नए कलेवर में मार्डन किचन तक पहुंचने की तैयारी में पारंपरिक टेराकोटा बर्तन

टेराकोटा शिल्प को मिला नया आयाम, छोटा उदयपुर के धानक आदिवासी जैविक पद्धति से बना रहे नॉन स्टिक टेराकोटा बर्तन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्राफ्ट्स एंड डिज़ाइन जयपुर की मृणालिनी बेदी ने तैयार किए बर्तनों के नए डिजाइन

Updated: Oct 17, 2020 11:22 PM IST

नए कलेवर में मार्डन किचन तक पहुंचने की तैयारी में पारंपरिक टेराकोटा बर्तन
Photo Courtesy: facebook

गुजरात के छोटा उदयपुर के धानक आदिवासियों की मेहनत रंग ला रही है। यहां के आदिवासी अपनी परंपरागत भारतीय पद्धति से बनने वाले टेराकोटा बर्तनों में नया प्रयोग कर रहे हैं। आदिवासी नान स्टिक टेराकोटा बर्तन बनाकर साप्ताहिक बाजारों में बेच रहे हैं। आदिवासियों की कला को एक नया स्वरूप देने का काम किया है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्राफ्ट्स एंड डिज़ाइन जयपुर की मृणालिनी बेदी ने। उन्होंने टेराकोटा बर्तनों के नए डिजाइन बनाए हैं, जो मार्डन रसोई में भी आसानी से उपयोगी साबित हो सकते हैं।

इन टेराकोटा से बने बर्तनों की विशेषता है कि यह स्थानीय मिट्टी से बनाए जाते हैं। जिसके लिए आदिवासी पहले मिट्टी तैयार करके तरह-तरह के बर्तनों के आकार में गढ़ते हैं।

बर्तनों को सूरज की रोशनी में सुखाया जाता है। बर्तनों के सूख जाने के बाद बर्तनों को भट्टी में तपाया जाता है। बर्तनों को पकाने के लिए आदिवासी ताड़ की सूखी पत्तों का उपयोग करते हैं।

करीब घंटे भर में जब बर्तन पूरी तरह पककर तैयार हो जाते हैं, तब उन पर लाख की कोटिंग की जाती है। इन्हे रंगने के लिए गेरु के रंग का उपयोग किया जाता है।

इन बर्तनों की पैकिंग भी जैविक तरीके से की जाती है, इसके लिए सागौन के पत्तों और बांस की टोकरी का उपयोग किया जाता है। यह कम लागत में प्रभावी तरीका साबित होता है।  

यह टेराकोटा बर्तन नॉन-स्टिक बर्तन बनाने का सबसे जैविक तरीका है जो कि स्थानीय मिट्टी से तैयार किया जाता है। आदिवासियों की यह परंपरागत बर्तन बनाने की कला देश दुनियाभर में फेमस हो रही है। आदिवासियों की कला को एक नया स्वरूप देने का काम किया है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्राफ्ट्स एंड डिज़ाइन जयपुर की मृणालिनी बेदी ने। उन्होंने टेराकोटा बर्तनों के नए डिजाइन बनाए हैं।

मृणालिनी ने अपने स्नातक डिप्लोमा प्रोजेक्ट के लिए छोटा उदेपुर के पास स्थित अंबाला गांव के धानक आदिवासियों के साथ मिलकर काम किया। मृणालिनी के काम ने इस शिल्प को नया आयाम देने का काम किया है, इन बर्तनों को मार्डन किचन में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। मृणालिनी बेदी ने अपनी क्रियेटीविटी से इन बर्तनों के आधुनिक डिजाइन तैयार किए हैं।

जिन्हें आदिवासियों के परंपरागत तरीके से साकार रूप दिया जा रहा है। आदिवासी अकादमी की शॉप में ये पारंपरिक बर्तन आर्डर पर उपलब्ध हैं। इनमें फ्राइंग पैन और कड़ाही जैसे बर्तन नॉन स्टिक हैं। आदिवासियों की कला और मार्डन डिजाइन मिलकर टेराकोटा शिल्प को नया आयाम देने का काम बखूबी कर रहे हैं।