प्रवासी और ग्लोबल समिट के राजनीतिक मायने

इवेंट मैनेजमेंट से बनाई और चलाई जाने वाली सरकारें जानती है आम को खास बनाना हो और वह भी राजनीतिक नफे के लिए तो पानी की तरह पैसा बहाना होता है। आडम्बर और भ्रम ऐसा खड़ा करवाया जाता है कि जनधन का बेहिसाब भारी खर्च भी जनता को राष्ट्रहित में महसूस हो। जैसे, इस समय शहर के लिए प्रवासी अतिथि देव तुल्य हुए और इसलिए मोटा खर्च जायज ठहराया जा सकता है। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी खुश करना था। वे ही बचे खुचे छह आठ माह कुर्सी पर बने रहने देंगे और वे ही डगमगाती चुनावी नाव किनारे लगवाएंगे। राजनीति इसे ही कहते हैं।

Updated: Jan 11, 2023, 07:42 PM IST

प्रवासी और ग्लोबल समिट के राजनीतिक मायने

मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रहेंगे या जाएंगे? वीडी शर्मा की विदाई हो रही हैं... या प्रदेश में फिर भाजपा सरकार बनेगी या नहीं... आदि, आदि। हवा में तैरते ऐसे सवालों की थाह प्रवासियों के सम्मेलन में ली जा सकती हैं।  2024 के आम चुनाव की बिसात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की और मजबूत वैश्विक छवि गढ़ने में यह आयोजन कितना कारगर होगा जैसे सवालों को भी प्रवासियों के इस मेले में खंगाला जा सकता हैं। दरअसल, विदेश नीति की यह उत्सवी इवेंट कूटनीति और राष्ट्रवाद की ‘राजनीति’ से भी सराबोर रहा।

इसी राजनीति के चलते हमारे राष्ट्र में कभी आलोचनाओं का विषय रहे इंडियन ब्रेन ड्रेन (भारतीय प्रतिभा पलायन) वाले एनआरआई इस समय देव तुल्य प्रवासी अथिति हो गए हैं। यही नहीं बीते दशक से इन्हें इंडियन ग्लोबल एंबेसेडर के रूप में भी स्थापित किया जाता रहा हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद अब मोदी सरकार के शाइनिंग इंडिया के भी ये वाहक हैं। इनमे अधिकांश संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरित प्रवासी/स्वयंसेवक हैं। इनके अलावा विदेशो में जा बसे ऐसे एनआरआई की भी बड़ी संख्या हैं जो प्रवासी दिवस से ज्यादा वास्ता नहीं रखती। जो भी हो बेहतर कॅरियर, साफ हवा-पानी, सुख-सुविधाओं के साथ यहां के भ्रष्ट सिस्टम के उलट, गुड गवर्नेंस के आकर्षण में विद्यार्थी, पेशेवर, कारोबारी और युवाओं का विदेशो में आना-जाना/पलायन तेजी से हो रहा हैं। इस नाते भी प्रवासियों की पूछपरख, चिंता, फिक्र और देश हित में उनकी क्षमताओं का दोहन जरूरी हैं।

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जनमानस में सवाल इनकी सरकारी आव भगत को लेकर मचे हल्ले पर हैं। यह स्पष्ट हैं भाजपा यह अच्छे से जानती है कि इस तरह के जलसों से प्रवासियों की ब्रांडिंग, प्रमोशन और राष्ट्र सेवा के साथ राजनीतिक हित भी साधे जा सकते हैं। असल में इसके केंद्र में संघ परिवार हैं। संघ का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क हैं। बड़ी बात यह है कि कुछ देशों में प्रवासियों द्वारा शाखाएं भी लगाई जाती हैं। हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार और हिंदू हितों की रक्षा जैसे प्रकल्प संचालित होते हैं। प्रवासियों के माध्यम से सनातन हिंदू धर्म, संस्कृति,पुरातन ज्ञान, शांति, अहिंसा,हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ वैश्विक कुटुंब के सामाजिक-राजनीतिक एजेंडे पर अंतराष्ट्रीय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काम करता रहता है। इसलिए इंदौर में हुए संघ रचित प्रवासी सम्मेलन के केंद्र में भाजपा के लिए जरूरी सत्ता और चुनावी लोभ के समीकरण थे। इस राजनीतिक गणित में फिलहाल प्रवासी भारतीय अवतरित ‘राजनीतिक अतिथि’ हो गए है। वैसे साल में एक बार इनका अपने वतन आना, अपनों से मिलना आदि तयशुदा होता हैं। इस तरह आने पर वे प्रवासी नहीं कहलवाए जाते वरन अपनत्व भाव वाले आम भारतीय नागरिक की तरह ही होते है लेकिन सरकार ने इन्हें प्रवासी बना दिया। इनके लिए सरकारी सालाना जलसा तय हो गया। इस समय इंदौर के अतिरंजित सरकारी सत्ता केन्द्रित उत्सवी तमाशे ने इन्हें देवदुर्लभ वीआईपी प्रवासी बना दिया। भले ही संघ की मंशा ऐसी नहीं रही हो।

