कैसी बुद्धि से जाना जाना जा सकता है ब्रह्म

बुद्धि ही विवेक कराती है, विवेक कराते-कराते हमें उस स्थिति तक पहुंचा देती है जहां सहज ही हो जाता है ब्रह्म का साक्षात्कार

Updated: Sep 05, 2020 12:36 AM IST

कैसी बुद्धि से जाना जाना जा सकता है ब्रह्म

दान परसु बुधि शक्ति प्रचंडा 

संसार शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने जिन अस्त्र शस्त्रों का  वर्णन किया है उसमें दान को परशु और बुद्धि को ही प्रचंड शक्ति बतलाया है। यहां बुद्धि का अभिप्राय ज्ञान से है। चिदाभास जो अन्त:करण की वृत्ति है, उसी का नाम ज्ञान है।

बुद्धि से ज्ञान होता है,यह बात सीधे-सीधे नहीं कही जा सकती। क्यूंकि बुद्धि कोई प्रमाण नहीं है। जैसे- रूप का ज्ञान करना हो तो आंख के माध्यम से,शब्द का यथार्थ ज्ञान श्रोत्र के माध्यम से,रस का यथार्थ ज्ञान रसना से, और गंध का यथार्थ ज्ञान नासिका से होगा। तो प्रत्यक्ष में तो आंख,कान,नाक, जिह्वा और त्वचा ये प्रमाण हैं। प्रमा कहते हैं यथार्थ ज्ञान को। इस प्रकार प्रत्यक्ष में ये पांच ही प्रमाण माने जाते हैं। उसके बाद अनुमान और आगम ये तीन ही प्रमाण मुख्य हैं। तो प्रत्यक्ष में तो बुद्धि का सन्निवेश है नहीं।अब दूसरा प्रमाण है अनुमान। तो अनुमान में भी बुद्धि का सन्निवेश नहीं है।हम पर्वत में धूम देखकर अग्नि का अनुमान करते हैं- 

यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्नि

जहां जहां धूंआ होता है वहां वहां अग्नि होती है क्यूंकि रसोई घर में हम दोनों का साहचर्य देखते हैं। ऐसी स्थिति में हम जहां जहां धूंआ देखते हैं वहां वहां अग्नि का अनुमान कर लेते हैं। ये अनुमान प्रमाण है। इसी तरह और भी प्रमाण हैं। शब्द भी प्रमाण है।शब्द से परोक्ष वस्तुओं का ज्ञान होता है। धर्म-अधर्म का ज्ञान होता है। तो ये सब बुद्धि से भिन्न हैं। ऐसी स्थिति में बुद्धि से परमात्म तत्व का ज्ञान कैसे हो सकता है यह एक विचारणीय विषय है।श्रुतियों में हमें दो प्रकार के वचन उपलब्ध होते हैं। एक तो वे कि परमात्मा के ज्ञान में मन और बुद्धि का प्रवेश ही नहीं है। जिसको बिना प्राप्त किए मन के सहित बुद्धि लौट आती है उसको ब्रह्म जानो। गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में -

मन समेत जेहिं जान न बानी, तरकि न सकहिं सकल अनुमानी

जहां मन के सहित वाणी का प्रवेश ही नहीं है। मन वाणी का अगोचर है परमात्मा। ये श्रुतियों में प्रसिद्ध है। साथ ही साथ ये भी है कि इस परमात्मा को मन से ही जानना चाहिए। इस प्रकार मन साधन हो गया। कौन सा मन साधन हो गया? एक वेदांत के ज्ञाता महात्मा ने कहा- 

मति न लखै जेहिं गति न लखै

उस परमात्मा को बुद्धि नहीं जानती, उल्टे जिसके द्वारा बुद्धि जानी जाती है,जो मन के द्वारा मनन नहीं किया जा सकता, जिसके द्वारा मन बनता हो, उसे ब्रह्म जानो।

मति न लखै जेहिं

जिसके द्वारा मति जानी जाए और ये बात स्वाभाविक भी है। बुद्धि जड़ है और आत्मा चैतन्य है। तो चैतन्य आत्मा को जड़ बुद्धि कैसे जान सकती है? जड़ बुद्धि में वह शक्ति नहीं है कि वह आत्मा को जान सके। और यदि आत्मा बुद्धि के द्वारा जाना जाता है तो बुद्धि आत्मा का ज्ञेय हो गया। ज्ञेय हो गया तो दृश्य हो गया। और ब्रह्म किसी का दृश्य बन नहीं सकता। तो फिर बुद्धि ब्रह्म को कैसे जान सकती है, यह एक प्रश्न हो सकता है।

सामान्य बुद्धि उस परमात्मा को जानने में निश्चित रूप से असमर्थ है। परन्तु वेदान्तशास्त्राभ्यास जन्य संस्कार से संस्कृत जो बुद्धि है उससे ब्रह्म को जाना जा सकता है। बुद्धि ही विवेक कराती है। विवेक कराते-कराते हमें उस स्थिति तक पहुंचा देती है। जहां ब्रह्म का साक्षात्कार सहज ही हो जाता है। ऐसी बुद्धि ही संसार शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शक्ति है।

 दान परसु बुधि शक्ति प्रचंडा