MP By Poll 2020: आदिवासी लगा सकते हैं बीजेपी की जीत में सेंध

बीजेपी सरकार को लेकर आदिवासियों में रोष, खेत उजाड़ने से लेकर जंगल काटने और आदिवासी समुदाय के वन अधिकार के दावों के निरस्त होने से नाराज़गी, उपचुनाव में पड़ सकता है नकारात्मक असर

Updated: Oct 06, 2020, 02:02 AM IST

MP By Poll 2020: आदिवासी लगा सकते हैं बीजेपी की जीत में सेंध
Nepa Nagar, Madhya Pradesh

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 300 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम में बुरहानपुर जिले के नेपानगर पुलिस थाने के सामने बीते 20 सितम्बर को 1000 से ज्यादा की संख्या में आदिवासी "हक नहीं तो जेल सही" के नारों के साथ जेल भरो आंदोलन पर बैठे हुए हैं। आदिवासियों का आरोप है कि "हमारे जंगलों को बाहरी लोगों द्वारा काटा जा रहा है। जंगलों की कटाई अवैध रूप से बड़े पैमाने पर हो रही है।" इसकी शिकायत करने पर उल्टा निर्दोष आदिवासियों को ही फॉरेस्ट विभाग द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। इस संबंध में वर्तमान सरकार के प्रतिनिधियों और प्रशासन को पत्र लिखा गया है। उसके बाद भी स्थिति जस की तस है।

इस आंदोलन में शामिल हीराबाई से जब हमसमवेत ने उपचुनाव को लेकर बातचीत की तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर बताया कि आप यह न सोचे कि हम उपचुनाव का बहिष्कार करेंगे। बल्कि अगर हमारे खिलाफ अत्याचार बंद नहीं हुआ और हमारी बातें नहीं सुनी गईं तो हम संगठित होकर वर्तमान सरकार के खिलाफ वोट करेंगे।

ऐसी ही एक घटना बीते 22 जुलाई को अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ ब्लॉक की है। यहां भी पेंदी गांव के डुमरा टोला में पीढ़ियों से रह रहे आदिवासियों की ऐसी ही शिकायत सामने आयी है।यहां आजीविका के लिए खेती कर रहे बैगा समुदाय के लोगों के 107 एकड़ जमीन पर फॉरेस्ट विभाग ने खड़ी फसल के बीच में वृक्षारोपण कर दिया था। बैगा आदिवासी समुदाय के लोग इस बात से बेहद नाराज़ है।

मध्य प्रदेश में 28 सीटों में होने वाले चुनावों में 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। जिनमें से एक नेपानगर और दूसरी अनूपपुर विधानसभा की सीट है। दोनों ही सीटों पर 2018 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत हुई थी। बीते दिनों निर्वाचित विधायक सुलेखा सिंह और बिसाहूलाल कांग्रेस का साथ छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए। जिसके कारण दोनों सीटों पर उपचुनाव होने हैं।

बीते कुछ दिनों से दोनों ही सीटों पर आदिवासी असंतोष की खबरें देखने को मिल रही हैं। अगर वर्तमान सरकार आदिवासियों का असंतोष मिटाती है तो इसका परिणाम उपचुनाव में देखा जा सकता है। 

नेपानगर के आदिवासी मतदाता कैलाश जमरे बताते हैं कि 2018 विधानसभा चुनावों के दौरान भी ऐसी ही आदिवासी उत्पीड़न की घटनाएं सामने आई थीं। जिसके विरोध में तब की सरकार के विरोध में आदिवासियों ने वोट किया जिसके कारण 2018 में इस सीट से कांग्रेस की उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी। अब भी हालात वैसे ही हैं। वर्तमान सरकार और प्रशासन से आदिवासी गुस्से में हैं।

चुटका परमाणु संघ से जुड़े राजकुमार सिन्हा बताते हैं कि, शिवराज सिंह चौहान की सरकार में यह समझ ही नहीं पाई है कि आदिवासियों को योजना मात्र से नहीं ठगा जा सकता है। आदिवासियों को सिर्फ उनके नैसर्गिक अधिकार चाहिए। उन्हें उनके जंगल का अधिकार चाहिए। ढाई लाख से ज्यादा वन अधिकार के दावों का निरस्त हो जाना ये दर्शाता है कि सरकार आदिवासियों के मुद्दे पर कितनी अगंभीर है।

हालांकि चुनाव से ठीक पहले, आदिवासी वोटों के महत्व को समझते हुए प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने कुछ ही दिनों पहले वन अधिकार दावों के तहत आदिवासियों को जल्द भूमि के अधिकार दिलाने की बात की है। लेकिन जमीनी स्थिति इससे उलट हैं। बीते कुछ महीनों में प्रदेश भर में रीवा, हरदा, अनूपपुर, खंडवा, बुरहानपुर, मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिलों पर वन अधिकारियों द्वारा आदिवासी उत्पीड़न की खबरें लगातार आ रही हैं। हाल ही में खंडवा में खड़ी फसल जेसीबी से बर्बाद कर दी गई और वहां फॉरेस्ट विभाग द्वारा बबूल के बीच डलवा दिए गए। 

जागृत आदिवासी दलित संगठन के कार्यकर्ता, नितिन वर्गिस बताते हैं कि आदिवासी बाहुल्य बुरहानपुर जिले में ऑनलाइन माध्यम से 11,000 वन अधिकार के दावे आए थे। जिनमें से मात्र 54 दावे ही ऐसे हैं जो जिला स्तर तक पहुंच पाए हैं। ऐसी स्थिति प्रदेशभर की है। ढाई लाख से ज्यादा वन अधिकार के दावे प्रदेश भर में निरस्त हो चुके हैं। जिसके कारण वर्तमान सरकार के प्रति आदिवासियों का भरोसा कम हुआ है।

गौरतलब है कि 2019 में हुए आम चुनावों से पहले भी मध्यप्रदेश में आदिवासियों का अहम मुद्दा वन अधिकार कानून था। जिसके लिए 2019 में भोपाल में प्रदेश भर के बड़े आदिवासी संगठनों द्वारा बड़ी संख्या में हुंकार रैली हुई थी। जहां प्रमुख मुद्दा विस्थापन और वन अधिकार कानून के तहत वन अधिकार का था।

एक अनुमान के मुताबिक, मध्यप्रदेश में आदिवासी आरक्षित 2 सीटों के अलावा 26 सीटें जहां उपचुनाव होने हैं, लगभग 10% से 12% आदिवासी वोटर मौजूद है।  2018 में हुए विधानसभा चुनावों में दोनों पार्टियों के बीच हार जीत का अंतर बहुत मामूली था। ऐसे में अगर आदिवासी वोटर्स एक साथ किसी भी पक्ष में जाते हैं तो निश्चित तौर पर इसका परिणाम चुनावों पर गंभीर रूप दिखाएगा। वर्तमान सरकार में भी अगर बीजेपी उन्हें मनाने में कामयाब नहीं रहती है तो उपचुनावों में उन्हें इसके नकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।