दफ्तर दरबारी: क्या घोटालेबाज आईएएस से यारी निभाएगी सरकार 

एमपी में भ्रष्‍टाचार के मामलों में आईएएस अफसरों से पूछताछ की जा रही है। सवाल यह है कि क्‍या सरकार इन ताकतवर अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देगी ? दूसरी तरफ, मैदानी दिक्‍कतों से सीएम शिवराज सिंह चौहान इतना तंग आ चुके हैं कि अफसरों को फ्रंट पर आने के निर्देश दे रहे हैं।

Updated: Oct 29, 2022, 04:59 PM IST

दफ्तर दरबारी: क्या घोटालेबाज आईएएस से यारी निभाएगी सरकार 
सीएम शिवराज सिंह चौहान

क्‍या भ्रष्‍टाचार को लेकर मध्‍य प्रदेश सरकार वाकई सख्‍त हो चुकी हैं? यह सवाल इसलिए क्‍योंकि मध्‍य प्रदेश में छोटे कर्मचारी तो भ्रष्‍टाचार करते हुए रंगे हाथों पकड़े गए हैं मगर अब उन लोगों से पूछताछ और जांच की जा रही है जो कभी सरकार के कर्ताधर्ता रहे हैं। रसूखदार आईएएस अफसरों के खिलाफ लोकायुक्‍त ने जांच शुरू की है। क्‍या सरकार इन ताकतवर अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देगी या यह जांच केवल तात्‍कालिक शिगूफा बन कर रह जाएगी? 

बीते एक पखवाड़े में मध्‍य प्रदेश में 4 आईएएस, 1 आईएफएस और रिटायर्ड आईएएस के खिलाफ लोकायुक्त ने और एक आईएफएस के खिलाफ ईओडब्ल्यू ने मामला दर्ज किया है। सबसे ज्‍यादा चर्चा कभी सरकार में ताकतवर रहे पूर्व अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव राधेश्‍याम जुलानिया पर भ्रष्‍टाचार की जांच की है। आईएएस जुलानिया कभी मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सबसे भरोसेमंद अफसरों में शुमार किए जाते थे। इतने ज्‍यादा भरोसेमंद कि प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़ाने का काम करने के लिए उन्‍हें लंबे समय तक जलसंसाधन विभाग का मुखिया बना कर रखा गया। 

जुलानिया तो रिटायर्ड हो चुके हैं मगर लोकायुक्‍त ने ग्वालियर तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ आईएएस तरुण भटनागर के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इनके खिलाफ ढ़ाई वर्ष पहले नियम विरुद्ध तरीके से औद्योगिक विकास एवं भवन अनुज्ञा देने की शिकायत हुई थी। लोकायुक्त संगठन ने प्रारंभिक जांच के बाद प्रकरण दर्ज कर लिया है। आईएएस तरुण भटनागर वर्तमान में निवाड़ी जिला कलेक्टर हैं।

लोकायुक्त संगठन ऐसे मौके बिरले आते हैं जब वह आईएएस के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू करे। इसके पहले वर्ष 2002 में 1993 बैच के आईएएस रमेश थेटे को एक प्राचार्य से एक लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था। अब छह साल पुराने मामले में निवाड़ी कलेक्टर तरुण भटनागर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा उज्‍जैन के महाकाल लोक में भ्रष्‍टाचार की शिकायत के बाद तीन आईएएस के खिलाफ जांच आरंभ की गई है। इनमें उज्जैन कलेक्टर और स्मार्ट सिटी अध्यक्ष आशीष सिंह, उज्जैन स्मार्ट सिटी के तत्कालीन सीईओ क्षितिज सिंह और तत्कालीन आयुक्त अंशुल गुप्ता शामिल हैं। एक आईएफएस सत्यानंद के खिलाफ भी उद्यानिकी विभाग में घोटाला करने के मामले में प्रकरण दर्ज किया गया है।

लेकिन, सिर्फ जांच शुरू हो जाने से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि इन अधिकारियों का कुछ बिगड़ेगा भी क्‍योंकि ईओडब्‍ल्‍यू हो या लोकायुक्‍त कोई भी जांच एजेंसी आईएएस, आईपीएस अफसरों के खिलाफ सीधे जांच नहीं कर सकती। इसके लिए उन्हें बाकायदा प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजना होगा। इस प्रस्ताव का परीक्षण विभाग से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक होगा। जब सभी स्तर पर ये मान लिया जाएगा कि संबंधित अफसर ने भ्रष्टाचार किया है तब ही जांच एजेंसियों को इनके खिलाफ कार्रवाई की अनुमति दी जाएगी। 