वैसे, उत्सवों के शहर इंदौर में इस तरह के या इससे बड़े भांति भांति के आलीशान उत्सव शांति के साथ होते रहे है पर इस उत्सव को राजनीतिक स्वार्थों और चुनावी गम्मत ने खास बना दिया है। इवेंट मैनेजमेंट से बनाई और चलाई जाने वाली सरकारें और उनकी मातृ संस्थाएं जानती है आम को खास बनाना हो और वह भी राजनीतिक नफे के लिए तो पानी की तरह पैसा बहाना होता हैं। आडम्बर और भ्रम ऐसा खड़ा करवाया जाता है कि जनधन का बेहिसाब भारी खर्च भी जनता को राष्ट्रहित में महसूस हो। जैसे, इस समय शहर के लिए प्रवासी अतिथि देव तुल्य हुए और इसलिए इस तरह का मनमाना मोटा खर्च जायज ठहराया जा सकता हैं। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी खुश करना था। वे ही बचे खुचे छह आठ माह कुर्सी पर बने रहने देंगे और वे ही डगमगाती चुनावी नाव किनारे लगवाएंगे। राजनीति इसे ही कहते हैं। इसलिए बेहिसाबी खर्च के लिए सिस्टम को खुला छोड़ दिया गया। सरकार की आर्थिक रूप से खटारा हो चुकी गाड़ी खींचती सरकारी मशीनरी और जनप्रतिनिधियों को अब भी ऐसे ही मौकों की तलाश रहती हैं। इनके लिए यह जरूरी भी है।

बदनाम होती सरकार को जनप्रिय सरकार का आभासी रूप देने की इवेंट आधारित तकनीक प्रयोग में लाना जरूरी हैं। बावजूद इसके जनप्रिय सरकार खड़ी करने के तमाम तूफानी इवेंट शिवराज सरकार के नम्बर बढ़ाते नहीं दिख रहे हैं। शिवराज की गुड गवर्नेंस लगातार खासकर बीते दस-पंद्रह वर्षों से भ्रष्ट सिस्टम के रूप में उत्तरोत्तर प्रचारित होती जा रही हैं। इसका बडा नुकसान शिवराज सरकार को उठाना पड़ रहा है। इससे निपटने के दांवपेंच सभी सत्तारूढ़ नेता आजमाते है। इसी क्रम में मंहगाई, बेरोजगारी, शिवराज पर हावी होते मंत्री, बड़े से लेकर छुटभैय्ये तक की दादागिरी और रंगदारी, किसानी में गुस्सा, सरकारी आर्थिक संकट, अंहकारी अफसरशाही जैसी समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए हल्ला बोल मेगा पॉलिटिकल इवेंट सहायक हो सकती हैं यह बीजेपी ने अच्छे से समझ लिया है। कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं रही हैं। कांग्रेस कालखंड की सत्ता में भी सरकार-संगठन में पैसा और पद के लिए गुटीय युद्ध हावी रहे। उनके चारों ओर भ्रष्टाचार का समुद्र और इवेंट की भरमार थी।

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बीते 17 बरस से शिवराज का मुख्यमंत्री बने रहना और भाजपा के एकतरफा सत्ता में स्थापित रहने से जनता का शिव सरकार से मोह भंग हो रहा है। खबरें आ रही हैं कि बीजेपी के लिए प्रतिकूल हालत बने हुए हैं। सरकार ही नही संगठन की पोल पट्टी भी ऊफान पर हैं। इन हालातों में बीजेपी और संघ के समक्ष मध्‍य प्रदेश में सत्ता की डांवाडोल नाव को किसी तरह किनारे लगाने की चुनौती है। इसके लिए जरूरी है मंत्रियों और ब्यूरोक्रेट्स पर नियंत्रण खोते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धुंधली होती जनछवि को फिर प्रभावी बनाना। साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज में आकंठ डूबी सरकार और अब तक के किए धरे से सबका ध्यान हटाने के लिए शुरुआत के रूप में यह इवेंट कारगर होगा? शिवराज सिंह फिर से कुशल शासक की तरह नए अवतार में आ जाएंगे? या सत्ता और संगठन के सारे शक्ति केंद्र सूत सावल में आ जाएंगे? ऐसे राजनीतिक कयास लगाए जा रहे और चर्चा में इस तरह के सवाल भी जिज्ञासा का विषय हैं। 

जहां तक शिवराज का सवाल है, वे मोदी की पाठशाला के सीधे सरल मासूम और आज्ञाकारी विद्यार्थी हैं। संघ परिवार के वे प्रिय हैं। अपने पक्ष के विधायकों की संख्या बल के साथ बीजेपी आलाकमान के समीकरणों को पूरी तरह अपने अनुकूल साधने में शिवराज कभी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। बावजूद इसके शिवराज के विकल्प की तलाश की कवायद होती रहती हैं और आखिर में बात शिवराज पर जाकर ही खत्म करवा दी जाती हैं। मतलब कोई विकल्प नहीं हैं। यही कारण हैं कठिन होते राजनीतिक और चुनावी समर में शिवराज सिंह के लिए संघ परिवार और मोदी सरकार चुनावी फायदे की हर तरह की इवेंट्स में हर संभव ताकत लगा रहे है।

