दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवन जठरे, सद्गुरोर्ज्ञान दातु:

सदगुरु हमें तत्व का बोध कराके स्थायी सुख प्रदान करते हैं, इसलिए समस्त शास्त्रों में गुरु को भगवान से अधिक महिमावान् बताया गया है

Updated: Nov 01, 2020, 11:06 PM IST

दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवन जठरे, सद्गुरोर्ज्ञान दातु:

सदगुरु
हमारे शास्त्रों में गुरु को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भगवान आदि शंकराचार्य ने गुरु के संबंध में कहा की गुरु का कोई दृष्टांत नहीं है। जिससे गुरु की उपमा दी जाय। तीनों लोकों में कोई दृष्टांत नहीं है। गुरु कैसा होता है, इसकी उपमा किसी से नहीं दी जा सकती। किसी ने कहा हमारे पास एक उपमा है पारसमणि। पारस एक पत्थर होता है अगर उस मणि से लोहा छू जाए तो लोहा सोना हो जाता है किसी ने गुरु को पारस मणि से उपमित किया। और कहा कि शिष्य लोहा है। लेकिन यह दृष्टांत ठीक नहीं है। क्योंकि पारस लोहा को सोना बनाता है पारस नहीं। परंतु गुरु अपने शिष्य को अपनी आत्मा बना लेता है इसलिए उसकी कोई उपमा नहीं है।
दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवन जठरे,
 *सद्गुरोर्ज्ञान दातु:

इसलिए गुरु के समान कोई भी वस्तु संसार में नहीं है। अब प्रश्न ये उठता है कि गुरु को इतना महत्व क्यों दिया गया है? असल में संसार के सभी प्राणी दुख से छुटकारा पाकर सदा के लिए सुखी होना चाहते हैं। प्रत्येक प्राणी की यह भावना रहती है हमें दुख ना हो और सुख मिले ऐसा सुख मिले जो सबसे श्रेष्ठ हो। शास्त्रीय भाषा में कह सकते हैं कि समस्त दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति प्रत्येक पुरुष का प्रयोजन है परमानंद की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यदि परमानंद कोई वस्तु है, किसी देश में है, किसी काल में है, तो हम वहां चले जाएं। पर ऐसा कोई देश नहीं है जहां सुख ही सुख हो। ऐसा कोई काल नहीं है जहां सुख ही सुख हो, ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो हमें सदा सुख देती रहे। हम जिसको सुख का साधन मानकर प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं उसके लिए दुख भी उठाते हैं,पर वह भी सदा सुख नहीं देता। उदाहरण के लिए आपके मन में यह संकल्प हुआ कि आज हम खीर खाएंगे।तो खीर खाने की इच्छा से हमने सारा सामान इकट्ठा किया। दूध लाए,शक्कर लाए, बढ़िया चावल ले आए, मेवा डाले केशर डाली पत्नी ने खीर बनाया उसकी सुगंध से आनंद आ गया। खीर बना। खाने के लिए बैठे। खीर खाते-खाते संतुष्ट हो गए।  तो कहते हैं अब बस करो।पत्नी एक कटोरी और लाई। जब बार-बार देती ही जा रही है। तो अंत में इतनी गुस्सा आती है कि कहते हैं कि क्या अब मार ही डालोगी? तो खीर अगर सुख रूप होती तो वह दुख रूप कैसे हो गई? ये कहना होगा कि कोई भी भोग्य वस्तु सदा सुखद नहीं हो सकती।  क्यूंकि देश,काल और वस्तु में सदा रहने वाला सुख नहीं है। कोई भी सुख ऐसा नहीं है जो दुःख मिश्रित न हो। तो गुरु हमें ऐसा मार्ग बताते हैं कि सुख बाहर नहीं है। सुख के लिए किसी देश में, किसी काल में किसी वस्तु में भटकने की आवश्यकता नहीं है, सुख तेरा स्वरूप ही है।तू स्वयं आनंद स्वरूप है। अपने को न जानने के कारण तू भटक रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने विनय पत्रिका में कहा है कि
आनंद सिंधु मध्य तव बासा
बिनु जाने कत मरत पियासा

अरे जीव!तेरा निवास तो आनंद के समुद्र में है। बिना जाने तू प्यास से मर रहा है। और कबीर ने कहा-
पानी में मीन पियासी
मोहि सुन सुन आवै हांसी।

अभिप्राय यह है कि सदगुरु हमें तत्व का बोध कराके स्थायी सुख प्रदान करते हैं। इसलिए समस्त शास्त्रों में गुरु को भगवान से अधिक महिमावान् बताया गया है।
इसलिए हम सभी को अपने सदगुरु के प्रति अनन्य निष्ठा वान होना चाहिए।