केंद्र के निर्देश पर बदला है आईएएस पर कार्रवाई का नियम 

आईएएस आईपीएस अधिकारियों पर कार्रवाई से पहले मुख्‍यमंत्री ने अनुमति लेने का नियम हाल ही में जुड़ा है। केन्द्र सरकार के निर्देश पर राज्य सरकार ने 5 मई 2022 को एक आदेश जारी कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1986 में धारा 17 ए को जोड़ दिया है। ये धारा कहती है कि आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और फर्स्‍ट क्लास के अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी। 

इससे पहले भी जांच एजेंसियों के हाथ बांधने के प्रयास हुए थे मगर लोकायुक्त की आपत्ति के बाद राज्य सरकार ने 2021 में ऐसा ही एक आदेश निरस्त कर दिया था। अब मई 2022 में केन्द्र सरकार के निर्देशों का हवाला देते हुए यह नियम जोड़ दिया गया। 

भले ही जांच शुरू हो गई है लेकिन लोकायुक्त को इनके खिलाफ जांच करने से पहले सरकार को पूरा प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजना होगा। सीएम की अनुमति के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। सरकार में गहरी पैठ रखने वाले इन अफसरों पर कार्रवाई शुरू कर सरकार भ्रष्‍टाचार के खिलाफ सख्‍ती का संकेत देना चाहती है। अब देखना होगा कि मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दागी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देते हैं या नहीं? या केवल मामला दर्ज ही कर सरकार छवि चमकाने का प्रयास करेगी, असल में किसी भी कार्रवाई से ये अधिकारी उसी तरह बचे रहेंगे जैसे इनके पूर्ववर्ती दागी अफसर बचे हुए हैं। 

यह भी पढ़ें : रिटायर्ड आईएएस आईपीएस ने मांगा काम, बीजेपी बोली क्‍या आइडिया है

यहां यह बताना जरूरी है साल भर पहले विधानसभा में सरकार ने जानकारी दी थी कि प्रदेश में करीब 100 आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के खिलाफ ईओडब्‍ल्‍यू, लोकायुक्‍त में आर्थिक अनियमितताओं के मामले लंबित हैं। सरकार ने इन अधिकारियों पर कार्रवाई में रूचि नहीं दिखाई है, इसलिए लगता नहीं कि आगे भी कार्रवाई की अनुमति जल्‍द मिल जाएगी। 

दोषी थे फिर भी बना दिया आईएएस 

दोषी अफसरों पर कार्रवाई को लेकर शासन-प्रशासन की मंशा संदिग्‍ध हैं क्‍योंकि ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई के उदाहरण कम ही हैं। हां, सारी प्रक्रियाओं को धत्‍ता बता कर मलाई पा लेने के मामले कई हैं। ताजा मामला इंदौर में तब सामने आया जब मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिव्‍यांग से दुर्व्‍यवहार करने पर एडीएम पवन जैन को निलंबित किया। इस कार्रवाई के बाद राज्‍य प्रशासनिक सेवा के अफसर पवन जैन को आईएएस अवार्ड होने पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। उन पर करीब सात साल पहले ईओडब्ल्यू ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था। यह माला दर्ज होने के बाद भी इसी सरकार में उन्‍हें  आईएएस अवार्ड दे दिया गया। जबकि नियम कहते हैं कि इस मामले में जांच पूरी होने तक जैन का आईएएस अवार्ड घोषित नहीं होना था। 

अब जबकि मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सख्‍ती दिखाई है तो ईओडब्ल्यू ने दोषी आईएएस पवन जैन सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ चालान पेश करने की अनुमति मांगी है। करीब एक सप्ताह हो चुका है मगर अब तो सरकार ने अनु‍मति नहीं दी है। यह अनुमति लंबित ही रहेगी या सरकार ऐसे अफसरों पर कार्रवाई कर अपनी छवि चमकाएगी, यह तो भविष्‍य ही बताएगा। 

अफसरों के जिम्मे खंडन और महिमा मंडन  

बिजली, सड़क की समस्‍याओं और मैदानी दिक्‍कतों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तंग आ चुके हैं। हर समस्‍या उन तक ऐसे पहुंच रही है जैसे इनके निराकरण के लिए कोई सिस्‍टम हो ही नहीं। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही हर शिकायत की सुनवाई करेंगे तो मंत्री, अफसर और गांवों तक फैला प्रशासन का तंत्र क्‍या करेगा?  

