधी सक्रिय हैं। वे नोआखली के बाद कलकत्ता पहुंचे हैं और बंगाल और बिहार के सांप्रदायिक दंगों को कमोवेश अकेले ही ठंडा कर चुके हैं। वे एक पुराने टूटे से मकान में भविष्य के भारत का सपना अपनी तरह से देख रहे हैं। वे दरिद्रनारायण की पूर्ण आजादी के अलावा कुछ और सोचते ही नहीं हैं। वे सपना देखते हैं, लेकिन स्वप्नजीवी वे भी नहीं हैं। उनके बगीचे में अभी भी फूल नहीं, बल्कि अनाज की ही पैदावार की अनुमति है। उस दिन उनसे पूछा था कि आप स्वतंत्रता दिवस कैसे मनायेंगे? उस महान संत का जवाब था, ‘‘मैं यह दिन प्रार्थना करते, उपवास करके और चरखा चलाते बिताऊँगा। जब देश में सब ओर आग लगी हो, लोग भोजन और कपड़े की कमी से मर रहे हों मैं और कर भी क्या सकता हूँ ?’’ 

एकस्तर पर लोगों को नेहरु व गांधी के विचारों में विरोधाभास सा दिखेगा। परंतु वास्तव में ये एकदूसरे के पूरक हैं। गांधी जिस दरिद्रनारायण को भूख से व सांप्रदायिकता के कहर से बचाने के लिए अपनी तरह से आह्वान करते हैं, उसे पूरा करने के लिए नेहरु एक ऐेसे भारत के निर्माण का बीड़ा उठाते हैं, जिसमें इन सबके लिए कोई जगह ही न हो। भारत बहुत हद तक भूख और सांप्रदायिकता से मुक्ति पा भी लेता है । 
परंतु समय हमेशा एक सा नहीं रहता। आजादी के 75 वें वर्ष में भारत में सांप्रदायिकता भी बढ़ी है और भूख भी। यह क्यों और कैसे हुआ? यह चिंता और मनन दोनों का विषय है। 

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गौरतलब है फरवरी 2013 में हिंदी कवि चंद्रकांत देवताले ने कहा था, ‘‘यह बुलडोजर समय विस्थापित करने वाला।’’ महज 10 वषों में समय से आगे की स्थिति यानी ‘‘बुलडोजर काल’’ हमारे सामने उतर आया। वे लिखते हैं, ‘‘तहस नहस कर दी गई उसकी झोपड़ी / चिथड़ों, बरतन भांडो सहित / बेदखल कर दी गई जो विधवा / डरते-कांपते अधनंगे तीनों बच्चे खड़े/ तकते उसे जैसे वह कोई खौफनाक दृष्य।’’ इसी कविता (कोई नहीं उसके साथ) की अगली पंक्तियां भी रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई को बेनकाब कर देती हैं। वे कविता में इस दृष्य की कल्पना, नर्मदा पर बन रहे बांधो से हो रहे विस्थापन से पाते हैं। उनके सवाल लगातार तीखे होते जाते हैं और वे आगे कहते हैं, ‘‘फिर भी पुश्तैनी कब्जों को छोड़ / घास-पात को निशाना बनाता है / हत्यारों का अंधा बुलडोजर / बसाने के बदले उजाड़ने की इस क्रूरता को / रचते हुए कितना कुछ टूट रहा है भीतर ही भीतर / और आस पास की दुनिया में कोई फर्क नहीं पड़ रहा / कुछ नहीं हुआ जैसे चुप नदी नर्मदा / सुबह और पहाड़ चुप / वैसे ही मुँह बंद लोगों की परछाईयां।’’

आजादी के इस अमृतवर्ष में मशीनी बुलडोजर अब दिल्ली की जहांगीरपुर से बरास्ता खरगोन, उत्तरप्रदेश, गुजरात, गोवा, तमाम प्रदेशों में पहुंचते जा रहे हैं। भौतिक या मशीनी बुलडोजर से भी ज्यादा खतरनाक बुलडोजर सांप्रदायिकता का है और अब राजनीति उसकी ड्राईवर बन गई है। यह बुलडोजर कई बार कानून के जरिये आता है और अक्सर कानून को अगूंठा दिखाते हुए। नोएडा के श्रीकांत त्यागी जिन्होंने एक महिला के साथ गाली गलौच और धक्का-मुक्की की थी, के मकान पर भी बुलडोजर न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही चलना चाहिए था। याद रखिए इस तरह की एक गतिविधि से राजनीति बाकी किए ध्वंस के प्रति भी कार्योत्तर स्वीकृति प्राप्त कर लेती है और अगली जहांगीरपुरी खोजने निकल पड़ती है। इसी प्रक्रिया के चलते मूल मुद्दों पर से ध्यान हट जाता है कि श्रीकांत त्यागी पर पिछले 3 वषों से कार्यवाही क्यों नहीं हुई ? इस कार्यवाही पर वहां गूंजे जयकारों से हमारा मध्य व उच्च वर्ग प्रत्येक अनैतिकता को अंजाने ही वैधता प्रदान करवा देता है। 

