सुख दुःख भोगते हुए सुधारें परलोक

मनुष्य-योनि की श्रेष्ठता का कारण यह है कि यह कर्म योनि है, मनुष्य योनि पाकर जीव प्राप्त कर सकता है चारों पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम और मोक्ष

Updated: Aug 16, 2020 08:54 AM IST

सुख दुःख भोगते हुए सुधारें परलोक

हमारे सनातन धर्म में शास्त्रों के अनुसार चार प्रकार से उत्पन्न होने वाली चौरासी लाख योनियां कही गई हैं।इन शरीरों की उत्पत्ति अंडों से, मां के उदर से, पसीना से और पृथ्वी का भेदन करके निकलने वाले वृक्षों के रूप में होती है।यह भी माना गया है कि इन शरीरों का शरीरी अर्थात् आत्मा का नाश नहीं होता। किन्तु शरीरधारी जीव अज्ञान के कारण शरीर के जन्म और नाश को अपना मान लेता हैं। आत्मा जिसको जीव शब्द से भी कहा जाता है।वह काल, कर्म,स्वभाव और गुणों के घेरे में घिरा हुआ इन चौरासी लाख योनियों में जाता है उन योनियों में मनुष्य योनि सर्व श्रेष्ठ मानी जाती है। मनुष्य-योनि की श्रेष्ठता का कारण यह है कि यह कर्म योनि है जबकि अन्य योनियां भोग योनि मानी जाती हैं। मनुष्य योनि पाकर जीव धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है।

श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव को समझाते हुए कहा कि- विश्व सृष्टा ईश्वर ने अनेकों प्रकार के शरीरों का निर्माण किया। वृक्षों, सरकने वाले जीवों, भागने वाले चौपाया पशुओं, उड़ने वाले पक्षियों और तैरने वाले जल जन्तुओं को उन्होंने बनाया किन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं हुआ, तब अन्त में उन्होंने मनुष्य बनाया और देखा कि मनुष्य शरीर के भीतर ऐसी बुद्धि है, जिससे ब्रह्म साक्षात्कार किया जा सकता है तो उनको आनंद का अनुभव हुआ। उन्होंने कहा "सुकृतम"अर्थात् मैंने अच्छा किया यथा-
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्म शक्त्या,
वृक्षान्सरीसृपपशून्खगदंशमत्स्यान्
तैस्तैरतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोक धिषणं मुदमाप देव:।

क्योंकि इस शरीर से चारों पुरुषार्थों की सिद्धि हो सकती है। इसमें भी मुख्य रूप से धर्माचरण की क्षमता है चारों पुरुषार्थों में भी मुख्य धर्म ही है। क्यूंकि अर्थ और काम तो प्रारब्ध के अधीन हैं। धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ के अधीन हैं। इसलिए हमें धर्म और मोक्ष के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए।

धर्म का ज्ञान हमें शास्त्रों से ही होता है क्यूंकि प्रत्यक्ष और अनुमान से धर्माधर्म का ज्ञान नहीं होता।धर्म से दो लाभ होते हैं,एक तो जब जीव इस शरीर से निकलकर परलोक गमन करता है तो उसके साथ धर्म के अलावा यहां से कुछ भी नहीं जाता। यथा -
 धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे,
 भार्या गृहद्वारि जना: श्मशाने।
 देहश्चितायां परलोक मार्गे,
 धर्मानुगो गच्छति जीव एक:।।

परलोक में मनुष्य का किया हुआ धर्म ही उसकी सहायता करता है।

शरीर की आयु अत्यंत सीमित है। यद्यपि इसकी परमायु सौ वर्ष की मानी जाती है पर सौ वर्ष का जीवन विरले ही प्राप्त कर पाते हैं। देखते ही देखते बाल्यावस्था, युवावस्था को पार करके व्यक्ति वृद्धावस्था का अनुभव करके मरणोन्मुख हो जाता है। मृत्यु कब सामने आकर खड़ी हो गई इसका पता ही नहीं चलता। इसलिए कुछ बुद्धिमान लोग अपने जीवन में संसार के सुख दुःख भोगते हुए परलोक सुधारने के लिए धर्माचरण करते रहते हैं। उनके द्वारा अनुष्ठित वह धर्म निष्काम भाव से अनुष्ठित किया जाए और उसका फल भगवान को समर्पित किया जाए तो वह अन्त:करण को निर्मल बनाते हुए हमारे मोक्ष में सहायक हो जाता है।