ऐसे ही सवाल से परेशान हो कर मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के अफसरों से कहा है वे कि अखबारों, समाचार चैनलों के माध्यम से आने वाली खबरों पर ध्‍यान दें। जनता की समस्‍या, लापरवाही आदि की खबरों को लेकर विभाग की जिम्‍मेदारी तय करते हुए उन्‍होंने कहा कि अधिकारी स्थितप्रज्ञ बन कर रहे बल्कि तुरंत एक्‍शन लें। और यदि खबर गलत है तो उसका खंडन करें। मुख्‍यमंत्री चौहान ने चेताया है कि अधिकारी एक्शन नहीं लेंगे तो उस अफसर पर सीएम एक्शन लेंगे। 

सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो देख कर साफ लग रहा था कि मैदान से मिल रही खबरों से मुख्‍यमंत्री चौहान संतुष्‍ट नहीं हैं बल्कि ये खबरें सरकार का तनाव बढ़ा रही है। जब चुनाव सिर पर हों तो ऐसी लापरवाहियां बर्दाश्‍त नहीं की जा सकती है। इसलिए मुख्‍यमंत्री चौहान ने अधिकारियों को खबरों पर ध्‍यान देने के लिए ही नहीं कहा बल्कि उन्‍हें सरकार की ब्रांडिंग करने को भी कहा है। सरकार के महिमा मंडन के लिए कामों को सोशल मीडिया पर अपडेट करना होगा। इसके लिए पुलिस विभाग का उदाहरण दिया गया।

यह भी पढ़ें : बैठकों ने निकम्‍मा कर दिया, वर्ना अफसर थे बड़े काम के...

मीटिंगों से परेशान अफसरों के लिए सोशल मीडिया ब्रांडिंग भी एक बड़ा काम ही है। खासकर तब जब विभाग का पीआर सेक्‍शन बीते कई वर्षों से पंगु बना दिया गया हो। कोई आश्‍चर्य नहीं कि कुछ ही दिनों में कई अफसर नए सोशल मीडिया अकाउंट नजर आएं और सरकार की योजनाओं को वि‍भिन्‍न ग्रुप में प्रसारित करने के लिए दफ्तर में वे मोबाइल लिए बैठे दिखाई दें।  

अफसरों ने कुलड़ी में गुड़ फोड़ा, अब रायता कैसे समेटें 

विकास के कामों के सहारे वोट मांगने की तैयारी कर रही बीजेपी सरकार चाहती है कि 2023 के पहले भोपाल और इंदौर में मेट्रो शुरू हो जाए। इसके लिए बार-बार समय सीमा तय की जाती है। लेकिन इंदौर में अफसरों का कियाधरा अब उनकी ही मुसीबत बनता जा रहा है। 

एक मुहावरे ‘कुलड़ी में गुड़ फोडने’ (गुपचुप काम कर लेना) की तर्ज पर अफसरों ने इंदौर में अपने अनुसार मेट्रो का रूट तय कर लिया। इस पूरी प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियों और जनता की व्‍यापक राय का ध्‍यान नहीं रखा गया। 

कुछ नेताओं की सहमति के आधार पर शहर के बीच से मेट्रो रूट तय कर लिया गया लेकिन जब काम करने की बारी आई तो 8 बार की सांसद पूर्व लोकसभा अध्‍यक्ष सुमित्रा महाजन आड़े आ गईं। उन्होंने जनता के साथ आवाज मिलतो हुए कोठारी मार्केट, एमटीएच कम्पाउंड, शास्त्री मार्केट, रीगल, रिव्हर साइड रोड से मेट्रो रूट का विरोध कर दिया। लोग कई दिनों विरोध कर रहे थे कि मेट्रो के कारण उनका व्यापार खत्‍म हो जाएगा? अब जब सुमित्रा महाजन ने आवाज उठाई है तो अधिकारियों के हाथ-पैर फुल गए हैं। 

इस विरोध के कारण मेट्रो का दूसरा चरण खटाई में पड़ गया है। सरकार जल्‍द मेट्रो चाहती है और इस काम में बीजेपी नेता ही बाधा बन रहे हैं। अब उन अधिकारियों को खोजा जा रहा है जिन्‍होंने मेट्रो प्रोजेक्ट को गुप्त रखा और जनता तो ठीक जन प्रतिनिधियों को भी नहीं बताया कि मेट्रो का रूट क्‍या होगा?

अफसर रायता समेटने में लगे और समाधान के लिए मुखिया की ओर देख रहे हैं। संभव है कि इस दूसरे चरण को फिलहाल रोक दिया जाए ताकि वोट बैंक भी न टूटे और पहले चरण पर मेट्रो चला कर विकास का वादा पूरा होना भी दिखा दिया जाए।