Facebook Row: पूर्व नौकरशाहों का मार्क जुकरबर्ग को पत्र, मुनाफे से ज्यादा हो इंसान की फिक्र

Facebook Hate Speech Policy: पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि भारत में फेसबुक की नीतियां पक्षपाती, नीति लागू नहीं हुई तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ेगी हिंसा

Updated: Aug 26, 2020 09:26 PM IST

Facebook Row: पूर्व नौकरशाहों का मार्क जुकरबर्ग को पत्र, मुनाफे से ज्यादा हो इंसान की फिक्र
Photo Courtesy: Swaraj Express

नई दिल्ली। अंखी दास को लेकर उठे विवाद के बाद अब भारत के 54 पूर्व नौकरशाहों ने फेसबुक के सीईओ को पत्र लिखकर कहा है कि कंपनी को भारत में अपनी हेट स्पीच पॉलिसी लागू करने के लिए गंभीर कदम उठाने चाहिए। इन पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों में वजाहत हबीबुल्ला, अरुणा रॉय और हर्ष मंदर जैसे जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। 

इन पूर्व अधिकारियों ने फेसबुक पर भारत में पक्षपाती तरीके से काम करने का का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने मांग की है कि यह सुनिश्चत किया जाए कि फेसबुक की इंडिया पॉलिसी हेड अंखी दास आगे कभी भी हेट स्पीच पॉलिसी को लागू करने की स्थिति में ना रहें। 

दरअसल, अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने 14 अगस्त को एक रिपोर्ट छापी थी। जिसमें बताया गया था कि कैसे फेसबुक की इंडिया पॉलिसी हेड अंखी दास ने बिजनेस कारणों का हवाला देकर हिंसा भड़काने और घृणा फैलाने वाले बीजेपी से जुड़े कम से कम चार व्यक्तियों और समूहों के ऊपर कार्रवाई का विरोध किया, जबकि फेसबुक की आंतरिक टीम ने इस कार्रवाई की अनुशंसा की। रिपोर्ट में बीजेपी विधायक टी राजा सिंह और अनंत हेगड़े का नाम प्रमुखता से लिया गया।

रिपोर्ट में फेसबुक के वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों के हवाले से बताया गया कि अंखी दास द्वारा कार्रवाई का विरोध किया जाना कंपनी की तरफ से सत्ताधारी बीजेपी के लिए किए जा रहे वृहद पक्षपात का हिस्सा है। बाद में अंखी दास और बीजेपी-आरएसएस के रिश्ते भी सामने आए थे। 

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इस तथ्य को रेखांकित करते हुए पूर्व नौकरशाहों ने जुकरबर्ग को लिखे अपने पत्र में कहा कि कंपनी को बिजनेस से ज्यादा इंसानी जिंदगी को तवज्जो देनी चाहिए और देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताने बाने की फिक्र होनी चाहिए।

इस पत्र में कहा गया कि अगर फेसबुक अपनी हेट स्पीच पॉलिसी को ढंग से लागू नहीं करता है तो इससे निश्चित तौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और घृणा अपराध बढ़ेंगे और उन्हें खतरनाक लोगों की तरह चित्रित करना जारी रहेगा। 

ऐसे मामलों में फेसबुक मांग चुका है माफी

बात 2018 की है, जब यह सामने आया था कि फेसबुक ने आर्थिक लाभ के लिए कैंब्रिज एनालिटका नाम की कंपनी को अपने यूजर्स का डेटा बेचा। बाद में कैंब्रिज एनालिटका ने इस डेटा का इस्तेमाल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और ब्रेग्जिट की प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के लिए किया। यूजर्स के सामने धड़ल्ले से फेक न्यूज और घृणा पोस्ट पोस्ट की गईं, ताकि उनके सोचने के तरीके में परिवर्तन लाया जा सके। 

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बाद में इस मामले में फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग की पेशी अमेरिकी कांग्रेस में हुई। वहां उन्होंने कहा कि डेटा बेचने, फेसबुक पर फेक न्यूज, हेट स्पीच और हिंसा भड़काने वाली पोस्ट फैलने देने के लिए वे जिम्मेदार हैं। वे इसके लिए माफा मांगते हैं और आगे से यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि ऐसा कभी ना हो। 

मार्क जुकरबर्ग ने ऐसा ही वादा जर्मनी की सरकार से भी किया है। भारत में भी कैंब्रिज एनालिटका को लेकर खुलासा हुआ था, लेकिन यहां इस मामले की जांच ही नहीं हुई। दूसरी तरफ विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे-जैसे फेसबुक का उभार हुआ है, वैसे ही वैसे विश्व मानचित्र पर धुर दक्षिणपंथ का भी उभार हुआ है।