इस काम में मोदी सरकार द्वारा मध्‍य प्रदेश में प्रवासियों को न्योतना और राज्य के ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट के आयोजन में अडानी-अंबानी आदि जैसे कारोबारियों की शिरकत करवाना, केंद्र के संसाधन और भरपूर फंडिंग उपलब्ध कराना आदि से बेहतर क्या हो सकेगा? जी 20 अंतरराष्ट्रीय जलसा भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। भारत सरकार के सभी विभागों के संसाधन शिवराज सरकार की छवि निखारने में झोंके जा रहे हैं।    

संघ और भाजपा के चुनाव विजय प्रकल्प की टोली मध्‍य प्रदेश में ऐसे आयोजनो को पॉलिटिकल इवेंट बनवाने में वैसे ही कोई कसर नहीं छोड़ती रही हैं। सरकार के संसाधनों के सहारे ये काम आसान हो जाते हैं।

संघ की प्रयोगशाला के बहुतेरे प्रयोगों के हिसाब से मध्‍य प्रदेश का मालवा अनुषांगिक संगठनो के लिए बहुत ज्यादा मुफीद रहा है। इस कारण किसी न किसी बहाने यहां संघ, विहिप से लेकर प्रमुख अनुषांगिक संगठनों के बड़े अयोजन सरकारी और गैरसरकारी माध्यमों से होते रहते हैं। इनका अपरोक्ष फायदा सरकार को मिलता है। इस तरह के इवेंट्स के माध्यम से भारत सरकार के संसाधन भी शिवराज सरकार की छवि निखारने में झोंके जा रहे हैं। स्पष्ट हैं, मजबूरीवश चुनावी रथ के सारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो होंगे। 

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इस समय चुनावी रण में बने रहने और चुनाव की तैयारी में शिवराज सिंह के सामने अनेक संकट हैं। अपने वजीर, सेनापति और अढ़ाई घर चलने वाले अपनी ही पार्टी के तख्ता पलट में लगे असंतुष्टों से शिवराज जूझ रहे हैं। संगठन से सत्ता तक की काया रूग्ण है और बार-बार हर सुबह डॉक्टर बदलने की बांग शिवराज विरोधी दे देते हैं। इस पर संकट यह भी कि कांग्रेस से भाजपा में खींचकर लाए गए विधायकों का भी रूप-रंग प्रवासियों की तरह ही है। मतलब और मन की नहीं होने पर कब ये उड़न छू हो जाए भरोसा नहीं। ऐसे विकट हालातों के बीच शिवराज सिंह की ताकत इस तरह के आयोजन से बढ़ेगी या नहीं यह चर्चा का विषय हैं। 

जो भी हो, प्रधानमंत्री के हर इशारे को समझने और साकार करने के लिए शिवराज और उनकी टीम मोदी स्टाइल में तामझाम खड़ा करवाते देर नहीं करती हैं। अलग-अलग खेमों के अपने मंत्रियों से परेशान शिवराज सिंह ने इस आयोजन में किसी भी मंत्री को हमेशा की तरह सीमित दायरे में ही रखा है। प्रवासी आयोजन मोदी सरकार का है इसलिए सत्ता संगठन में सन्नाटा करवा दिया गया हैं। कहीं कोई चूं चपट नहीं। सब खामोश, संगठन भी। अस्तांचल की बेला में बताए जा रहे संगठन प्रमुख को ही कोई सूझ नहीं पड़ रही है वे ऐसे घिरे हुए हैं। यह शिवराज लीला हैं। किसी न किसी की बलि तो होना है। प्रवासियों से लेकर इन्वेस्टर तक एक ही चेहरा शिवराज का ही रहना है। इस इवेंट से मुख्यमंत्री के रूप में विदेशों में भी अपनी छवि चमकाने की कोशिश में शिवराज कामयाब हो जाएंगे। वैसे भी उनके स्वार्थी सलाहकार उन्हें मोदी का विकल्प बनाते रहे है। यह बात अलग हैं आदित्य नाथ योगी और अमित शाह भी यह नादानी बखूबी जानते हैं। प्रवासी और इन्वेस्टर समिट से मुख्यमंत्री पर प्रधानमंत्री की राजनीतिक कृपा में भी इजाफा होना हैं। यह इसलिए भी कि संघ मानता है शिवराज का इस समय न कोई जोड़ हैं न ही तोड़। शिवराज सरकार को बरसों से खरी-खरी सुनाते-सुनाते बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी थककर कह चुके है शिवराज बने रहेंगे... उनके ही नेतृत्व में पार्टी चुनाव लडेगी।