‘‘हम भारत के लोग’’ वस्तुतः स्वतंत्र भारत की प्राथमिकताओं र प्रतिबद्धताओं को लेकर बेहद उदासीन हैं। सारी चिन्ता अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के ईर्दगिर्द सिमट गई है। भारत के स्वतंत्रता दिवस पर पंडित नेहरु के भाषण के पहले संसद सदस्यों ने यह शपथ ली थी, ‘‘अब जबकि हिन्दवासियों ने त्याग और तप से स्वतंत्रता हासिल कर ली है मैं .................. जो इस विधान परिषद का एक सदस्य हूँ अपने को बड़ी विनम्रता से हिन्द और हिन्दवासियों की सेवा के लिए अर्पण करता हूँ और यह प्राचीन देश संसार में अपना उचित और गौरवपूर्ण जगह पा लेवे और संसार में शांति स्थापना करने और मानव जाति कल्याण में अपनी पूरी शक्ति लगाकर ख़ुशी-ख़ुशी हाथ बंटा सकें।’’ 

इस शपथ को पुनः याद करने की आवश्यकता इसलिए भी पड़ी क्योंकि ‘‘हम भारत के लोग’’ इसे भुला चुके हैं। इसका नवीनतम प्रमाण है भारत का ‘‘नाटो’’ (नार्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन, उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) जो कि एक सैन्य राजनीतिक संगठन है और 28 यूरोपीय व 2 अमेरिकी देश इसके सदस्य हैं, की सदस्यता के लिए बातचीत करना। नाटो की नवीनतम गतिविधि हम यूक्रेन-रुस युद्ध में देख चुके हैं। भारत जो कि हमेशा से विश्व शांति का समर्थक रहा है, क्या उसे इस तरह के संगठन में जाने बारे में सोचना चाहिए ? गौरतलब है रुस यूक्रेन युद्ध की एक बड़ी वजह यूक्रेन का नाटो की ओर बढ़ता झुकाव ही था | नाटो उसे अपना सदस्य बनाना चाहता था। वही पूर्व सोवियत संघ द्वारा की गई ‘‘वारसा संधि’’ का अस्तित्व समाप्त हो गया। इसकी एक वजह सोवियत संघ का विघटन भी था। वह शीतयुद्ध का दौर था और भारत ने गुट निरपेक्ष आंदोलन को प्रोत्साहित किया। अब हम ऐसे किसी सैन्य संगठन का हिस्सा बनने को लालायित हैं जो कि वर्तमान वैश्विक अशांति के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। क्या यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना से मेल खाता है ?

विनोबा कहते हैं, ‘‘हिंदू शब्द की मेरी निरुक्ति (व्युतपत्ति) इस प्रकार है, ‘हिंसया दूयते चित्तम, स वै हिंदुरितीरितः’ यानी हिंसा से जिसका चित्त दुखी होता है, उसे हिंदू कहते हैं। हिंदू शब्द की यही मेरी व्यापक निरुक्ति है। हिंदू शब्द कहां से आया, किसने बनाया, किससे बना आदि ऐतिहासिक चर्चा का इस निरुक्ति से कोई संबंध नहीं है। ऐतिहासिक कल्पना में यह शब्द प्रादेशिक बन जाता है जबकि यह निरुक्ति उसे विश्वव्यापी अर्थ प्रदान करती है।’’ क्या हम इस व्यापकता में भारत के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म को समझ पायेंगे ? समाज में बढ़ती हिंसा और वैमनस्य को समाप्त करना बहुसंख्यक वर्ग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। भारत की स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाएं भी हिंसा और पक्षपात से सराबोर हो गई हैं। 

मध्यप्रदेश में हाल ही में हुए पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में न राज्य की भूमिका की संदिग्धता सामने आई, जिसमें कि पुलिस व प्रशासन ने अनेक स्थानों सत्ताधारी दल का खुला समर्थन करा। यह बात स्वयं सत्ताधारी दल के विधायक कह रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बची-खुची कसर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने पूरी कर दी और डरा-धमकाकर या लालच से नतीजे अपने पक्ष मे कर लिए। क्या इस तरह से भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप बच पाएगा ? नीचे से लेकर ऊपर तक, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को जानबूझकर नष्ट किया जा रहा है। इसी संदर्भ में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि समाज के भीतर भी लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिकता का जबरदस्त क्षरण हुआ है। इसी चुनाव में शपथग्रहण समारोह के दौरान धार जिले की सुद्रेल पंचायत में चुनी गई महिला पंचो के बजाए जबरदस्ती करके उनके पतियों ने शपथ ली। यह सरासर आपराधिक कृत्य है, लेकिन अभी तक किसी कार्यवाही की सूचना नहीं आई है। 

आजादी का अमृत महोत्सव का स्वरूप क्या होना था और क्या हो गया है, यह दोनों ही बातें बेहद विचलित करने वाली हैं। महाराष्ट्र और बिहार की राजनितिक घटनाओं के पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिए जा सकते हैं। परंतु दुःखद और खतरनाक दोनों नजरिए से यह बात सामने आ रही है कि राजनीति में नैतिकता की स्वीकार्यता ही समाप्त होती जा रही है। आपसी कटुता अब चरम पर पहुंच रही है। अंत में चंद्रकांत देवताले की एक अन्य कविता की इन पंक्तियों पर गौर करें। ‘‘सोए हुए बच्चे तो नन्हें फ़रिश्ते ही होते हैं / और सोई हुई स्त्रियों के चेहरों पर/ हम देख सकते हैं थके संगीत का विश्राम / और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो / नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी / दुश्मनी का कोई निशान।’’ एक ऐसी मुहीम शुरु करें जिसे जगे हुए के चेहरे पर ख़ुशी, संगीत व दोस्ती दिखे। आजादी की 75वीं सालगिरह की मुबारकबाद।